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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 8

From जैनकोष



बहिरत्थे फुरियमणो इंदियदारेण णियसरुवचुओ ।

णियदेहं अप्पाणं अज्झवसदि मूढविट्ठीओ ꠰꠰8।।

बाह्यअर्थों में मन के स्फुरण से आत्मा की निजस्वरूप से च्युति―बहिरात्मा का दूसरा नाम मिथ्यादृष्टि है, मूढ़दृष्टि है । यह मूढ़दृष्टि बाह्य अर्थ में मन को स्फुरित करता हुआ इंद्रिय के द्वारा अपने स्वरूप से च्युत होकर निज देह को आत्मा मानता है । दर्शनमोह के उदय में इस जीव को अपने आपके स्वरूप का परिचय नहीं हो पाता । तो बाह्य अर्थों के प्रति इसका मन उमंग में रहता, उनसे लगाव रखता, उनसे यह जुड़ा रहता । इसका फल यह है कि अपने स्वरूप से गिरा हुआ रहता, तब वह शरीर को ही मानता कि यह मैं हूँ । शरीर से भिन्न मैं कोई अमूर्त जीवतत्त्व हूँ, यह मूढ़दृष्टि को विदित नहीं है, और इस कारण निरंतर कष्ट ही कष्ट भोगता है । देह के पालन-पोषण के लिए इसके सारे प्रयत्न रहते हैं । वह देह के पालन-पोषण के लिए नहीं मान रहा किंतु अपने आत्मा के पोषण के लिए यह सारे प्रयत्न करता है । देह और आत्मा ये मूढ़दृष्टि के मत में अलग-अलग नहीं हैं । सो अपने पोषण में अर्थात् शरीर के पोषण में बाह्य पदार्थों की आवश्यकता होती है । खाना-पीना आदिक स्पर्श वगैरह उनका योग जुड़ता है और उनका योग जुड़ना अपने अधीन नहीं । और ऐसा ही चाहने वाले जगत᳭ के सब लोग हैं । तो इसने दूसरे को कभी विघ्नकर्ता भी माना । क्रोध जगता । कभी कुछ संपदा प्राप्त की । कुछ नाम ख्याति होने लगी तो इसमें इसके मान बढ़ता है, अभिमान जगता है और बाह्यपदार्थों के पाने के लिए नाना प्रकार के छल-कपट करता है । और तृष्णा का तो प्रसार है ही । इस प्रकार चारों प्रकार की कषायों से पीड़ित होकर यह जीव अपने स्वरूप को भूला हुआ है । इसका जीवन भी क्या जीवन है, जीवन को व्यर्थ गमा रहा है । ऐसा यह बहिरात्मा का स्वरूप बताया जा रहा है कि जिसमें आत्मा की सुध नहीं । उसकी दृष्टि सारी देह पर रहा करती है । धर्म की चर्चा में जो कषाय रखता है या क्रोध जगता है उनकी एक दृष्टि कहां है ? अन्यथा देह पर उपेक्षा रहती ।

