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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 37

From जैनकोष



विगलितदर्शनमोहैः समज्जसज्ञानविदिततत्त्वार्थै ।

नित्यमपि निष्प्रकंपै: संयक्चारित्रमालंब्यं ꠰꠰37꠰꠰

सम्यग्दृष्टि तत्त्वज्ञानी संतों को सम्यक्चारित्र के आलंबन का उपदेश―जिन पुरुषों ने दर्शन मोह को नष्ट कर दिया है और सम्यग्ज्ञान के द्वारा तत्त्वार्थ का अवरोध कर लिया है उन्हें बड़े निष्प्रकंप होकर धारण सहित सम्यक् चारित्र का आलंबन करना चाहिये । इसमें सर्वप्रथम यह बताया है कि जिसने दर्शन मोह को गला डाला उनको, जब तक पदार्थ की स्वतंत्रता का भान न हो, समस्त पदार्थों से निराले निज अंतस्तत्त्व का जब तक परिचय न हो तब तक वास्तव में सम्यक्चारित्र नहीं बनता, क्योंकि चारित्र नाम है अपने स्वभाव का । अपने स्वभाव का पता न हो तो रमे कहां? जो बाह्य में सम्यक्चारित्र कहे जाते हैं वे साधक हैं, 5 समिति, 3 गुप्ति, 5 महाव्रत श्रावकों के लिए अणुव्रत आदि ये सम्यक्चारित्र नाम इस लिये पाते हैं कि निश्चय चारित्र में साधक हैं, अन्यथा शुद्ध खानपान, देखभाल कर चलना, जीवदया पालना किसी की चीज न उठाना ये तो बातें होती हैं । अंतरंग सम्यक् चारित्र तो निज स्वभाव को जानकर उसमें रमण करना है, ये सब साधन किसलिये होते हैं इसे समझना है तो इससे उल्टी बात सोचें । कोई मनुष्य दया नहीं पालता, दूसरे जीवों को सताता तो ऐसे चित्त में स्वभाव धारणा नहीं बन सकती है, जो शल्यरहित हो, सत्यव्यवहार करता हो, न्याययुक्त जीवन हो ऐसे आचरण वालों में उस स्वभाव के धारण करने की योग्यता रहती है, अतएव ये सब आचरण साधक हैं । वास्तव में सम्यक᳭ चारित्र तो आत्मस्वभाव में स्मरण करने का नाम है । यह बात तब बन सकती है जब दर्शन मोह गल गया हो । जिसका मिथ्यात्व नष्ट हो गया और जिसने 7 तत्वों का श्रद्धान यथार्थ अवधारण किया वह पुरुष सम्यक् चारित्र को ग्रहण करता है, ये वे शब्द ऐसे हैं देखना, जानना और प्रयोग करना । लौकिक कामों में भी ये 3 बातें आती हैं, कोई भी काम करने जावे । यह मोक्षमार्ग का प्रकरण है, इस कारण यहाँ देखने का नाम श्रद्धान है । अंतस्तत्त्व का विश्वास होना और स्पष्ट बोध होना और उस अंतस्तत्त्व में उपयोग जमाना, यही है रत्नत्रय और मोक्ष का मार्ग । अब वह अंतस्तत्त्व इस ज्ञानी के उपयोग में यों बसता है कि यह ध्रुव है बिना कारण के हैं, किसी चीज से उत्पन्न नहीं होता और न यह किसी वस्तु को उत्पन्न करता है । जिसके आचरण में परिणमन नाना होते हैं फिर भी किसी परिणमनरूप नहीं बनता, ऐसा जो एक चैतन्यस्वभाव है वह अंतस्तत्त्व, चैतन्य मात्र मैं हूँ, इस प्रकार की वह प्रतीति करता है और ऐसी दृष्टि जमाने का ही यत्न रखता है, अब ऐसा उपयोग बन जाये किसी का या जितने क्षण बने, स्वयं कुछ थोड़ा बहुत यत्न करके अनुभव बना करे तो इस अनुभूति के प्रसार से क्लेश दूर होते हैं और आत्मीय आनंद प्रकट होता है । क्योंकि क्लेश तब होते हैं जब परपदार्थों में उपयोग है । जब परपदार्थों में इष्ट अनिष्ट की बुद्धि होती है तब क्षोभ उत्पन्न होता है, इसलिये पर के उपयोग में आत्मा को कष्ट है और जब स्वयं का स्वयं में सत्य सहज अंतस्तत्त्व का परिचय हो, उपयोग हो तो उसमें कोई बिगाड़ नहीं रहता । ऐसी निर्विकल्परूप, अनुभूतिरूप आत्मस्वभाव का उपयोग करना, यही है निश्चयदृष्टि से चारित्र ।

