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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 87

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बाहिरसंगच्चाओ गिरिसरिदरिंकदराइ आवासो ꠰

सयलो णाणज्झयणो णिरत्थओ भावरहियाणं ꠰꠰87꠰꠰

(265) सहज ज्ञानज्योति की उत्तमवैभवरूपता―सबसे बड़ा वैभव क्या है, जरा नाम ले-लेकर और उसका सही-सही स्वरूप विचार-विचारकर चिंतन तो करें ꠰ सबसे बड़ा वैभव क्या यह मकान है ? अरे यह तो अभी कुछ दिन पहले ही बना है और कुछ ही दिनों में मिट जायेगा, मिट्टी पत्थर का है, जड़ है, यह मेरा वैभव नहीं ꠰ तो क्या कुटुंब परिवार ये जगत के जीव यत्र तत्र घूमने वाले वैभव हैं ? अरे संयोग वश एक घर में आ गए, पर हैं ये सब अत्यंत निराले जीव और उनके साथ उनके कर्म बंधे हैं और उन कर्मों के उदय से उनको सुख दुःख भोगना पड़ता है, मेरे को तो उनसे कुछ संबंध ही नहीं, न मैं उनका कुछ कर पाता न वे मेरा कुछ कर पाते, स्वतंत्र सत्ता वाले हैं वे मेरे वैभव नहीं ꠰ तो क्या मेरा वैभव यह शरीर है ? शरीर भी मेरा वैभव नहीं, ये भी पुद᳭गल हैं, जड़ हैं, मैं आत्मा चेतन हूं ꠰ और फिर यह मलिन है, रूप, रस, गंध, स्पर्श का पिंड है, अनेक रोगों का घर है ꠰ जितने लोग यहाँ दिख रहे उन सबके कोई न कोई रोग लगा है ꠰ किसी को महसूस नहीं होता और किसी को महसूस होता ꠰ आपत्ति का स्थान है यह शरीर, यह महा अपवित्र दुर्गंधमय है, यह मेरी चीज नहीं है ꠰ तो फिर मेरा क्या है ? मेरी ज्ञान ज्योति मेरा तत्त्व है ꠰ उस ज्ञान ज्योति का विचार करें ꠰

(266) ज्ञानस्वरूप में ज्ञान को उतारे बिना व्रतादिक की विफलता―सहज ज्ञानज्योति जिसको नहीं मिली, अपने आत्मा के स्वरूप का जिसको परिचय नहीं हुआ, ऐसे पुरुष की बाहर की धर्म की बातें सब निरर्थक हैं ꠰ बाह्य पदार्थों का त्याग कर दिया और उसके प्रति खोटी भावना की वृत्ति छुटी नहीं तो उन बाह्य पदार्थों का त्याग करना निरर्थक रहा ꠰ अभी तंदुल मत्स्य का उदाहरण था कि वह पहले था एक राजा, उसने मांस का तो त्याग कर दिया और शर्म के मारे खा सके नहीं तथा भीतर में मांस खाने की तीव्र रुचि थी उसकी, वह ही तो मरकर तंदुल मत्स्य हुआ, और तंदुल मत्स्य ने भी यही कार्य किया, मरकर नरक में गया ꠰ तो जो भावरहित पुरुष है वह कुछ भी वृत्ति कर ले और यहाँ तक कि बाह्य पदार्थों का त्याग कर दिया तो भी उनका यह त्याग निरर्थक है ꠰ वे किसी गुफा में एकांत में रहें या नदी के किनारे रहें या किसी कंदरा में रहें, उनका ऐसा एकांत में रहना भी निरर्थक है, क्योंकि भावना तो गंदी है, कषाय रखने की है, विषय भोगने की है और अज्ञानी जीव जिनको आत्मस्वरूप का परिचय नहीं हुआ है वे यदि ज्ञान और अध्ययन का भी कार्य करें तो उतना ही तो काम कर पायेंगे कि शास्त्र खोला और बांच लिया, कुछ अर्थ भी समझ लिया, पर वह चित्त में उतरे, ये बात वे नहीं कर सकते ꠰ तो फिर उनका यह ज्ञानध्यान भी सफल नहीं है, इस कारण जिस ज्ञान ज्योति की कृपा से व्रत तप आदि सफल होते हैं, आत्मा में निराकुलता जगती है उस सम्यक्त्व भावना को भावो ꠰

