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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 49

From जैनकोष



सूक्ष्मापि न खलु हिंसा परवस्तुनिबंधना भवति पुंस: ।

हिंसायतननिवृत्ति: परिणामविशुद्धये तदपि कार्या ।।49।।

हिंसा की आत्मापराधजता―छोटी से छोटी भी हिंसा हो वह भी परवस्तु के कारण नहीं होती, किंतु खुद में रागद्वेष भाव उपजे तो हिंसा होती है । याने किसी जीव ने अपने दिल को दुखा पाया है, उस वजह से हमें हिंसा लग जाये सो क्यों? हमने दूसरों का दुःख विचारा, इस कारण हिंसा है दूसरों के कारण हिंसा नहीं होती या किसी ने किसी को पीट दिया, मार दिया तो वह पिट गया या मारा गया इससे हिंसा नहीं है किंतु हमने जो बुरा भाव किया उससे हिंसा हुई । रागद्वेष के भाव उपजे तो उससे हिंसा होती है । इस कारण से परिणामों में निर्मलता के लिए हिंसा के साधनों का त्याग करना चाहिये । यद्यपि परवस्तुओं के कारण हिंसा नहीं होती लेकिन फिर भी अपना परिणाम निर्मल रहे इस वजह से बाह्य साधनों का त्याग कर दें । जैसे मुक्ति अपने परिणाम से होती है । अपना परिणाम निर्मल रहे, केवल एक अद्वैत आत्मस्वभाव को ग्रहण करे और उससे आत्मा को मुक्ति होती है । घर छोड़ने से मुक्ति नहीं होती, परिग्रह छोड़ने से मुक्ति नहीं होती फिर भी अपने परिणामों की निर्मलता के लिये घर द्वार परिग्रह छोड़ना पड़ता है तब परिणाम हमारा विशुद्ध हो पाता है । तो इस गाथा में यह बात बताई कि जैसे जिस माता का कोई सुभट पुत्र हो उसी को यह कहा जाता कि मैं वीर जननी पुत्र को मारूंगा । यह तो कोई नहीं कहता कि बंध्याजननी के पुत्र को मैं मारूंगा । जैसे कोई हंसी मजाक में दवा बताने लगते हैं कि धुआं की कोपल ले लो आसमान की छाल लो तो यह भी कुछ है क्या? याने जो चीज है ही नहीं उसके बारे में भाव होता ही नहीं, जो चीज है उसके बारे में परिणाम होता है । तो ऐसा परिग्रह अगर साथ है तो उसके आलंबन से कषायों की उत्पत्ति होगी और जब परिग्रह से संबंध ही नहीं तो कषायों की उत्पत्ति भी न होगी । इसलिये परिग्रह का त्याग, बाह्य साधनों का त्याग करना चाहिये । फिर भी यह रहस्य जान ले कि बाह्य चीज देखने से धर्म नहीं होता । धर्म होता है अपने आप में जो बसा हुआ जो भगवान है, परमात्मा है उसको पहिचान लें । उसके आलंबन से धर्मपालन के लिए बाहरी साधन जुटाना चाहिए जिससे हमारा परिणाम विरुद्ध न जाये ।


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  • पुरुषार्थसिद्धिउपाय
  • प्रवचन
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