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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 36

From जैनकोष



तेयाला तिण्णि सया रज्जूणं लोयखेत्तपरिमाणं ।

मुत्तूणट्ठपएसा जत्थ ण ढुरुदुल्लिओ जीवो ।।36।।

(62) भावलिंग की प्राप्ति बिना समस्त लोक के समस्त प्रदेशों पर अनंतश: जन्ममरण―यह लोक 343 घनराजू प्रमाण क्षेत्र वाला है । इस समस्त लोक के बीच में गोस्तन के आकार याने गाय में थनों के ढंग के 8 प्रदेश मध्य के बैठते हैं याने सर्व युगल दिशाओं से दो प्रदेश बीच में बैठते हैं । यों इन 8 प्रदेशों को छोड़कर कोई प्रदेश ऐसा नहीं रहा जिसमें यह जीव अनंत बार नहीं जन्मा, नहीं मरा । उन 8 प्रदेशों पर बीच के 8 प्रदेश अवगाहकर उत्पन्न हुए हैं । तो परिवर्तन में अन्य-अन्य प्रदेशों की बात निरखी जाती है । तो यहाँ कहा गया है कि सर्व प्रदेशों में यह जीव अनंतबार जन्मा और मरा । उसका कारण यह है कि भावलिंग उत्पन्न न हो सका । भावलिंग में प्रधानता है इस स्थिति की कि जहाँ उपयोग में अविकार सहज ज्ञानमात्र अंतस्तत्त्व में यह मैं हूँ यह प्रतीति रहे, और इस प्रकृति की दृढ़ता से, अनुभव से समस्त बाह्य पदार्थों का ख्याल दूर हुआ, विकल्प दूर हुआ, ऐसी निर्विकल्प समाधि नहीं प्राप्त की इस जीव ने, इस कारण 343 घनराजू प्रमाण लोक में यह अनंत बार उन प्रदेशों पर जन्म मरण करता रहा । इस कथन में क्षेत्र परिवर्तन का संकेत मिलता है । क्षेत्र परिवर्तन में लोक के मध्य के 8 प्रदेशों पर जघन्य अवगाहना में आत्मा के मध्य के 8 प्रदेश रहते हैं और उस प्रकार फिर क्षेत्र परिवर्तन में आगे-आगे बढ़ाया जाता है तो क्षेत्र परिवर्तन की याद दिलाने के लिए यहाँ यह कहा गया है कि लोक के मध्य के 8 प्रदेशों को छोड़ सभी प्रदेशों पर इस जीव ने अनंतबार जन्म मरण किया ꠰ परिवर्तन में भी पुनरुक्त अन्य सब प्रदेशों की गणना नहीं बतायी गई है ।


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