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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 96

From जैनकोष



पैशून्यहासेगर्भं कर्कशमसमंजसं प्रलपितं च ।

अन्यदपि यदत्सूत्रं तत्सर्व गर्हितं गदितम् ꠰꠰96꠰꠰

गर्हित वचन का विवेचन―जो वचन चुगली रूप में हों, हंसी मजाक वाले हों, कठोर हों, मिथ्या श्रद्धान् से भरे हुए हों और जो वचन आगमशास्त्र के विरुद्ध हो वे सब वचन निंद्य वचन कहलाते हैं । चुगली वाले वचन तो अनर्थ के लिये हैं, चुगली करने वाला पुरुष खुद हैरान हो जाता है । यहाँ की बात वहाँ मिलाना, उसमें अपना समय बरबाद करना और साथ ही साथ यह शंका बनाये रहना कि कदाचित् इसका असली मर्म इन दोनों को विदित हो जाये जिसकी चुगली की जा रही है तो उसकी परिस्थिति बड़ी खोटी होगी । उसके यह शंका बनी रहती है । और फिर बिना प्रयोजन के जो यह चुगली की जा रही है इससे दिन अटपटा सा हो जाता है फिर उसका चित्त स्थिर नहीं रहता इससे चुगली के वचन झूठ वचन कहलाते हैं, उसमें थोड़ी बहुत सच्चाई भी भरी हो लेकिन छुपकर, एक दूसरे से बैर बनाने का जो यह प्रयत्न है और उस प्रयत्न में जो वचन बोले जाते हैं वे वचन हिंसारूपी ही हैं, क्योंकि इस चुगली करने वाले का परिणाम तो बहुत खोटा ही हो गया । बाद में वह दूसरों का अनर्थ करने का यत्न कर रहा है । अत: मिथ्या वचन है । इसी तरह हंसी मजाक करने वाले वचन असत्य वचन हैं । कहते हैं ना कि रोगों की जड़ खांसी और झगड़े की जड़ हांसी । हंसी मजाक का वचन तो तत्काल भी अनर्थ के लिये हैं हंसी से विवाद शुरू होकर बाद में एक दूसरे का सर्वस्व लुट सकता है । तो हंसी मजाक के वचन अनर्थकारी हैं । इसी तरह मिथ्या विश्वास से भरे हुए वचन असत्य वचन हैं । जैसे देवी दहाड़े की पूजा और भी मनोकामनाओं के लिये अनेक देव कुदेव गुरुवों की पूजा ये सब मिथ्या श्रद्धान भरे वचन है । किसी को कोई मिथ्यात्व में लगाने वाला उपदेश दे तो वे वचन भी मिथ्यावचन हैं । जो ज्यादा बोले, गपसप करे तो वे वचन भी असत्य वचन माने गये हैं । ज्यादा बोलने में कुछ वचन निंद्य अथवा अहितकर निकल जाते हैं, उससे खुद को भी बड़ा पछतावा होता है और वातावरण भी अशांत बन जाता है इस कारण प्रलाप भरा वचन भी असत्य वचन कहा गया है । इसी प्रकार जो शास्त्र से विरुद्ध वचन हैं वे सब वचन गर्हित कहे गये हैं । मनुष्य की स्थिति वचनों पर ज्यादा निर्भर है । कौन मनुष्य कैसा है इसकी पहिचान वचनों से हुआ करती है । एक दूसरे मनुष्य का विश्वास होना भी वचनों पर निर्भर है । सो सबको विदित ही है । मनुष्यों का परस्पर का संबंध अच्छा हो, बुरा हो यह सब वचनों पर निर्भर है । तब समझ लीजिये कि वचनों की संभाल मनुष्यजीवन को सुखी करने के लिये कितनी अधिक आवश्यक है? जितने झगड़े बनते हैं, एक दूसरे के जानी दुश्मन बनते हैं वे सब वचनों से शुरू होते हैं । सब झगड़ों का मूल है वचनों में कटुता लाना तो क्यों न वचनों की संभालकर बोला जाये? जो वचन निंद्य भी न हों, पाप भरे भी न हों, अप्रिय भी न हों ऐसे वचन बोले जायें । अब इन चार प्रकारों में जो सावद्य वचन बताया है उसकी परिभाषा कर रहे हैं ।


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