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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 77

From जैनकोष



स्तोकैकेंद्रियघाताद᳭गृहिणां संपन्नयन्योविषयाणां ।

शेषस्थावरमारणविरमणमपि भवति करणीयम् ।।77।।

गृहस्थारंभ में अनिवारित अल्प एकेंद्रियघात के अतिरिक्त शेषस्थावर घात के त्याग का आदेश―जिसको योग्य विषय प्राप्त हुआ है अर्थात् न्यायपूर्वक आजीविका करते हुए में जो न्यायपूर्वक ठीक उपभोग के साधन प्राप्त हुए हैं ऐसे गृहस्थों को त्रस हिंसा का तो त्याग करना ही चाहिये, पर स्थावर हिंसा में भी प्रयोजनभूत एकेंद्रिय घात के सिवाय शेष स्थावरों की हिंसा का भी त्याग करना चाहिये । श्रावक त्रस हिंसा का तो पूरा त्याग करें और स्थावर हिंसा का प्रयोजनभूत स्थावर हिंसा के अतिरिक्त अन्य समस्त स्थावर हिंसा का परित्याग करें । जैसे भोजन बनाने का प्रसंग है । जल तो लाना ही पड़ेगा, अग्नि जलाना ही पड़ेगा, कुछ वनस्पति साग वगैरह लाना ही पड़ेगा । तो ऐसी जिनकी परिस्थिति है उनसे कुछ तो एकेंद्रिय का घात हुआ ही । होता है, हो पर इसके अतिरिक्त व्यर्थ की असावधानी के कार्य में जो एकेंद्रिय जीव की हिंसा है उसका तो त्याग करें । जैसे बहुत-बहुत बाल्टियों से नहाना, नहाने में घंटों का समय लगाना, चलते-चलते में पेड़ पत्ती पौधों का तोड़ना, अपना मन रमाने के लिए नाना तरह के फूलों को तोड़ना अपना शौक बनाने के लिये खड़े हुए केले के वृक्षों को या अन्य वृक्षों को मूल से तोड़ना छेदना । कितने ही काम ऐसे होते हैं कि जिसके बिना काम तो सध सकता था मगर साध नहीं रहा है । उसको कह रहे हैं कि भाई प्रयोजनीभूत स्थावर हिंसा के अतिरिक्त अन्य हिंसाओं का तो परित्याग कर ही दें क्योंकि एक अंतरंग हिंसा के निभाने का प्रण किया है, तो उस प्रण के माफिक बाहर में भी अहिंसा धर्म का पालन होना आवश्यक है ।


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