सद्वृत्ति और स्वानुभूति का परस्पर सहयोग―अब देख लीजिए कि कैसा परस्पर संयोग है कि अपने को शांतवृत्ति में रखें तो अनुभव जगे और अनुभव जगे तो शांति वृत्ति बढ़े । इसमें एकांत से हम किसे कारण बतायें? शांति से अनुभूति होती है या अनुभूति से शांति होती है―इन दोनों में एकांततः हम किसे पहिले रखें? कुछ मंद कषाय होकर जो शांति मिलती है वह तो बहुत, चाहे तब अनुभूति जगे । और अनुभूति जगने से फिर उस शांति से वृद्धि बनती है और शांति ही एक चारित्र का रूप है । तो अनुभव करने के लिये सदाचरण होना बहुत आवश्यक है ꠰ जो पुरुष किसी प्रकार अच्छे ढंग से व्रत और नियम से रहते हैं उनकी यह वृत्ति स्वानुभूति का साधक है, केवल एक ज्ञान कर लेने मात्र से, तत्त्व की चर्चा कर लेने मात्र से अनुभूति नहीं जगती, क्योंकि उसमें हमारा चित्त रमे, उपयोग ग्रहण करे, चित्त शांत हो तो आत्मा की अनुभूति जगती है । चित्त में शांति तब हो सकती जब हमारी अनाचाररूपवृत्ति न हो, अभक्ष्य भक्षण की प्रवृत्ति न हो । ज्ञान तो हो गया कि मद्य मांस में जीव की हिंसा है ऐसा ज्ञान होकर जो पुरुष उसकी प्रवृति करता है तो उसके चित्त में क्रूरता है और क्रूर चित्त आत्मानुभव कर नहीं सकता और जिसके ज्ञान ही नहीं कि मांस भक्षण में दोष है, इसमें जीव हिंसा है, उसके तो जीव की पहिचान ही नहीं है, आत्मानुभव तो उसके जगेगा ही क्या? जब मिथ्यात्व अन्याय अभक्ष्य का त्याग नहीं होता उसके सम्यक्त्व नहीं होता । जब तक बाह्य आचरण ठीक न हो तब तक आत्मानुभूति की पात्रता ही नहीं है, इस कारण ऐसा ही ख्याल करना चाहिये कि हमें केवल सम्यक्त्व पैदा करना है, आचरण पीछे सुधारेंगे । अरे विशिष्ट आचरण तो वाद में सुधरेगा पर साधारण आचरण तो पहिले चाहिये । क्योंकि सम्यक्त्व आत्मानुभूति के साथ उत्पन्न होता है । बाद में सम्यक बना रहे और आत्मानुभूति न बने यह तो संभव है क्योंकि आत्मानुभव का नाम है―आत्मा का उपयोग रखना । सम्यग्दृष्टि निरंतर आत्मा का उपयोग रखता हो ऐसी बात नहीं है । गृहस्थजन दुकान पर जाते, आजीविका का साधन बनाते, परिवार का पालन पोषण करते, अनेक घटनाओं में सुधार बिगाड़ का यत्न रखते, पर पदार्थों का उपयोग चलता रहता है पर सम्यक्त्व बना रहता है । सम्यक्त्व की उत्पत्ति स्व के उपयोग बिना नहीं हो सकती, स्वानुभूति पूर्वक ही सम्यक्त्व उत्पन्न होता है । अपनी उस अनुभूति को जगाने के लिये हमारा पहिले से आचरण विशुद्ध हो तो कार्य बनता है । आचरण गंदा है तो हम में यह योग्यता नहीं है कि सम्यग्दर्शन उत्पन्न कर सकें । जिसे सम्यग्दर्शन होता हे और भले प्रकार तत्वार्थ का परिज्ञान है उस पुरुष को सदाकाल दृढ़ चित्त पूर्वक विशिष्ट उत्साह सहित सम्यक्चारित्र का आलंबन लेना चाहिये । जैसे कोई पुरुष मार्ग चलता है तो रास्ता जैसे-जैसे व्यतीत होता है वैसे ही वैसे उसका उत्साह बढ़ता जाता है ऐसे ही सम्मक्चारित्र के मार्ग में उत्साह बढ़-बढ़कर यह ज्ञानी पुरुष बढ़ता है, क्योंकि उसकी दृष्टि में वह स्थान है जिस स्थानपर उसे अपना उपयोग जमाना है और अपने अंतःपुरुषार्थ से वह उस और बढ़ रहा है और उसे स्पष्ट विदित हो रहा है कि यह अंतस्तत्त्व है । कुछ और निकट पहुंचता है तो अपने उपयोग को अपने अंतस्तत्त्व में पहुंचाता है । तो उत्साहपूर्वक उसे मार्ग में बढ़ना है, ऐसे उत्साहसहित दृढ़ चित्त होकर सम्यग्ज्ञानी पुरुष को सम्यक᳭चारित्र का आलंबन लेना चाहिये ।



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