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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 167

From जैनकोष



पात्रं त्रिभेदमुक्तं संयोगो मोक्षकारणगुणानाम् ।

अविरतसम्यदृष्टि: विरताविरतश्च सकल विरतश्च ꠰꠰167꠰꠰

तीन प्रकार के पात्र―जिनको दान देना चाहिए उन्हें पात्र कहते हैं । तो इसमें पात्र का लक्षण कहते हैं कि मोक्ष के कारणभूत् गुणों का जहाँ संबंध पाया जाये उसे पात्र करते हैं । बहुत अच्छा लक्षण कहा है । पात्र मायने योग्य । जहाँ पर रखा जा सके, भरा जा सके । तो जिस आत्मा में सम्यग्ज्ञान, सम्यक᳭दर्शन और सम्यक्चारित्र रखा हुआ हो वह सब पात्र कहलाते हैं । वे तीन प्रकार के हैं―अविरत सम्यग्दृष्टि, देशव्रती और महाव्रती । जानने के संबंध में तो पात्र का निर्णय छठे गुणस्थान तक है, 7वां गुणस्थान यद्यपि मुनियों के बीच-बीच होता रहता है, आहार करते हुए में भी लोकप्रवृत्ति की वहां मान्यता है और अवस्था में 7वें गुणस्थान से अधिक गुणस्थान होता ही नहीं । तो जघन्य हुए चतुर्थगुणस्थानवर्ती जीव । मध्यम पात्र हुए पंचम गुणस्थानवर्ती जीव । जो कुछ व्रतरूप हैं कुछ अव्रतरूप हैं, इसमें जो व्रत अव्रत हैं वे पंचमगुणस्थानवर्ती जीव मध्यमपात्र हैं । उत्तम पात्र हैं संयमी जीव, महाव्रती जीव । दान के प्रकरण में यों जघन्य, मध्यम और उत्तम का भेद है जहाँ अंतरात्मा का कथन है, मोक्ष पात्रता का कथन है वहाँ उत्तम पात्र उत्कृष्ट अंतरात्मा तो है ध्यानी मुनि । सप्तम गुणस्थान और इससे ऊपर और मध्यम पात्र है प्रमत्त गुणस्थान वाले मुनि और पंचम गुणस्थानवर्ती जीव । ये मध्यम अंतरात्मा है और जघन्य अंतरात्मा है अविरत सम्यग्दृष्टिजीव । पात्र को जैसे भाव से दान दिया जाता है, वैसे ही सफल का भोगी दाता होता है और यह पात्र व्यवहार दर्शनज्ञान और चारित्र गुणों की अपेक्षा से होता है । पात्र कौन उत्तम मध्यम और जघन्य है? यह भेद सम्यग्दर्शन ज्ञानचारित्र के विकास की अपेक्षा है, इसी प्रकार पात्र का लक्षण यह है जिसके रत्नत्रय का गुण भर जाये, भर रहा हो । पात्र के अतिरिक्त अन्य पुरुषों को जो दान दिया जाता है वह दान दया में शामिल है और दया दान में विशेषता दया की है, इससे भी अत्यंत अधिक निर्णय तो स्पष्ट शब्दों में कोई बता नहीं सकता, ऐसे अनेक परिणमन होते हैं । कोई कुभेषी हैं, कोई खोटे मत वाले हैं । वे आहार के लिए आयें तो उन्हें दान न दे, दे भी तो उन्हें पात्र बुद्धि से देने में दोष है । दया बुद्धि से दे तो उनको देखकर दया की बात चित्त में नहीं आती, किंतु थोड़ासा भय होता, लाज होती । अनेक बातें उत्पन्न होती हैं, कदाचित समझ में आए कि यह पीड़ित है वास्तव में तो कभी दया भी उत्पन्न होती है । क्या स्पष्ट शब्दों में निर्णय बताया जाये, यह तो अपने-अपने भावों पर निर्भर है । पात्रों को दान दे तो धर्मबुद्धि दे और अन्य को दान दया बुद्धि से देना चाहिए । इसके अलावा और भी दान हैं । जैसे दानों में बताया गया है एक समदत्ती दान यह दान साधारण पुरुषों को दिया जाता है । इसमें दया और पात्रता दोनों का समावेश हैं । एक होता है सर्वदत्ती दान । कोई पुरुष जब दीक्षा लेने का उद्यमी होता है तो अपने अधिकारी को पात्र को जो घर का अधिकारी चुना गया है उसको सब कुछ देकर विरक्त हो जाना, इसको सर्वदत्ती दान कहते हैं तो यहाँ पात्रदान का प्रकरण है । अतिथिसम्विभाग महाव्रत की बात चल रही है । अतिथि को योग्य भक्ति से दान देने का नाम अतिथि सम्विभाग व्रत है ।


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