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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 66

From जैनकोष



पढिएण वि किं कीरइ किं वा सुणिएण भावरहिएण ।

भावो कारणभूदो सायारणयारभूदाणं ꠰꠰66꠰꠰

(124) आत्मरुचिरहित पुरुष के पठन व श्रवण की निरर्थकता―सम्यक्त्वभाव से रहित होकर यह जीव अनेक ग्रंथों को पढ़े तो उससे भी क्या लाभ पायगा, अनेक ग्रंथों को सुने तो उससे भी क्या लाभ पायेगा? चाहे वह गृहस्थ हो अथवा मुनि हो, जिसके सम्यक्त्व नहीं वह अटपट विषयों में ही दौड़ लगायेगा । गृहस्थों को प्रकट देखा जाता है विषयों में रहने की बात । मुनिजनों में यह बात प्रकटरूप में नहीं दिख पातीं है मगर जो सम्यक्त्वभाव से रहित है वह मुनि गृहस्थ से भी गिरा हुआ है । गृहस्थ को तो कभी-कभी उपशम हो जाता है । कोई विषयभोग उपभोग की इच्छायें हैं, मन की इच्छायें हैं उनको जुटा दिया, विषयों में तल्लीन हो गया, अनंतर, उपशम हो गया, और कुछ अपना पतन कर लिया, पर जो सम्यक्त्वरहित मुनि है उसके तो सदाचार इच्छा की ज्वाला ही बनी रहती है और मैं मुनि हूँ इस अभिमान के कारण बाह्य में प्रवृत्ति कुछ कर नहीं सकता, इसीलिए बताया है समंतभद्राचार्य ने कि मोही मुनि से निर्मोही गृहस्थ भला है । मोक्ष एक नग्न भेष को देखकर नहीं मिल जाता ꠰ मोक्ष मिलेगा तो सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र की परिणति में मिलेगा । भले ही जो इस परिणति में बढ़ता है वह नग्न मुनिभेष में रहकर ही बढ़ता है, मगर जो भावों में बढ़ता है वही मोक्ष पायगा और जिसे भावों का पता ही नहीं वह तो अन्य संसारी जीवों की भांति संसार में जन्म मरण करता ही रहेगा । तो भावरहित होकर शास्त्र के पढ़ने और सुनने से क्या होता है? इसीलिए शास्त्र भी पढ़ें, सत्संग भी बनाए और कुछ आत्मचिंतन करें, ये तीन काम करता रहे कोई यदि अपने जीवन में तो अवश्य ही वह ज्योति प्रकट होगी जिसके प्राप्त होने से नियम से मोक्ष मिलेगा ।

(125) स्वाध्याय, सत्संग व आत्मतत्त्व की लाभकारिता―स्वाध्याय करें या शास्त्र सुनें और जो धर्मात्माजन हैं उनकी संगति बनाने में समय लगायें और रात दिन के 24 घंटे में किसी भी समय आधा पौन घंटा आत्ममनन के लिए बैठें ये तीन काम प्रतिदिन करें तो वह ज्योति बनेगी कि जिससे यह स्पष्ट हो जायेगा कि मेरा मात्र मैं ही हूँ । मैं केवल अपनी परिणति को ही कर सकता हूँ । अपने भावों पर ही मेरा अधिकार है, अपने भावों का ही मैं स्वामी हो सकता हूँ । अन्य अणुमात्र का भी मैं कुछ नहीं हूँ । और अन्य वस्तुओं के संग प्रसंग से शांति तो मिलना दूर है, प्रत्युत आकुलता ही बनती है । वे मोह में ऐसा निर्णय नहीं कर पाते । मोही जीवों के बाह्य पदार्थों का संबंध नियम से आकुलता ही करने वाला है, पर इस मोह को कुछ कम करके जरा विवेक से सोचें तब यह बात बिल्कुल साफ विदित हो जायेगी, पर पदार्थ का संबंध नियम से आकुलता का ही कारण है । जैसे बड़े जंजाल आ गये, अनेक उल्झनें आ गई, विकल्प दनादन परेशान कर रहे हैं । उपयोग क्षण भर को भी आराम में नहीं आता । पर यह बुद्धि पहले क्यों नहीं बनती? पहले तो कषाय बनी है ना? ऐसा करेंगे, यों भोगेंगे भोग, यों उपभोग करेंगे, यों संपदा जोड़ेंगे, यों अपनी महिमा बढ़ायेंगे । पहले ये कषायें बनी रही, उससे उद्यम किया, मायाजाल में फंस गए । उससे फिर यह अपने को ऊंचा मानता और इतने पर भी भीतर में एक श्रद्धा नहीं बैन पाती कि यह सब परसंपर्क मेरे को विपत्ति में ही डालने वाला है । यह अगर खूब श्रद्धा बन जाये तो यह अब भी चेत जायेगा, विरक्त रहने लगेगा, आत्मा के अभिमुख होने लगेगा, शांति पा लेगा । सो भावरहित होकर धर्म के कुछ भी काम करे जो व्यवहार बताये हैं, पर उनसे कुछ नहीं होता है । भाव याने आत्मरुचि, यह मैं आत्मा ज्ञानस्वरूप हूँ, स्वयं आनंदमय हूँ । मेरा स्वभाव ही ज्ञान और आनंद है, मेरे में मेरे कारण मेरी ही सत्ता से कोई विकार नहीं हैं, हो ही नहीं सकता ।

