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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 24

From जैनकोष



अइसोहणजोएणं सुद्ध हेमं हवेइ जह तह य ।

कालाईलद्धीए अप्पा परमप्पओ हवदि ।꠰24꠰꠰

आत्मशोधन का उपाय―आत्मा परमात्मा कैसे होता है इसका वर्णन इस गाथा में किया है । इसके लिए एक उदाहरण लिया है कि जैसे अत्यंत शुभ सामग्री से, शोधन सामग्री से, सुहागा आदिक वस्तुओं से स्वर्ण शुद्ध किया जाता है इसी प्रकार काल आदिक लब्धियों से आत्मा परमात्मा होता है । अशुद्ध स्वर्ण को शुद्ध करने की कोई तरकीब है,उस उपाय बिना वह शुद्ध नहीं हो पाता, ऐसे ही इस अशुद्ध आत्मा की शुद्धपरिणति करने की तरकीब है तो वह क्या है कि योग्य द्रव्य मिले, योग्य क्षेत्र हो, योग्य काल हो और योग्य भाव हो तो उसे मुक्ति की प्राप्ति होती है । जैसे अन्य भवों से मुक्ति नहीं मिलती तो मनुष्यभव का लाभ क्या ? अन्य क्षेत्रों से मुक्ति नहीं मिलती, ढाई द्वीप के अंदर से मुक्ति होती है सो भी कर्मभूमियां में उत्पन्न हुए की मुक्ति होती है, भोगभूमि में उत्पन्न हुए की मुक्ति नहीं है । योग्य काल हो, संहनन हो, चतुर्थकाल या विदेह क्षेत्र का समय हो, योग्य भाव हो, आत्मा के अविकार स्वरूप पर दृष्टि हो तो मुक्ति मिलती है, बाह्यपदार्थों में दृष्टि लगी रहे उससे तो संसार ही बढ़ता है । तो योग्य सामग्री मिलने पर यह आत्मा परमात्मा हो जाता है ꠰ अब अपने को क्या करना चाहिए ? पहले तो यह निर्णय बनायें कि मुझे संसार में नहीं जमना है, संसार से मुक्त होना है, नेमिनाथ भगवान के समय की एक घटना है । जब श्रीकृष्ण, बलदेव, प्रद्युम्न आदिक सभी समवशरण में गए थे । नेमिनाथ का धर्मोपदेश चल रहा था, वहाँ प्रसंगवश किसी के पूछने पर यह बात आयी कि यह द्वारिकापुरी 12 वर्ष में भस्म हो जायेगी और यह द्वीपायनमुनि के कारण भस्म होगी, तो उस समय कोई श्रावक व्रत में लगा, कोई मुनिधर्म में लगा । संसार की असारता जानी तो भरी सभा में जबकि श्रीकृष्ण का दरबार लगा हुआ था वहाँ प्रद्युम्न खड़े होकर बोला कि भगवान की वाणी में जो आया सो सबने सुना । अब जिसका जो कर्तव्य हो सो करो, मैं तो विरक्त होता हूँ, और अब मैं यहाँ से छूटकर जाऊ̐गा । तो बहुत से लोगों ने कहा कि तुम अभी बच्चे हो, तुम्हारे तो अभी पिता बैठे हैं और पिता के भी पिता बैठे हैं तुम छोटी उम्र के छोकरे होकर क्यों सबको छोड़कर वन में तपश्चरण करने की बात कहते हो ? तो प्रद्युम्न उस समय कहता है कि जिसको संसार का खंभा बनकर रहना हो वह रहे, चाहे बाप हो चाहे बाबा, पर मुझे संसार का खंभा बनकर नहीं रहना है । यह कहकर प्रद्युम्न चल दिया । अब चल तो दिया पर ख्याल आया कि चलते-चलते स्त्री से तो बता दें कि हम विरक्त हो गए, सो वह स्त्री के पास पहुंचा और बोला कि अब हम विरक्त हो गए, अब हम अपना आत्मकल्याण करेंगे, तुम को भी यही काम कर लेना चाहिए । तो वहाँ वह स्त्री बोली―अरे ! अभी तुम विरक्त कहां हुए । अगर विरक्त होते तो हमारे पास बताने आने की क्या जरूरत थी ? संसार में बहुतसी स्त्रयां हैं, अन्य किसी से कह देते, खैर तुम चाहे जब विरक्त होना, पर मैं तो यह चली । लो, वह तो विरक्त होकर निकल पड़ी । तो देखिये, जब द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव योग्य मिलते हैं तब वहाँ मोक्षमार्ग चलता है ।

