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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 153

From जैनकोष



श्रित्वा विविक्तवसतिं समस्तसावद्ययोगमपनीय ।

सर्वेंद्रियार्थविरत: कायमनोवचनगुप्तिभिरितष्ठेत् ।।153।।

उपवासी पुरुष को विविक्तवसति में इंद्रियार्थविरक्त होकर त्रिगुप्तिसाधन में रहने का उपदेश―फिर करें क्या उपवास करने वाले? निर्जन बस्ती में जायें । जहाँ एकांत स्थान हो, नगर से बाहर धर्मात्मा लोगों के ठहरने के लिए जो स्थान बना हो वहाँ जायें, घर में न रहे । घर में रहकर परिणाम उज्ज्वल नहीं बनते, घर में रहकर चिंताएँ अवश्य होती हैं । तो उस दिन अपना घर त्यागकर किसी निर्जन स्थान में रहें । चौबीस घंटे की बात है । जो चौबीस घंटे को घर त्याग दे तो उसका उपवास सच्चा है । जैसे दशलक्षणी के दिनों में जब उपवास करते हैं तो उपवास के समय घर को छोड़ दें ऐसा बहुत से लोग करते भी हैं । किसी मित्र के पास या धर्मशाला में या किसी दूसरे स्थान में उसे शयन करना चाहिए । तो सब योगों का परिहार करके, सब इंद्रिय के विषयों से विरक्त होकर अपने मन वचन काय को संयत करते, अर्थात̖ मन से किसी का संकल्प न करें, वचन से कुछ न बोले, और अपने शरीर को स्थिर कर लें तो ऐसी स्थिति धर्मध्यान की है । यही उत्तम उपवास करने की विधि है । घर में रहकर तो उपवास की विधि नहीं बनती । गृह आरंभ त्यागकर उपवास करना यह भी काम है । सामायिक दो बार बताया हैं―सुबह और शाम । दिनभर की भूल की क्षमा शाम की सामायिक में मांग लो और रातभर की भूल की क्षमा सुबह की सामायिक में मांग लो । यों बारह-बारह घंटे बाद अपने आत्मा की सुध बनाये तो उसमें और दृढ़ता से सुध बनती है । इसके बाद श्रावकों को पाक्षिक अतिक्रमण बताया है । 15 दिन के बाद एक दिन सारे 15 दिन के दोषों को विचार करके फिर उनका परिहार करें, इस तरह से फिर चार महीने बाद बताया । फिर चार महीने के सारे अपराधों को विचार कर उनका प्रायश्चित्त करना, फिर बारह महीने का एक वर्ष में इकट्ठा प्रायश्चित्त करना, फिर जिंदगी भर में जब अंत में मरण समय आये तो मरण समय पर फिर वह सारी जिंदगी भर का प्रायश्चित्त करे तो कितनी बार उसने अपने अपराधों को शुद्ध किया? और अपराध दूर हुए तो आत्मा की उन्नति है और जब तक जीव में अपराध लगे हैं तब तक संसार में भटकना है । तो ऐसा पुरुषार्थ करें कि कर्म दूर हो सके ।

आत्मोद्धरार्थ भावना―मेरा आत्मा सबसे निराला चिदानंदमात्र अकेला है, ऐसा ही विश्वास बनाये, ऐसा ही ज्ञान बनाएं और ऐसे ही अपने आप में स्थिर होने का प्रयत्न करें तो यह हुआ उसका सम्यक्चारित्र । तो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की एकता होती है तो जीव को मुक्ति प्राप्त होती है । जब इसके विपरीत चलता रहे, देह को मानता रहे कि मैं आत्मा हूँ, परिजनों से ही ममता करने में अपना हित समझ रहा है, उनमें ही रम रहा है, विषय कषायों में अपना उपयोग बसाये रहता है तो समझिये कि वह संसार में जन्म मरण करता रहेगा । तो जिसे अपना उद्धार करना हो उसे चाहिए कि हिम्मत करके अपने आत्मा में अपने उपयोग को लगाये, ममता का परित्याग करे, सर्व कुछ इस संसार में विनश्वर, अहितकर एवं असार दीखे । इस संसार में सार की चीज कोई नहीं है । देखो बाहुबलि स्वामी ने सबको जीत लिया था, चक्रवर्ती तक को जीत लिया था, फिर भी इस लक्ष्मी को असार जानकर उसका परित्याग किया था । जब बड़े-बड़े तीर्थंकरों ने इस विभूति को त्यागकर, अपने आत्मा में रमकर अपना कल्याण किया तो हम और आपका क्या यह कर्तव्य है कि घर में ही घूसे रहें, घर में ही रहकर मरण करें? अरे घर का मरण तो अच्छा नहीं । नाती, पोते सभी पास में आ जाते हैं तो उस मरने वाले का चित्त उनकी ओर लग जाता है, उसके परिणाम खराब हो जाते हैं । मरण समय परिणाम खराब होने से सारी जिंदगी की की हुई सभी धार्मिक वृत्तियां व्यर्थ हो जाती हैं । अगर मरण समय में परिणाम सुधरे तो भव-भव के लिए सुधार हो जाता है और यदि मरण समय में परिणाम बिगड़े तो संसार में आवागमन का कष्ट भोगना पड़ता है ।

समता की उपलब्धि के लिए प्रोषधोपवास करने का अनुरोध―श्रावकाचार में यह प्रकरण चल रहा है कि भाई सुबह शाम सामायिक करना चाहिए । समय गुजरता जा रहा है, जो समय गुजर गया वह पुन: वापिस नहीं आता सो शाम सुबह निश्चित समय पर सामायिक तो करना ही चाहिए और सामायिक की वृद्धि के लिये, रागद्वेषादिक न आने पाये, इसके लिए उपवास करना चाहिए, उपवास करके अपने परिणामों की शुद्धि करनी चाहिए । ढूंढ-ढूंढ़कर रागद्वेषादि को हटायें, अपने दिल में किसी प्रकार का क्लेश न रहे ऐसा अपना प्रयत्न करे तो उस प्रयत्न से अपने परिणामों की निर्मलता जगती है, तो अपने परिणाम निर्मल बनाने के लिए उपवास करना बताया है और उपवास भी एकांतस्थान में जाकर, गुरूवों के निकट जाकर तत्त्वचर्चा में समय लगाकर उपवास करना चाहिए । जिससे अपना परिणाम निर्मल हो, आत्मानुभव जगे, ऐसे आत्मानुभव की साधना के लिए श्रावकाचार में इस सामायिक का वर्णन किया और सामायिक के बाद प्रोषधोपवास का वर्णन करते हैं । प्रोषधोपवास में त्रयोदशी को नियम लेकर चतुर्दशी में उपवास किया और सप्तमी को नियम लेकर अष्टमी को उपवास किया । यह शिक्षाव्रत है । इस शिक्षाव्रत में मुनियों को शिक्षा दी जाती है । मुनि क्या करते हैं? वे रोज-रोज उपवास करते हैं, उनका चौबीस घंटे का उपवास हो जाता है । तो 24 घंटे का उपवास यह गृहस्थ सीख रहा है । आठ दिन में एक बार सप्तमी और त्रयोदशी को नियम लेकर 24 घंटे का उपवास करके सीख रहा है । यदि शक्ति न हो तो अष्टमी चतुर्दशी को जल ले-ले और भी कम शक्ति हो तो दो एक रस के साथ भोजन लेता है । त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूनो की इसी तरह का उपवास कर लें तो ये तीन दिन उपवास के हो गए । इससे मुनियों की शिक्षा मिलती है, इसलिए इसे मुनिव्रत तुल्य कहा है ।


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