(126) विकारों का आत्मा पर छाने की रति―ये विकार हैं कर्म के । ये अनुभाग हैं कर्म के । यही कर्म बंधे हैं, कर्म में विकार जगता है, अनुभाग जग रहा है और वह मुझ पर लद गया है । जैसे फिल्म का अक्स सनीमा के सफेद पर्दे पर लग जाता है, वह पर्दा तो बिल्कुल स्वच्छ है, पर ऐसा योग है कि वह सारे क्षेत्र में सफेद पर्दे पर लद जाता है । पर्दा अजीव है इसलिए वह उससे नहीं नचने पाता है, पर यहाँ यह आत्मा तो जीव है । इस पर कर्मों के चित्र लद गए कर्मों का अनुभाग लद गया, उपयोग आया और चूंकि यह जीव है सो यह भी नचने लगा और इस तरह संसार में यह अपनी विडंबना बनाता रहता है । यह सारी विडंबना भावों के बिना है, आत्मरुचि के बिना है, आत्मा की रुचि करें तो नियम से शांति मिलेगी, मोक्ष मिलेगा, बड़प्पन बढ़ेगा और जब तक संसार शेष है तब तक इंद्र चक्रवर्ती जैसे महान पद मिलेंगे । कषायवश होकर बड़े-बड़े उद्यम करके तू वैभववान बनना चाहता है । ऐसे नहीं वैभव मिलता, यह सब धोखा है । तू अपने भावों को संभाल और अपने को ज्ञानभावना में ला । उसका इतना बहुत प्रताप है कि मोक्ष तो होगा ही उसका, पर उससे पहले जब तक वह लोक में रहता है तब तक ऊंचे-ऊंचे वैभवों के साथ रहता है । यदि यह वैभव प्रयास से ही मिला करता हो तो जो बालक करोड़पति के घर पैदा हो गया और बचपन से ही करोड़पति कहलाने लगा, उसने क्या प्रयास किया ? तो एक भावों के सुधारने से ही सब सुधर जायेगा । भाव न सुधरे तो संसार में दुर्गति ही रहेगी । आत्मरुचि करो । अपना जीवन पलटिये अपने जीवन की दिशा मोड़िये । अपने आत्मा को जानें और ऐसा प्रेम से जानें कि मेरा आत्मा ही मेरा हितकारी है । मेरा यह आत्मस्वरूप, ज्ञानस्वरूप ही मेरा शरण है ꠰ यह ज्ञानस्वरूप स्वयं ही आनंदमय है, मैं इस ही में रहूंगा, इस ही को ज्ञान में लिए रहूंगा, अन्य कुछ न ज्ञान में चाहिए । ऐसी दृढ़ता पूर्वक आत्मरुचि तो करें, उससे एक अलौकिक आनंद और चमत्कार स्वयं में उत्पन्न होगा ।

(127) आत्मरुचि का परिचय―जिसको आत्मरुचि हो जाती है उसको बाहरी पदार्थ, बाहरी वैभव ये सब असार ओर बेकार लगने लगते हैं ? उनमें फिर यह ख्याल ही नही फबता ꠰ परिस्थितिवश वे करने पड़ते हैं । उनके करने की उमंग नहीं रहती । उमंग रहती है अपने को ज्ञानस्वरूप भावना भाने में । कर्मोदयवश ज्ञान भावना में नहीं रह पाता, मगर धुन इसकी लगी ही रहती है । आत्मरुचि हुई है या नहीं हुई है, इसकी पहिचान यह है कि बाकी सब वैभव इसको बेकार जचें तो समझो कि आत्मरुचि हुई और यदि बाहरी वैभव, घटनायें ये सब सारभूत लगें और उनके लिए ही उमंग बने तो समझिये कि आत्मरुचि नहीं है ।


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