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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 92

From जैनकोष



कुच्छियदेवं धम्मं कुच्छियलिंगं च बंदए जो दु ।

लज्जाभयगारवदो मिच्छादिट᳭ठो हवे सो हु ꠰꠰92।।

खोटे देव, खोटे धर्म व खोटी गुरुमुद्रा के वंदन में मिथ्यात्व की पुष्टि―जो पुरुष लाज के कारण खोटे देव खोटे धर्म, खोटे गुरु की वंदना करता है वह मिथ्यादृष्टि होता है । जो किसी भय के कारण खोटे देव, खोटे धर्म, खोटे गुरु की वंदना करता है वह मिथ्यादृष्टि होता है । जो गारव, अभिमान, पोजीशन रखने, प्रतिष्ठा बढ़ाने आदिक के ख्याल से खोटे देव, खोटे धर्म और खोटे गुरु की वंदना करता है वह मिथ्यादृष्टि होता है । इस अज्ञानी को आत्मस्वरूप का पता ही नहीं है इसलिए यह प्रवृत्ति हो रही । जिसको अपने अमूर्त दर्शन-ज्ञानस्वरूप सहज आनंदमय आत्मस्वरूप का परिचय है, उसको देव, धर्म, गुरु का भी निर्णय है, जो इसकी साधना में लगे हों वे गुरु । जो इस आत्मस्वरूप की साधना का उपदेश हो वह आगम, शास्त्र, धर्म और जिसके ऐसा स्वरूप प्रकट हो गया हो वह देव ꠰ ज्ञानी जनों की खोटे देव, खोटे धर्म और खोटे गुरुओं में प्रवृत्ति नहीं होती ।

कुदेव, कुधर्म व कुगुरु में कु लगने का कारण सेवकों का आशय―ये खोटे देव माने क्यों जाने लगे? ऐसी क्या पड़ी थी जो यह प्रथा चल उठी कि खोटे देव भी पुजने लगे । तो पहले तो आप यह जानें कि खोटे देव कोई होते हैं क्या? कोई भी या तो देव होगा या देव न होगा, तीसरी बात कुछ नहीं, खोटे देव दुनियां में कोई नहीं हैं, खोटा धर्म भी कुछ होता है क्या? या तो धर्म होगा या धर्म न होगा । दो ही बातें होंगी, खोटा धर्म कोई नहीं होता । ऐसे ही खोटा गुरु भी कोई होता है क्या? या तो गुरु होगा या गुरु न होगा । दो ही बातें होंगी, खोटा गुरु कोई नहीं होता । फिर यह वर्णन जो आता है शास्त्रों में और उपदेश भी किया जाता है यह कैसे चल उठा? यह यों चल उठा कि जो देव तो है नहीं और लोग मानने लगे कि यह देव है तो उसको किस भाषा में समझाया जाये, उस भाषा का नाम है कुदेव । कुदेव भी नहीं है, वह तो अदेव है । मगर इन मानने वालों ने कुदेव बताया, वह खुद नहीं है कुदेव । कुधर्म ये संसार की प्रवृत्तियां हैं, कोई पदार्थ धर्म है कोई अधर्म है, कुधर्म कहीं नहीं है, मगर जो धर्म धर्मरूप नहीं है उसे लोगों ने धर्म नाम रख दिया इसलिए उसे कुधर्म कहना पड़ा । ऐसे ही जो गुरु नहीं है उसे लोगों ने गुरु कहना प्रारंभ किया तो कुगुरु नाम रखना पड़ा । आज जो कुदेव, कुगुरु, कुधर्म शब्द कहकर बहुत-बहुत आलोचना या घृणा की जाती है, सो जिसको लक्ष्य करके की जाती उसका अपराध नहीं, किंतु इन मानने वाले लोगों ने इस प्रकार का विश्वरूप कर दिया है । हां, थोड़ा उन लोगों की तरफ से भी हो सकता कि जैसे जो देव तो नहीं और उनके भी इच्छा हो गई कि लोग मुझे देव की तरह मानने लगें तो थोड़ा एक इस ओर से, वे अपनी ओर से कुदेव बन गए, ऐसे ही गुरु भी जो गुरु तो नहीं पर कोई गुरु की मुद्रा रखकर शौक करने लगे कि मुझे लोग गुरुदेव कहें तो वे कुगुरु कहलाने लगे । तीसरी बात यह है कि लोगों ने आवश्यकतानुसार देव मानना शुरू किया । जैसे सूर्य के बिना हम आप लोगों का जीवन सही तो नहीं निभ सकता । बीमार हो जायेंगे, जरूरत पड़ती है धूप की । तो हम आप लोगों के प्रयोजन का है सूर्य । तो लोगों मे सूर्य को भी देव या भगवान कहना शुरु किया । और की तो बात जाने दो, पीपल बरगद आदि वृक्षों को भी देव मानकर लोग पूजने लगे । बात वहाँ क्या थी कि पीपल के पेड़ में एक खास बात यह होती कि उसके तने और पत्ते वगैरह को छूकर जो हवा आगे बढ़ती है वह विशुद्ध होती है जिसमें बताते हैं कि अनेकों प्रकार के रोग स्वत: ही दूर हो जाते हैं ꠰ इस प्रकार से अपने काम की चीज होने से लोग पीपल को देव मानकर पूजने लगे । ऐसे ही बरगद के पेड़ को देख लो, इतना बड़ा पेड़ होता कि जिसके नीचे कई परिवार रह सकते, और ग्रीष्मकाल में उसकी छाया मुसाफिरों को बड़ी शीतलता प्रदान करती है । तो अपने काम में आने से उसे भी लोग देव मानकर पूजने लगे । याने लोगों ने देवता कहना इस आधार पर शुरु किया कि किसी जमाने में जो अपने काम आया उसी को देवता मान लिया ।