(267) शुद्ध अंतस्तत्त्व के मनन बिना बाह्य संगत्याग आदि की निरर्थकता―अपने आत्मा का ऐसा चिंतन करो कि मैं सबसे निराला ज्ञानस्वरूप हूं, जो कुछ मैं करता हूं अपने में ही कर रहा हूं ꠰ अपने से बाहर कुछ कर ही नहीं सकता ꠰ ऐसे शुद्ध बुद्ध एक स्वभाव से तन्मय आत्मा की भावना जो नहीं करता है उनका बाह्य परिग्रहों का त्याग करना निरर्थक है ꠰ भीतर लालसा बने तो वह त्याग किस काम का ? बड़े-बड़े तप भी कर डालें तो भी शुद्ध भाव नहीं हैं ꠰ तो कर्म यह नहीं देखते कि ये पर्वत पर बैठे तपश्चरण कर रहें मैं इनसे न बंधूं ꠰ कर्मों का निमित्तनैमित्तिक संबंध तो अपने आत्मस्वभाव के साथ है, सो अपने ही भाव में शुद्धि करें तो कर्मों से छूटें और उनसे लगाव रखें तो कर्मों से लिपटें ꠰ दरिद्र मनुष्य भी तो परिग्रह से रहित हैं, उनके पास क्या है ? टूटी फूटी झौंपड़ी है, मगर उनका कोई शुद्ध भाव है क्या ? निरंतर संक्लेश रहता है, तृष्णा बनी रहती है, ऐसे ही बाह्य परिग्रह का कोई त्याग कर दे तो ऐसे भी मनुष्य मिल सकते हैं जो नग्न हैं, वस्त्र त्याग दिया, घर त्याग दिया पर उससे फायदा क्या ? फायदा तो तब है जब कि अंतरंग परिग्रह का भी त्यागी हो ꠰ जो बाह्य आभ्यंतर दोनों प्रकार के परिग्रहों का त्यागी है वह इस लोक में बड़ा सुखी है ꠰ भीतर की एक कील ही तो निकालना है ꠰ एक अपने स्वरूप का अलौकिक वैभव ही तो निरखना है कि यह मैं ज्ञानस्वभावमात्र हूं, तो ऐसे ज्ञानस्वभाव की भावना जिनके हैं उनके शुद्धता बढ़ती है और जो पर के मोह लगाव में ही रहते हैं उनकी दुर्गति होती है । बहुत मोटी बात यह सोचें कि छूट तो सब जाना है । जो छूटेगा नियम से उससे मोह ममत्व क्यों करना? मेरा ज्ञान मुझसे न छूटेगा । इसलिए अपने ज्ञानस्वभाव में ही प्रीति रखना । मैं यह हूँ यह भावना ऐसी दृढ़ बने कि उसे यह भी ध्यान में न रहे कि मैं अमुकचंद हूँ, अमुक लाल हूँ । दूसरा कोई पुकारे भीतो झट सुनने में न आये और न बाहर की ओर कोई आकर्षण हो । एक निज ज्ञानस्वरूप की ही भावना निरंतर चित्त में रहे । तो हे कल्याणार्थी मुने, इसी तरह का पौरुष करो कि ज्ञानस्वरूप ज्ञानज्योतिर्मय सिद्ध स्वरूप के समान मेरा आत्मस्वभाव मेरे ज्ञान में रहे । मैं इतना ही हूँ और इसमें जो कुछ देखने जानने का काम हो रहा वही मेरा वास्तविक कार्य है, ऐसा ध्यान में लायें और मोह मिथ्यात्व को दूर करें, यही परमार्थ सिद्धि का उपाय कहलाता है ।


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