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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 4-29

From जैनकोष



सौधर्भेशानयो: सागरोपमेऽधिके ।। 4-29 ।।

सौधर्म और ऐशान स्वर्ग के देवों की उत्कृष्ट आयु―सौधर्म और ऐशान स्वर्गों के देवों की उत्कृष्ट स्थिति कुछ अधिक दो सागर प्रमाण है । यद्यपि उक्त सूत्र में भवनवासियों की स्थिति बताने के बाद व्यंतर और ज्योतिष्क देवों की स्थिति बताना क्रम प्राप्त था, मगर उसका उल्लंघन जो यहाँ वैमानिक देवों की स्थिति बतायी जा रही है, उसका कारण यह है कि शेष व्यंतर और ज्योतिष्कों की स्थिति आगे बतायेंगे और आगे बताने में संक्षिप्त वर्णन हो जायेगा। तो अब यहां वैमानिक देवों की स्थिति मे सर्वप्रथम जो स्वर्ग हैं उनमें रहने वाले देवों की स्थिति बतायी है । इस सूत्र में यद्यपि दो शब्द नहीं लिखा है तो भी सागरोपमे द्विवचन है, जिससे यह सिद्ध होता है कि दो सागर प्रमाण उनकी आयु है । यहाँ अधिक शब्द देने से वह ध्वनित होता है कि किसी देव की सौधर्म और ऐशान स्वर्ग में दो सागर से भी कुछ अधिक स्थिति ही जाती है । ऐसी अधिक स्थिति होने का कारण यह है कि किसी जीव ने ज्ञानी पुरुष ने ऊपर के स्वर्ग की स्थिति बांधी थी, पर किसी संक्लेशता के कारण आयु के अपकर्ष के समय स्थिति इतनी घट जाती है कि करीब वह प्रथम द्वितीय स्वर्ग में उत्पन्न होगा । तो ऐसे जीवों की स्थिति कुछ अधिक हो जाया करती है ।


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