मोक्ष व मोक्षमार्गस्वरूप देव धर्म गुरु से विपरीत मार्ग की अपनायत का कारण अज्ञान―मोक्षमार्ग में भगवान, देवता, प्रभु वही है जो वीतराग है और सर्वज्ञ है । सर्वज्ञ तो वीतराग होने का फल है, सर्वज्ञ होने से आनंद नहीं मिलता । आनंद मिलता है वीतराग होने से । जो वीतराग होता है सो जबरदस्ती उसे सर्वज्ञ होना पड़ता है, होता है वह सर्वज्ञ, गुणों का विकास होता ही है मगर महिमा है वीतरागता की । जिसमें रागद्वेष रंच भी नहीं, किसी प्रकार का विकार नहीं, उसे कहते हैं देव । ऐसे देवों को न मानकर जो रागीद्वेषी जीव को देव माने वह मिथ्यादृष्टि꠰ धर्म क्या है? आत्मा का उपयोग । आत्मा के सही स्वरूप में लगे वह है धर्मपालन और इस प्रयोजन को लक्ष्य में रखते हुए अधर्म से बचने के लिए और धर्म में पहुंचने के लिए पात्रता जिन प्रवृत्तियों में रहती है उन प्रवृत्तियों को कहते हैं व्यवहारधर्म, देव-पूजा आदिक करना ꠰ जिसका इस आत्मनिर्मलता से कुछ संबंध जुड़ा ही नहीं, ऐसा जो काम है, जैसे नदी में स्नान करना और मेरे पाप धुल गए, ऐसा मानना, या पर्वत से गिरकर अपने को निष्पाप मानना और अनेक देवी दहाड़ियों की पूजा करना, वृक्ष पूजना आदिक कुछ भी ये सब धर्म नहीं है । तो जो ऐसे खोटे धर्म को मानते हैं वे मिथ्यादृष्टि हैं, ऐसे ही खोटे लिंग, कुगुरु, जटायें रखे हैं, नहाते भी हैं खूब जल में डुबकियां लगा-लगाकर । कहो कितने ही पानी के जीव वालों में घुस जाये, फिर उनको हाथ से सम्हालकर गूंथते हैं उस प्रसंग में कितने ही जीवों की हिंसा हो सकती है, ऐसे लोगों को गुरु मानकर पूजना यह मिथ्यात्व है । पूजन-वंदन करने के ये तीन प्रयोजन होते हैं । 1. लज्जा―बहुत से लोग के बीच रहते हैं, सभी जैसा कर रहे वैसा न करने में लज्जा आती है । ये लोग क्या कहेंगे ऐसा समझकर भी अनेक लोग उन कुगुरुवों का वंदन करते हैं, परंतु ज्ञानीजन इस बात में लज्जा नहीं करते । उनको इस बात का भय नहीं होता कि लोग मुझे क्या कहेंगे, या लोग कहीं मेरे दुश्मन न बन जायें, या अमुक-तमुक न हो जाये, ज्ञानी के यह भय नहीं होता । जो होता है वह पुण्यपाप के अनुसार होता है । गारव करना तो बड़े उद्दंडता की बात है, मेरा सम्मान हो, इन लोगों में हमारी ख्याति हो ऐसा सोचकर कुदेव, कुधर्म, कुगुरु की वंदना करना, ये सब बातें ज्ञानी सम्यग्दृष्टि के नहीं हैं । जिनके अज्ञान है वे ही आत्मस्वरूप के विरुद्ध कार्यों में प्रवृत्ति करते हैं ।


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