अपने प्राप्त सुयोग का सदुपयोग करने का अनुरोध―अब आप हम सब लोग अपनी-अपनी स्थिति पर विचार करें, आप सबने श्रेष्ठ मन पाया है, करीब-करीब द्रव्य सबको योग्य मिला है, उच्च कुल में उत्पन्न हुए, जिनवाणी के शब्द सुनने को मिलते हैं, आजीविका चलाने के लिए सबके पास पर्याप्त साधन भी हैं । सब बातें अच्छी मिली हैं । क्षेत्र भी भरत क्षेत्र मिला है । भरत क्षेत्र का यह आर्यखंड है इसमें अभी धर्म की परंपरा इस पंचम काल के अंत तक चलेगी । हाँं इस काल में मोक्ष नहीं है, संहनन योग्य न होने से, सो उस प्रकार का ध्यान नहीं बन पाता कि जिससे मोक्ष मिले, मगर मोक्षमार्ग तो मिल रहा है । मोक्ष कुछ भव बाद मिल जायेगा पर मोक्षमार्ग अब भी इस पंचम काल में चल रहा है, क्षेत्र भी ठीक है, काल भी ठीक है, भाव भी ꠰ यह सब अपनी-अपनी बात है, अपने में जानें । अपने को अकेला समझें, जो कुछ भी मैं कर रहा हूँ उसका मैं ही अकेला जिम्मेदार हूँ दूसरा कोई जिम्मेदार नहीं हो सकता । वस्तु का स्वरूप ही ऐसा है कि एक जीव के किए गए कृत्यों का जिम्मेदार कोई दूसरा जीव नहीं हो सकता । तो जरा अपने आप पर भी कुछ दया आनी चाहिए । परिवार धन वैभव इज्जत प्रतिष्ठा आदिक जो-जो हो रहे हैं वे सब पुण्योदय से हो रहे । पुण्य के उदय में ये सब समागम मिले हैं और इन समागमों में मस्त होने से पाप का बंध होता है । और जो पाप का बंध होगा तो वह जब फल देगा दुःखी होना पड़ेगा ꠰ इनमें ज्ञाता-दृष्टा रहना, यह जिनेंद्र देव का उपदेश है । हम सबके जाननहार रहें । मेरा एक परमाणुमात्र भी नहीं है ऐसी दृढ़ श्रद्धा रखें । तो इस समय मौका मिला है, त्रस पर्याय है । इस त्रसपर्याय को असंख्याते कोड़ाकोड़ी सागरों बाद केवल दो हजार सागर मिलते हैं, दोइंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रिय और पंचेंद्रिय, ऐसा मौका अधिक-से-अधिक दो हजार सागर का मिलता । मगर यह मनुष्य पर्याय यों ही खो दी और त्रसपर्याय यदि अंत होने को है तो फल है कि एकेंद्रिय ही होना पड़ेगा, और एकेंद्रिय आदिक हो गए फिर क्या करेंगे ? जो पेड़ खड़े हैं वे भी तो हमारी ही तरह जीव हैं, यदि ये ही बन गए तब फिर अपना कल्याण कैसे कर सकते हैं ? या जब एकेंद्रिय जीव थे तब क्या कर सकते थे ? आज अपने को बहुत उपाय मिले हैं । हम अच्छी भावनायें बना सकते हैं । अनेक लोग तो बिना प्रयोजन ही खोटी भावनायें बनाते रहते हैं उससे पता नहीं उन्हें क्या लाभ होता ? जैसे अमुक मिट जाये, बरबाद हो जाये, अमुक मेरा दुश्मन । अरे ! इस जगत में कोई किसी का दुश्मन हो ही नहीं सकता । यदि आप कहें कि दिख तो रहा है कि कोई किसी से दुश्मनी बांधे फिरता है, कोई किसी को मारने को तैयार है, कोई किसी को बरबाद करने को तैयार है । हाँं ठीक है, हैं तैयार मगर उस दुश्मनी के कारण ऐसा करने को तैयार नहीं हैं किंतु उन्हें ऐसी समझ है कि मुझे ऐसा करने से सुख शांति मिलेगी । सो सुख शांति पाने के उद्देश्य से वैसा करता है न कि किसी की दुश्मनी से । वह चेष्टा करता है अपनी सुख शांति पाने की, मगर वह विरोध जंचने लगता है । मान लो, कोई आपको गाली दे रहा तो वह कहीं आपको दु:खी करने के लिए गाली नहीं दे रहा, किंतु अपने सुख शांति के लिए इस प्रकार का उद्यम कर रहा । वैसे लगता है बाहर में ऐसा ही पर भीतर में कारण यह ही है । तो जगत में सब जीव एकस्वरूप हैं । जैसे मेरा चैतन्यस्वरूप वैसे सबका स्वरूप, पर कर्म का उदय होने से उसमें अंतर पड़ गया है । सब जीवों को एक समान निरखें और अपने से उनको भिन्न निरखें । मेरा कोई नहीं, और सब मेरे स्वरूप के समान हैं, तो सद्भावना जगेगी । तो ऐसे मनुष्यभव को पाकर यदि हमने सद᳭भावना न की, दुर्भावना की तो इसका फल है कि नारकादिक खोटी गतियों में जन्म लेना पड़ेगा । यहाँ कुंदकुंदाचार्य समझा रहे हैं कि योग्य द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव मिले हैं तो अपने आपको मोक्षमार्ग में लगाना चाहिए ꠰


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