अनंतानुबंधी कषाय की गुफा―देहदृष्टि कहां तक चलती हैं ? इसका अनुमान करना भी कठिन है । लगता है कि यह धर्म आचरण में, प्रयोग में बड़ा उत्साह रख रहा, पर उसे यह पता नही कि वास्तव में सम्यक्त्व भाव से रह रहा या देहदृष्टि के कारण रख रहा । त्याग, दान, संयम आदिक कहो देहदृष्टि के कारण होते हों । मैं करने वाला हूँ, मैं साधु हूँ, मैं बहुत शुद्ध आचरण से रहता हूँ । मेरा बहुत ऊ̐चा कुल है आदिक भावों का मूल देहदृष्टि हो सकती है । इस देहदृष्टि ने ऐसे-ऐसे मुनिजनों को भी हैरान किया कि जो इतना मंद कषाय रखे थे कि धानी में पिल जायें तो भी शत्रु पर रोष न करें । और मूल में बात यह पड़ी है कि मैं मुनि हूँ, (देह को देखकर) मुझे क्रोध न करना चाहिए । मुझ क्षमा धारण करना चाहिए । क्षमा रखेंगे तो मोक्ष मिलेगा । बात तो अच्छी सोच रहा है किंतु देह को ही आत्मा समझकर सोच रहा, यह मूल में भूल है । इस कारण इतने प्रयास होने पर भी वह मूढ़ दृष्टि है । जैसे हम बाहरी क्रियावों से सम्यक्त्व का फैसला नहीं कर पाते । धर्मात्माओं से अनुराग चल रहा, किसी पर क्रोध भी चल रहा । किसी शिष्य ने धर्मविरुद्ध आचरण किया उसे दंड भी देंगे । ऐसी क्रियावों में यों लगता है कि इनके क्या सम्यक्त्व होगा? भरतचक्रवर्ती, श्रीरामचंद्रजी या और-और भी ऊ̐चे-ऊ̐चे महापुरुष जिनकी चेष्टायें ऐसी थीं कि जिन्हें देखकर यह नहीं समझ बन सकती कि इनका अच्छा भाव था या इनको सम्यग्दर्शन था । तो जैसे सम्यग्दर्शन कठिन है समझना कि यहाँ है या नहीं ऐसे ही मिथ्यादर्शन भी कहीं-कहीं समझना कठिन है कि यहाँ है या नहीं । 11 अंग 9 पूर्व के पाठी होकर भी मिथ्यात्व से वासित हैं और एक मेंढक, बंदर, नेवला, सांप ये कहो सम्यग्दृष्टि भी बन जाये फिर भी इनके बारे में सही समझ नहीं बन पाती । उनको व्यवहार में एक प्रधानता लाकर अपने कल्पना से मानते हैं कि यह मिथ्यादृष्टि है या सम्यग्दृष्टि है । अब कल्पित विभाग व्यवहार करके आम्नाय या व्यवहारमार्ग का लोप करना यह जैनधर्म की विराधना है । अपना लक्ष्य होना चाहिए अपने कारण-समयसार तत्त्व पर । हम सफल हुए या नहीं हुए पर लक्ष्य तो है हमारा । इसी प्रकार दूसरे जीव भी जो धर्ममार्ग में लग रहे हैं उनका भी लक्ष्य यह ही हो ।

जिस पर जो बीतती है प्राय: वही अपने समान पुरुषों में देखता है । जैसे कोई दुःखी पुरुष है तो प्राय: दूसरों के दुःख का अंदाज करता है । ये भी दुःखी हैं, और जो सुखी पुरुष हैं वे प्राय: दूसरों के सुख का अंदाज करते हैं, ये भी सुखी हैं । जो दोषों से भरे हुए पुरुष हैं वे दूसरों में दोष देखने की दृष्टि रखते हैं । इन्होंने यह दोष किया, इनमें ये दोष हैं, और जो गुणों से पूरित हैं वे दूसरों में गुणों की दृष्टि रखते हैं । वाह देखो―ये कितना शांत हैं, कितना धर्म की ओर अभिमुख हैं । बाहर में जिसे तत्त्व का अंदाज नहीं सही बन पाता है उसके बारे में क्या निर्णय ? हां, स्वरूप का निर्णय होता है । जहाँ यह स्वरूप हो दृष्टि में वह है सम्यग्दर्शन । जहाँ यह सहजस्वरूप नहीं है दृष्टि में, वह है मिथ्यादर्शन । मूढ़दृष्टि जन निरंतर देह को ही आत्मा मान रहे हैं । कभी ये धर्म की चर्चा करें, भेदविज्ञान की बड़ी बात करें तो साथ में यह बात लगी रहती है कि देखो श्रोताजन मेरे को बड़ा अच्छा ज्ञानवान समझ रहे हैं, लो देहदृष्टि हो गई उसकी । देह को ही उसने आत्मा माना, और भेदविज्ञान की चर्चा में दूसरों का हर्ष देखकर या उनकी वाहवाही सुनकर जो चित्त में प्रमोद जगता है वहाँ भीतर में यह बात पड़ी है कि लोगों ने मुझे अब समझ पाया कि ये कितने ज्ञानवान हैं और कितनी ऊ̐ची सूक्ष्म चर्चा करते हैं अब भला बताओ देहदृष्टि की बात को कैसे बताया जाये कि यहाँ है अथवा नहीं । तो इसका तो एक ही निर्णय है कि जहाँ देहदृष्टि नहीं उसका तो कल्याण और जहाँ देहदृष्टि है उसका पतन ।

