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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 96

From जैनकोष



सम्म गुण मिच्छ दोसो मणेण परिभाविऊण तं कुणसु ।

जं ते मणस्म रुच्चइ किं बहुणा पलविएणं तु ꠰꠰96꠰꠰

सम्यक्त्व के गुण और मिथ्यात्व के दोषों का विचार करके सम्यक्त्व गुण में रुचि करने का संकेत―हे आत्मन् ! भले प्रकार विवेक करके निर्णय करलो सम्यक्त्व तो गुण है और मिथ्यात्व दोष है । जहाँ सम्यक्त्व है वहाँ सत्य प्रकाश है, शांति का मार्ग स्पष्ट है, ध्येय सहज परमात्मतत्त्व है । इस सम्यक्त्व का ही मूल माहात्म्य है जो संसार के दुःखों से छूटकर मोक्षपद में पहुंच जाते हैं । मिथ्यात्व महादोष है, महापाप है, जो वस्तु जैसी है वैसी श्रद्धा में न लाकर उल्टी ही श्रद्धा करना मिथ्यात्व है । आत्मातिरिक्त समस्त पदार्थ आत्मा से अत्यंत भिन्न हैं उन्हें अपना समझ लेना मिथ्यात्व है । संसार के घोर संकट प्राप्त होना मिथ्यात्व का ही परिणाम है । हे भव्य पुरुष ! सम्यक्त्व और मिथ्यात्व दोनों का तथ्य विचार कर अब जो तुझे रुचे सो कर, अब बहुत अधिक कहने से क्या लाभ है । यदि संसार में भटकना है तो मिथ्यात्व की सेवा कर । यदि सर्वसंकटों से छूटकर उत्तम शाश्वत शांति पाना है सो सम्यक्त्व की उपासना कर ।


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