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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 14

From जैनकोष



पासत्थभावणाओ अणाइकालं अणेयवाराओ ।

भाऊण दुहं पत्तो कुभावणा भाववीएहिं ।।14।।

(24) मुनि वेष धारण कर, खोटी क्रिया करने से दुर्गति―हे आत्मन् ! तूने पार्श्वस्थ आदिक भावनाओं के कारण अनादि काल से अनेक बार खोटी भावना भाने के कारण दुःख को प्राप्त किया है । जो लोग दिगंबर मुद्रा तो धारण कर लेवें, लोक में अपने को साधुपरमेष्ठी कहने का प्रचार करावे और ऐसी ही खोटी क्रियायें करें तो वे जीव भव-भव में दुःख प्राप्त करते हैं । कोई मुनि द्रव्यलिंगी ज्ञानी पार्श्वस्थ भेषधारी होते हैं जो वसति का बनाकर आजीविका करें वे पार्श्वस्थ भेषधारी हैं । जो कोई द्रव्यलिंगी अज्ञानी मोही कुशील हुआ करते हैं जो कषायवान हों और व्रतादिक से भ्रष्ट रहें, संघ का अविनय करें वे मुनि कुशील कहलाते हैं पद-पद पर कषाय करें, गुस्सा आये, अपने में उच्चता जनावें, अपनी प्रशंसा के लिए नाना प्रकार के मायाचार करें और आराम का लाभ करें, व्रतादिक को निभायें ही नहीं और बात-बात में संघ के किसी भी मुनि का अविनय करें या समस्त संघ का अविनय करने वाले शब्द कहें वे कुशील साधु कहलाते हैं । कोई अज्ञानी द्रव्यलिंगी संसक्त साधु होते हैं जो वैभव के प्रयोग द्वारा अपनी आजीविका बनावें, भोजनपान खूब मिले, आराम सत्कार भी मिले । प्रयोजन से दवायें बताकर एक यह ही मुख्य प्रोग्राम रख लिया और उससे फिर अपनी आजीविका करे याने भोजनपान सुंदर प्राप्त करनेका प्रयत्न करें या जीवन की आवश्यक बातों की प्राप्ति का उपाय करें तो वें संसक्त साधु हैं । इसी प्रकार ज्योतिष की बातें बताकर कुंडली बनाना, ग्रहफल बताना आदिक ज्योतिष की बातों द्वारा अपने आपकी प्रतिष्ठा करायें, भोजन पान आदिक की सुगमता प्राप्त करें तो वे हैं संसक्त साधु । ऐसे ही विद्या मंत्रों द्वारा मंत्र प्रयोग करके तंत्र गंडा ताबीज आदिक करके जो अपना महत्त्व बढ़ावे, भोजन पान की सुविधा बनायें वे संसक्त साधु हैं, इसी प्रकार राजा धनिक आदिक पर पुरुषों का प्रशंसक बनकर याने शब्दों द्वारा उनकी प्रशंसा करके जो अपने जीवन की महिमा बढ़ायें वे संसक्त साधु हैं । कोई अज्ञानी मोही द्रव्यलिंगी अवसन्न साधु कहलाते हैं, याने जिनागम के वचनों से प्रतिकूल चलें, चारित्र से भ्रष्ट रहें, अपने कर्तव्यों में आलसी रहें ऐसे भेषधारी साधु अवसन्न साधु कहलाते हैं । कोई मोही अज्ञानी मृगचारी साधु कहलाते हैं । मृग की तरह अकेले स्वच्छंद फिरना, गुरु का आश्रय संग तज देना, जिनेंद्रदेव की आज्ञा का लोप करना, ऐसे भेषधारी अकेले ही रहना पसंद करने वाले मोही साधु मृगचारी कहलाते हैं । जो इस प्रकार की वृत्ति में रहें और ऐसी ही भ्रष्ट भावना रखें सो अनेकों बार इस संसार में जन्म ले लेकर घोर दुःख प्राप्त करते हैं ।


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