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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 144

From जैनकोष



असिधेनुविषहुताशनलांगलकर बालकार्मुकादीनाम् ।

वितरणमुपकरणानां हिंसाया: परिहरेद्यत्नात् ।।144꠰꠰

हिंसादानविरतिनामक अनर्थदंडव्रत का वर्णन―हिंसा दान नामक अनर्थदंड उसे कहते हैं जो चीज हिंसा के कारण हैं उन चीजों को दूसरे को बताना अथवा देना सो हिंसा दान अनर्थदंड है । हिंसा के जितने साधन हैं, उनके बिना यदि अपना कार्य न चलता हो तो रख तो ले, परंतु वह साधन दूसरे को न दें । जैसे बंदूक किसी के पास है और किसी को चोर, बदमाशों को दूर भगाने के लिए उससे बंदूक मांगनी पड़े तो उसे न देना चाहिए । यदि उसे मांगने से दे-दे तो यह हिंसा दान है । वह न जाने उस बंदूक से क्या-क्या करे? न जाने किस-किसको मारे? ऐसे ही छुरी, अग्नि, हल, तलवार, धनुष ये हिंसा के उपकरण उन्हें दूसरों को देना इसका नाम है हिंसा दान नामक अनर्थदंड । यहाँ तक कि किसी बेसमय पर कोई पुरुष आग मांगे तो आग भी न दे । यदि यह जान जाये कि यह तो अमुक है, अपनी रसोई बनाने के लिए या अमुक काम के लिए जा रहा है तब तो बात और है, लेकिन न जाने यह आग लेकर क्या करेगा? किसी घर में आग लगावेगा या अन्य कहीं । तो यहाँ तक कि जो हिंसा के साधन हैं उन्हें दूसरों को न दे । साधर्मी जन परस्पर में गृहकार्य के लिए ले दे सकते हैं मगर अनजान को गैर को न देना चाहिए । अगर देगा तो वह पापबंध करेगा । तो किसी को हिंसा का साधन दे-दे तो वह हिंसा दान है ।


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