दृश्य धर्मव्यवहार में भी देहदृष्टि के आधार की संभवता―देहदृष्टि वाला निरंतर बाह्य अर्थों में मन की उमंग बनाये रहता है और इस उमंग के कारण इन इंद्रियों द्वारा बाह्यविषयों के ही उपयोगी बनकर अपने स्वरूप की दृष्टि से च्युत रहता है । इसी को बतलाया है―“देह जीव को एक गिनै, बहिरातम तत्त्व मुधा है ।” देह और जीव को एक मानता है, जहाँ बहुत बड़ा सोला (शोध) चलता है, हाथ किवाड़ में न लग जायें, कोई चीज छू न जाये, इतनी जो निरंतर तीक्ष्ण दृष्टि रहती है वे जरा यह अंदाज तो करें कि उनकी दृष्टि देह में अधिक है या आत्मा पर । यद्यपि शोध सोला को मना नहीं किया जा रहा, वह भी उपयोगी बात है, अन्यथा स्वच्छंदता हो जायेगी और परिणामों में गिरावट हो जायेगी, मगर उस ही ओर भारी दृष्टि रहे तो एक देहदृष्टि का उदाहरण है । जैसे उन कोल्हू में पिलने वाले मुनि के लिए बताया कि उसमें उस समय भी इतनी समता है कि वह शत्रु के प्रति द्वेष नहीं कर रहा, फिर भी उसका ऐसा भाव बना कि मैं मुनि हूँ । मुझे क्रोध न करना चाहिए, इससे मुझे मुक्ति मिलेगी, तो यह उसकी देहदृष्टि बन गई । तो ऐसे ही समझो कि जो सोला के चक्कर में भारी उलझता है उसके अभी देहात्मदृष्टि है । जैसे मैं नहा धोकर शुद्ध कपड़े पहनकर आया हूँ । मुझे कोई छू लेगा तो मेरा धर्म नष्ट हो जायेगा, मेरा सारा बिगाड़ हो जायेगा, यह सोचकर पद-पद पर क्रोध करना, यह देहात्मदृष्टि का कारण है । अरे ! काम करना कर्तव्य है सो करें, पर भीतर में आत्मदृष्टि से च्युत न हों । आत्मभान रहे कि यह मैं आत्मा हूँ । सोला बनाया, किसी ने छू लिया तो उसका उपाय बना लिया, कुछ पानी के छींट डाल लिये, या कपड़ा बदल लिया, या मन बदल लिया, किसी भी प्रकार थोड़ी-सी भावना कर ली, यों बाह्य उपाय बना लिया । मगर उसके बिगड़ने पर तीव्र क्रोध आये तो वह एक देहदृष्टि के आधार में साबित होता है ।

स्वदोषों का निरीक्षण कर उनसे हटने में आत्महित―जब मुनि की चर्चा करते हैं तो वहाँ तो बड़े खुश होते कि देखो कोल्हू में पिल रहे फिर भी अनंतानुबंधी कषाय लिए हैं और देहदृष्टि सूक्ष्मता से उसके पायी जाती है और अपने आपके जो कर्तव्य चलते हैं उन कर्तव्यों में निगाह डालते कि हम भी न जाने क्या-क्या बहाने बनाते हैं । न जाने धर्म के प्रसंग में क्या-क्या रूपक रखते हैं और देहदृष्टि को पुष्ट कर रहे हैं । बात अपने आपमें अधिक निरखना चाहिए । दूसरे का तो सही-सही कुछ पता नहीं, उसमें दोषों को निरखने से लाभ क्या ? स्वयं के दोष देखने में मैं कितना मोह में पल रहा हूँ । पुत्र मित्र स्त्रीजनों का जो मोह टूट नहीं रहा । कुछ थोड़ीसी बीमारी हो किसी को तो यहाँ खुद में भारी आकुलता मचती है । खुद में कोई बीमारी हो जाये तो यह कितना व्याकुल हो जाता, अब न जाने क्या होगा, पता नहीं अच्छा भी होऊंगा या नहीं । यों कितनी ही उल्झनें बना ली जाती हैं । यह सब क्या है ? मूढ़दृष्टि का परिणाम । तो यह बहिरात्मा जीव अपने देह को समझता कि यह मैं हू̐ । और बाहर में क्या देखता है ? बाहर में है देह । उसके बारे में यह मूढ़दृष्टि जीव क्या समझता है सो कहते हैं―


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