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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 65

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दुक्खे णज्जइ अप्पा अप्पा णाऊण भावणा दुक्खं ।

भावियसहावपुरिसो विसएसु विरच्चए दुक्खं ꠰꠰65।।

आत्मज्ञान की दुर्लभता व महिमा―यह आत्मा बड़े कष्ट से जाना जाता है मायने बड़ा दुर्लभ है आत्मा का ज्ञान होना । अब तक अनंतकाल खोया, पर इसका उपयोग पर पदार्थों में ही लगा रहा, इसने अपने आपकी सुध नहीं ली, और इस बेसुधी के कारण नाना कष्ट भोगे । कर्म भी उस ही प्रकार के बंधे जिसके उदय में इसको एकेंद्रिय दोइंद्रिय आदिक खोटी-खोटी दशावों में जन्म लेना पड़ा । यह सब एक नियोग है, निमित्तनैमित्तिक योग है कि आत्मा यदि अपने को नहीं जान पाता है तो वह जानने का स्वभाव रखता है ना? किसी को तो जानेगा । यह बाह्य को जानता है और बाह्य में ही श्रद्धा रखता है और बाह्य में ही रमता है । बड़े-बड़े वैभव प्राप्त हो जायें वह सरल है, राजपाट मिल जाये वह सरल है, पर आत्मा का ज्ञान पाना कठिन है । एक दृष्टि से देखो तो आत्मा का ज्ञान पाना कठिन नहीं, क्योंकि आत्मा ही ज्ञानस्वरूप है । अपने ज्ञान से अपने आपको जान लेना कोई कठिनाई की बात नहीं है, लेकिन दृष्टि इसकी विपरीत है सो इसको बाह्य परिग्रहों का संचय करना तो सरल लग रहा और आत्मा का ज्ञान करना कठिन लग रहा, और शांति मिलेगी तो उसका आधार आत्मज्ञान है । तो आत्मा का ज्ञान पाना एक बड़ी कठिनाई से होता है ।

आत्मभावना की दुर्लभता व महिमा―आत्मा का ज्ञान हुआ, अब उसे जानकर आत्मा की भावना आना यह और भी कठिन बात है । आत्मा का कुछ थोड़ा शब्दों से, कुछ भीतर सोचकर मनन से ज्ञान बन गया, पर यह भावना बनना कि मैं ऐसा ही जानूं? अपने में ही रहूं ! स्वयं का स्वभावदर्शन होना यह ही उत्तम वैभव है, यह ही शरण है । मुझे बाहर में कुछ न चाहिए, आत्मदृष्टि मेरी अचलित रहे, केवल यह ही मेरे को आवश्यकता है, क्योंकि आत्मदृष्टि अचलित हुए बिना आत्मा का भला नहीं हो सकता । बाह्य पदार्थों की भावना न रहे, अन्य पदार्थों के परिग्रह की बात न रहे, किंतु एक अपने आपमें अपनी भावना की ही उमंग उठती रहे यह बात और भी कठिन है । तो इसका आधार तो आत्मज्ञान है, पर आत्मज्ञान किए बाद फिर उस आत्मा की ही भावना बनी रहे यह आवश्यक होता है । सो यह आत्मज्ञान से भी अधिक कठिन है, क्योंकि आत्मज्ञान करने वालों की संख्या जितनी हो उनमें आत्मभावना वालों की संख्या थोड़ी होती है और आत्मभावना किए बिना ये रागद्वेष नहीं सूखते, कर्मबंध दूर नहीं होता, सो आवश्यक है आत्मभावना । मैं यह हूँ दर्शन-ज्ञानस्वरूपी, सहज आनंदमय, परभावों से रहित, अपने-ही-अपने में परिणमने वाला, अपने को ही अपने में भोगने वाला । यह मैं चैतन्यमात्र आत्मा हूँ, और यह मैं खुद आनंदमय हूँ, इस प्रकार की बार-बार की जो भावना है, अनुप्रेक्षा है, मनन है, यह आत्मभावना है । यह आत्मभावना आत्मज्ञान से भी कठिन है ।

विषयविरक्ति की दुर्लभता व हितकारिता―अब तीसरी बात देखिये, वह कितनी कठिन है । जीव ने आत्मज्ञान कर लिया, आत्मभावना भी भायी और अपने स्वभाव की बहुत भावना कर रहा मगर विषयों से विरक्त होना यह उससे भी कठिन है । विषयों से विरक्ति नहीं है तो यह आत्मभावना और यह आत्मज्ञान ये तो गजस्नानन की तरह बने कि जैसे हाथी ने स्नान कर लिया उस समय तो वह ठीक हो गया, पर बाहर निकलकर अपनी सूंड से अपने शरीर पर धूल भी डाल ली । सो आत्मज्ञान किया, आत्मभावना की, लेकिन विषयों में फिर राग रहा, विषयों से विरक्ति न कर सका तो उसका इतना बड़ा पौरुष कर लेना यह गजस्नान की तरह हो गया । सो तीसरी बात यह कि विषयों से विरक्त होना ꠰ यह और भी कठिन है । तो इससे यह जानना कि विषयों से विरक्त होने का आधार आत्मस्वभाव की भावना है और आत्मस्वभाव की भावना का आधार आत्मज्ञान करके आत्मस्वभाव की भावना बढ़ायें और आत्मस्वभाव की भावना से ऐसा बढ़िये कि विषयों का राग न रहे, सो जब विषयों का राग न रहा ऐसी स्थिति आये, तब समझिये कि हमने मोक्षमार्ग में अपना कदम बढ़ाया है ।


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