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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 170

From जैनकोष



कृतमात्मार्थं मुनये ददाति भक्तमिति भावितस्त्याग: ।

अरतिविषादविमुक्त: शिथिलितलोभो भवत्यहिंसैव ।।17॰꠰।

अतिथिसंविभागव्रत में अहिंसाधर्म की सिद्धि का प्ररूपण―अपने लिए बनाया हुआ भोजन मुनि के लिये देना चाहिए जिसके न अप्रेम है, न विषाद है । इस प्रकार के भावपूर्वक जो गृहस्थ आहारदान करता है उसको समझो लोभ शिथिल हुआ है । जिसने लोभ को शिथिल कर दिया वह गृहस्थ अहिंसा स्वरूप ही है । देखो साधु के लिए अलग से भोजन बनाना पड़े तो उसे देने में कोई कष्ट नहीं होता, क्योंकि उसी के लिए बनाया गया, आये तो उनको ही दे दिया, लेकिन अपने घर के लिए बन रहा भोजन ही, सबके लिए बन रहा भोजन हो, उस बीच में कोई अतिथि आ जाये तो उसमें से भोजन देने में संभावना है कि कुछ अरति हो जाये, कुछ विषाद भी हो सके । जैसे कि कल्पना में ऐसा प्रसंग लाये कि घर में 5 मनुष्य हैं, 5 के लिए ही भोजन बना और ऐसे समय में कोई दो महिमान आ जायें, आपके रिश्तेदार कोई आ जायें तो चूँकि उनसे प्रीति है इस कारण स्वयं को खेद न होगा, लेकिन जिससे अधिक संबंध नहीं, अधिक प्रीति नहीं और आ जाये तो कुछ विषादसा भी हो सकता है । तो एक कल्पना में दृष्टांत में बताया गया है लेकिन यहाँ गृहस्थ जो धर्मभावना वाले हैं, साधु के विशेष गुणानुरागी हैं ऐसे गृहस्थों को उस जगह न अप्रेम होता है, न विषाद होता है । तो भला बतलावो कि विषादरहित गुणानुराग सहित अतिथि के लिये जो गृहस्थ उस भोजन में से जो अपने घर के लिए बनाया गया है वह दान करे तो उसका लोभ शिथिल हुआ कि नहीं? ऐसा निर्लोभ गृहस्थ मानो अहिंसा स्वरूप ही है । तो इस अतिथिसम्विभागव्रत में मुनि का दुःख दूर हुआ, सो भी अहिंसा हुई और अपना परिणाम निर्मल हुआ अविकारी निर्दोष आत्मस्वभाव की ओर दृष्टि जगी उन साधुवों के दर्शन से, सो भावों में भी अहिंसा हुई । इस तरह अतिथि सम्विभाग व्रत में अहिंसा का पालन होता है । आजकल की रिवाज में चूंकि गृहस्थजन शुद्ध भोजन नहीं करते तो उनको अलग से बनाना होता है, उसमें वे खेद मानते हैं । इस संबंध में इतना ही समझना चाहिए कि जो इस प्रकार खेद मानते हैं और आहार बनाते हैं उन्हें आहार बनाना ही न चाहिये ꠰ खेद मानकर दान देने वाले को तत्त्व क्या मिला, लाभ क्या मिला ? समय भी बरबाद हुआ, क्लेश भी सहा ꠰ जो पुरुष गुणानुरागी होते है तो कुछ थोड़ासा स्पेशल भी हो जाये तो भी उनके अंदर रंच मात्र भी खेद नहीं होता, बल्कि हर्ष होता हे और सारा स्पेशल भोजन बने तो मुनिजन वैसा भोजन नहीं करते हैं ꠰ हां साधु के लिये आहार बना रहे हैं, तो उसमें कुछ और विशेष कर ले वह बात ओर है, मगर वह उनके लिए ही बनाया जाये तो ऐसा आहार मुनि नहीं लेते हैं ꠰ यदि सबके लिए बना हुआ भोजन है उसमें से आहार गृहस्थ देवें, विषाद न करे तो वह अहिंसा स्वरूप है ꠰ यों अतिथिसम्विभाग व्रत में अहिंसाव्रत की सिद्धि हुई ꠰

꠰꠰ पुरुषार्थसिद᳭ध्युपर्याय प्रवचन द्वितीय भाग समाप्त ꠰꠰


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