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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 55

From जैनकोष



आसवहेदू य तहा भाव मोक्खस्स कारणं हवदि ।

सो तेण दु अण्णाणी आदसहावा दु विवरीदो ꠰꠰55꠰꠰

आस्रवहेतु व मोक्षकारण एवं मोक्षलाभ का आधार भाव―यह जीव जैसा स्वरूप है वैसा ही अकेला होता तो इसको कोई कष्ट नहीं रहता, देखिये, ऐसे सिद्ध भगवान हैं । जिस आत्मा का जितना जो स्वरूप है वही मात्र रह गया, अन्य कुछ साथ नहीं है, यह है सिद्ध भगवान का स्वरूप और उनको कोई कष्ट नहीं । तो जैसा स्वरूप सिद्ध भगवान के प्रकट हुआ है वैसा स्वरूप मेरे में अब भी है, पर वह ढंका है, प्रकट नहीं हो पाता । तो जब मेरा स्वरूप ढंका है तो बाहरी विषयों में लग रहा है खुद तो इसके ज्ञान में आ नहीं रहा और जानने का इसका स्वभाव है तो यह परद्रव्यों को जान-जानकर और रागभाव के कारण उनमें इष्ट और अनिष्ट की कल्पनायें करता है ꠰ सो जैसे इष्ट विषय का राग कर्म के आस्रव का कारण है ऐसे ही मोक्ष का भी राग कर्म के आस्रव का कारण है । यहाँ बहुत सूक्ष्मता से बात कही जा रही है, ज्ञानी पुरुष जिसने आत्मस्वरूप को जाना, यह हूँ मैं ज्ञानमात्र, तो इस ज्ञान के फल में उसकी यही वृत्ति चलेगी कि अपने को ज्ञानमात्ररूप से बस निरखता रहे और ऐसा ही अनुभव करता रहे, उसके अन्य विकल्प न होंगे, और इस ज्ञानमात्र भावना के फल में मोक्ष हो जायेगा उसका, पर वह मोक्ष की आशा नहीं कर रहा, इच्छा नहीं कर रहा, लोक के अंत में जो सिद्धालय है उस पर भी आकर्षण नहीं कर रहा वह तो अपने ज्ञानमात्र स्वरूप को निरख रहा है । ज्ञानी की असली वृत्ति यह कहलाती है ꠰ जिसको अपने ज्ञानस्वभाव का परिचय नहीं वह बाहर में यह मोक्ष है, यह लोक के अंत में है, यह ऐसा-ऐसा करने से मिलेगा इन विकल्पों को करके मोक्ष का राग बना रहा है, पर ज्ञानी जीव जैसे बाह्य पदार्थों का राग नहीं बनाता ऐसे ही वह मोक्ष का भी राग नहीं बनाता । वह अपने स्वभाव को ही निरखता है और उसको फल में स्वयं मोक्ष मिल जाता है । तो जो रागभाव लाये सो अज्ञानी है और जो आत्मस्वभाव में लगे सो ज्ञानी है, याने राग को न करने का इतना कठिन आदेश दिया है कि तुम मोक्ष का भी राग मत करो, अन्य के राग का तो अत्यंत निषेध है ही । मोक्ष का भी राग मत करो, किंतु अपने आपको स्वभावमात्र देखो ।

स्वभावोपलब्धि में धर्मपालन―धर्मपालन वास्तव में किसे कहते हैं? मंदिर आये, स्वाध्याय किया, पूजा की, गुरु प्रसंग किया, त्याग, दान, व्रत आदिक किया, सब कुछ भी करते गए मगर अभी वह धर्मपालन नहीं कहलाता । वास्तव में धर्मपालन है अपने आपको ज्ञानमात्र ही निरखते रहने में । मैं अन्य कुछ नहीं हूँ, अन्य कुछ भी मेरा कार्य नहीं है, जो मेरा स्वरूप है उसे ही देखें, स्वरूप से अपने आपका जो परिणमन है उस रूप परिणमे, यह है धर्मपालन । किंतु ऐसा धर्मपालन जिसके नहीं बन पा रहा और चाह रहा कि मेरे धर्मपालन हो, वास्तव में उसको ये बाहरी रागद्वेष ममता आदिक सता रहे हैं, तो उन व्यसनों को दूर करने के लिए तत्काल यह उपाय है कि मंदिर आवें, दर्शन करें, स्वाध्याय करें, शास्त्र सुनें, गुरुसेवा करें; व्रत, शील, संयम से रहें, तो यह पाप की बात भीतर न आयगी । सो यह व्यवहार में जितना भी हम धर्म करते हैं उससे हमने एक अपना व्यूह बना लिया, एक किला बना लिया, हम उस व्यवहारधर्म में रहकर सुरक्षित हो गए कि हममें अब पाप के भाव न आयेंगे । इतना तो फायदा मिला इस व्यवहार धर्म से मगर कर्म जो कटेंगे और भीतर का विकार-संस्कार जो मिटेगा सो वह मिटेगा आत्मस्वभाव की दृष्टि से और अनुभव से, इसलिए वास्तव में धर्म है आत्मस्वभाव का अनुभव । तो यह जीव बस आत्मस्वभाव के अनुभव के पुरुषार्थ में रहता है वह न बाह्य पदार्थ का राग करता है और न उसके मोक्षविषयक राग है ।

धर्मपालन के विषय में अज्ञानी और ज्ञानी पुरुषों की वृत्ति―रागभाव के कारण ही जीव अज्ञानी है, और जो आत्मस्वभाव में लगा है वह ज्ञानी है । जैसे कि बहुत से लोग धर्ममार्ग में लगे ही हैं और मोक्ष की चर्चा करते हैं कि मुझे तो मोक्ष चाहिए, अन्य कुछ न चाहिए, ऐसी भावना भी रहती है और बहुत-बहुत इन धर्म के कामों में समय भी देते हैं और कदाचित घर से थोड़ी भी खबर आ जाये कि तुम्हारा लड़का घर में फिसल कर गिर पड़ा है तो उनका वह धर्म-कर्म सब वहीं धरा रह जाता है, झट छोड़कर घर पहुंचते हैं । तो यह घटना इस बात का प्रमाण है कि उनका जितना भी समय धर्मपालन में लगता है वह सब एक मनोविनोद के लिए समझिये, वहाँ धर्मपालन कुछ न था, अन्यथा उसे क्षोभ न होता, और जो पुरुष आत्मस्वभाव की दृष्टि में रहता है और अपने को अविकार ज्ञानस्वभावमात्र निरखने की धुन बनाये रहता ꠰ वह कदाचित गृहस्थी में भी रहे और उसको ऐसी घटना सुनने में आये तो भी साधारणतया भले ही कुछ कर्तव्य करेगा पर अंतरंग में वह क्षुब्ध नहीं होता और तत्काल तो उसे ऐसा लगता है जैसे कि मोही जीव को कुछ अन्य घटना-सी लगती है । उसे भी वह अन्य घटना की तरह मानता है । तो यहाँ यह बतला रहे कि रागभाव किसी का भी हो वह कर्म का आस्रव करायगा । तो मोक्ष का कारण क्या रहा? निर्विकल्पसमाधि, और ज्ञानस्वरूप आत्मा ही ज्ञान में रहना―यह मोक्ष का कारण है । मोक्ष की चाह मोक्ष के पाने का कारण नहीं है । मोक्ष की चाह तो बाधक है मोक्ष के मिलने में । मोक्ष की चाह से मोक्ष मिलना बंद रहता है और मोक्ष की भी चाह न करके एक ज्ञानमात्र अपने स्वरूप को ज्ञान में बनाये रहना यह मोक्ष का कारण बनता है । हाँं इतना अंतर है कि घर वैभव, स्त्री पुत्र, समाज मित्र आदिका राग पापबंध का कारण है और मोक्ष का राग पुण्यबंध का कारण है, इतना तो अंतर आ जायेगा क्योंकि घर की ओर अब उसकी दृष्टि नहीं रही और मोक्ष की तरफ उसकी चाह बन रही, सो पुण्यबंध तो हो जायेगा, पर मोक्ष न मिलेगा । मोक्ष तो तब मिलेगा जबकि मोक्ष की चाह भी न हो, केवल अपने स्वभाव की ओर ठहरे उससे मोक्ष प्राप्त होता है ꠰ सो जो किसी भी विषय का राग करता है वह अज्ञानी है और जो निर्विकल्पसमाधिरूप आत्मस्वभाव का उपयोग रखता है वह ज्ञानी है ।


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