• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 90

From जैनकोष



को नाम विशति मोहं नयभंगविशारदानुपास्य गुरून् ।

विदितजिनमतरहस्यः श्रयन्नहिंसांविशुद्धमति: ।꠰90।।

ज्ञानी गुरुओं की उपासना करके धर्मरहस्य के ज्ञाता पुरुषों के अहिंसासंबंध में मूढ़ता का अभाव―अहिंसा और हिंसा के संबंध में जो बहुत विस्तृत वर्णन किया गया है, जिसको सुनकर अनेक नय के अनभिज्ञ पुरुषों को आश्चर्य और शंकाएं हो सकती हैं । उन समस्त वर्णनों को यदि नयों के ज्ञानपूर्वक समझा जाये तो उसमें संदेह का कोई स्थान नहीं है । अहिंसा और हिंसा का मूलस्वरूप यह है कि राग द्वेष मोह परिणाम न होना सो अहिंसा है और राग द्वेष मोह परिणाम होना सो हिंसा है । अब इस मूल निरूपण के अनुसार बाह्य में जो हिंसायें होती हैं, द्रव्यहिंसा चलती हैं उनका वर्णन करना चाहिये और इस विधि से अनेक बातें ये सिद्ध होती हैं । जो अपने अंतरंग परिणाम में अहिंसक है कदाचित् उसकी देह प्रवृत्ति से किसी कुंथु जीव के प्राण का घात भी हो जाये तो वह हिंसा नहीं होती । कोई पुरुष अंतरड्ग परिणाम में सावधान नहीं है और अयत्नाचाररूप प्रमाद की अवस्था में गमन कर रहा है, चाहे कोई जीव उसको चलने में न भी मरे तो भी हिंसा है । हिंसा का जहाँ परिणाम किया है, चाहे प्राणों का घात न भी हो तो भी हिंसा हो जाती है । कोई हिंसा में प्रवृति करता है उसको भी हिंसा है और कोई हिंसा का त्याग नहीं किये हैं तो भी-हिंसा है । कोई पुरुष हिंसा नहीं भी कर पाता है लेकिन परिणाम होने के कारण हिंसा न करके भी हिंसा के फल को भोगता है और जिसके परिणाम में हिंसा का परिणाम नहीं है बल्कि दया का परिणाम है उसके शरीर से हिंसा हो जाये तो भी हिंसा का फल नहीं मिलता । देखिये सब वर्णनों में आधार को न छोड़िये । रागद्वेष मोह परिणाम होना हिंसा हैं और रागादिक भावों की अनुत्पत्ति अहिंसा है । कोई जीव थोड़ी भी हिंसा करता है और समय पर उसे बड़ी हिंसा का फल भोगना पड़ता है । कोई जीव से बड़ी हिंसा भी होती है पर उदयकाल में थोड़ी ही हिंसा का फल भोगना होता है । ये सब बातें कही जा रही हैं मौलिकता स्वरूप का विरोध न करके । एक साथ कई जीवों ने कोई हिंसा की, किसी को हिंसा का बड़ा फल मिला और किसी को हिंसा का अल्प फल मिलता है कोई जीव हिंसा नहीं कर सका, पर फल पहिले ही भोग लेता है । हिंसा एक करे फल बहुत भोगे, बहुत मिलकर हिंसा करें, फल एक भोगे, इस प्रकार अनेक बातें जो अज्ञानी जनों को ये शंका और आश्चर्य का कारण बनती हैं, किंतु नयों के मर्म को जानने वाले गुरुवों का उपदेश पाकर जो निर्मल बुद्धि वाले विशुद्ध श्रोता है उनमें मोह नहीं प्राप्त होता अर्थात् जिन वचनों में कोई कुतर्क अथवा उल्टी बात का ग्रहण नहीं करते ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय_-_श्लोक_90&oldid=81827"
Categories:
  • पुरुषार्थसिद्धिउपाय
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 17 May 2021, at 11:56.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki