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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 5-10

From जैनकोष



संख्येयासंख्येयाश्च पुद्गलानाम् ।। 5-10 ।।

पुद्गल स्कंधों के प्रदेशों का परिमाण―पुद्गलों के संख्यात असंख्यात और अनंत प्रदेश होते हैं । यहाँ पुद्गलों से मतलब स्कंधों का है । कोई स्कंध संख्यात प्रदेशी है, कोई असंख्यात प्रदेशी है कोई स्कंध अनंत प्रदेशी भी हैं । इस सूत्र में प्रदेशा: शब्द की अनुवृत्ति दो तीन सूत्रों पहले से आ रही है और च शब्द के देने से ‘अनंत’ प्रदेश ग्रहण किए गये हैं, इससे पहले सूत्र था ‘‘आकाशस्यानंता:’’ उस प्रकृत सूत्र में च शब्द कहकर अनंत शब्द ग्रहण किया है । जैसे कि उस सूत्र का अर्थ होता था कि आकाश के अनंत प्रदेश होते हैं, और इस प्रकृत सूत्र का अर्थ होता है कि पुद्गलों के प्रदेश संख्यात असंख्यात व और भी होते हैं अर्थात् अनंत भी होते हैं । और 8वें सूत्र में प्रदेशा: शब्द आया उससे प्रदेशा: शब्द की अनुवृत्ति की गई है । अब बतलाते हैं कि पुद्गलों के संख्यात असंख्यात और अनंत प्रदेश कैसे हो जाते हैं । इसकी सिद्धि के अनुमान द्वारा की जानी चाहिये । अनुमान भी पूर्ण प्रमाण होता है । जैसे कि लोक में अनुमान को अंदाज अथवा संशय के रूप में लेते हैं कि हाँ हो सकता है, ऐसा यह अनुमान का अर्थ नहीं है । अनुमान प्रमाण पूर्ण प्रमाण है । जैसे प्रत्यक्ष प्रमाण प्रत्यक्षता में पूर्ण है और वह सही बात को बतलाता है ऐसे ही अनुमान प्रमाण पदार्थ अनुमान में परोक्ष रूप पूर्ण प्रमाण है और वह सही बात को बतलाता है । यहाँ अनुमान किया जा रहा है कि पुद्गल द्रव्य के प्रदेश संख्यात असंख्यात और अनंत हो सकते हैं क्योंकि पुद्गलों के अनेक प्रकार के स्कंधों की भली भाँति सिद्धि है । स्कंध बना करते हैं पुद्गल परमाणुओं से । तो जितने परमाणुओं से जो स्कंध बनते हैं उस स्कंध में उतने परमाणु अवगाही कहे जाते हैं । पुद्गल स्कंधों में आकाश प्रदेश की भाँति लंबाई चौड़ाई के अनुसार प्रदेश नहीं माने गये । अर्थात् स्कंध अखंड द्रव्य नहीं है और उसके अखंड के ये प्रदेश बताये गये हों ऐसा नहीं है, किंतु स्कंधों में संख्यात असंख्यात अनंत परमाणु हैं और प्रत्येक परमाणु एक प्रदेशी होता है । तो पुद्गलों में अर्थात् स्कंधों में परमाणुओं की गिनती के अनुसार प्रदेशों की संख्या नियत की गई है । यहाँ यह बात और जानना कि आकाश के असंख्यात प्रदेशों में अनंत प्रदेश वाले स्कंध ठहर सकते हैं । आकाश का क्षेत्र भले ही थोड़ा हो पर वहाँ अधिकाधिक परमाणुओं की संख्या बराबर है । सो थोड़े क्षेत्र में ये संख्यात प्रदेशी असंख्यात प्रदेशी और अनंत प्रदेशी स्कंध ठहर रहे हैं । कोई भी स्कंध आकाश के अनंत प्रदेशों में ठहर ही नहीं सकता । उतने बड़े स्कंध होते ही नहीं हैं, और लोकाकाश प्रमाण असंख्यात प्रदेशों में भी अनंत प्रदेशी स्कंध नहीं है, भले ही एक महास्कंध माना है तो वह स्कंधों के समूह का नाम महास्कंध है । महास्कंध कोई एक ही पिंड होता है और वह लोकाकाश प्रमाण असंख्यात प्रदेशों में ठहरता हो ऐसा नहीं है । तो चूंकि संख्यात असंख्यात अनंत परमाणु वाले स्कंधों की भलीभाँति सिद्धि प्रत्यक्ष से भी देखी जा रही है इस कारण सूत्र में जो प्रदेशों का परिमाण बताया है वह युक्ति संगत है ।

अवयव और अवयवी के अभाव की आरेका―अब यहाँ जो अवयवी को नहीं मानते ऐसे क्षणिकवादी शंका करते हैं कि स्कंध तो भ्रम है, वास्तविक चीज नहीं है । यदि इसे कोई वास्तविक माने कि अनेक परमाणुओं का मिलकर स्कंध बना है तो यह बताए कोई कि स्कंध का ग्रहण क्या उस स्कंध को बनाने वाले अवयवों के ग्रहण पूर्वक होता है या उन अवयवों को ग्रहण न करके शीघ्र ही अवयवी का ग्रहण हो जाता है? यहाँ ऐसे दो पक्ष रखे गये हैं कि जिन परमाणुओं का बंधन होकर स्कंध बना है तो स्कंध का ग्रहण जो हो रहा है वह उन परमाणुओं को जानकर हो रहा है या परमाणुओं को जाने बिना स्कंध का ज्ञान हो रहा है । यदि यह कहा जाये कि उन परमाणुओं का ग्रहण करने पर उस स्कंध का ज्ञान हो रहा है तो वे परमाणु तो अतींद्रिय हैं, एक-एक परमाणु प्रत्येक अतींद्रिय है । तो अतींद्रिय चाहे अनंत भी मिल जायें तो भी वे इंद्रिय ग्राह्य कैसे हो सकेंगे? सो जब परमाणु अतींद्रिय हैं और उनका ग्रहण हो ही नहीं सकता तो स्कंध का ग्रहण कैसे हो सकता है? और जब स्कंध का ग्रहण न बने तो अवयवी याने पिंड स्कंध की सिद्धि भी नहीं हो सकती । तो अवयवी जो परमाणु हैं उनका ग्रहण तो हुआ नहीं और अवयवी कुछ होता नहीं तो इसके मायने यह हुआ कि कुछ भी नहीं है जगत में । न परमाणु हैं और न स्कंध । अब यदि कोई कहे कि उन परमाणुओं का ग्रहण हुये बिना पिंड का अवयवी का ग्रहण हो जाता है तब यहाँ यह दोष आता है कि जब परमाणुओं का ग्रहण हुये बिना अवयवी स्कंध का ग्रहण हो गया तो जिस चाहे जगह रीती जगह में जहाँ कुछ नहीं है वहां भी स्कंध का ग्रहण हो जाना चाहिये क्योंकि अब तो अवयवों के ज्ञान बिना भी अवयवी का ज्ञान मान लिया । तो रीती जगह में भी अवयवों के ज्ञान की आवश्यकता तो न रही, तो यहाँ भी अवयवी का बोध हो जाना चाहिये ।

आरेका में निरंशवादियों द्वारा स्कंध के निराकरण का प्रयास―अवयवी को न मानने वाले एकांतवादी ही कह रहे हैं कि यदि कोई यहाँ यह तर्क करे कि कुछ थोड़े से अवयवों का ग्रहण पहले हो जाता है तत्पूर्वक स्कंधों का ग्रहण हुआ करता है तो इस पर यह आपत्ति आती है कि थोड़े अवयवों का ग्रहण करने से स्कंधों का ग्रहण मानने पर सभी अवयवों या अवयवियों का ग्रहण नहीं हो सकता है । इसका कारण यह है कि उस स्कंध के अवयव रूप हो रहे अनंत परमाणुओं को जैनादिक के यहाँ व्यवस्था बनायी गई है इस कारण वास्तव में अवयवभूत अनंत परमाणुओं का ग्रहण करना असंभव है । तो कुछ अवयवों का ग्रहण करके ही तो स्कंधों का ज्ञान माना है सो वास्तविक रूप से तो स्कंध की सिद्धि न हो सकी, क्योंकि सभी परमाणुओं का ग्रहण होने पर स्कंध का ज्ञान मानना सच्चा होता । हां अनादि काल से लोगों को अविद्या लगी है, भ्रम बना है इसलिये अत्यंत निकट हो रहे उन परमाणुओं को एक स्कंध रूप से मान लेते हैं और वस्तुत: वे सब परमाणु एक दूसरे से बंधन रूप संबंधित नहीं हैं, इस कारण वह सब कोरा भ्रम है । जैसे कि सिर पर रहने वाले केश या नीचे पड़े केशों का झुंड वे एक दूसरे केश से बंधे हुये तो नहीं हैं, सर्व स्वतंत्र रह रहे हैं, पर अति निकट रह रहे हैं, इस कारण उनमें भी एक पिंड का भ्रम हो जाता है । या जैसे बालू के कण का ढेर पड़ा हुआ है तो वहाँ भी बालू का प्रत्येक कण जुदा-जुदा ठहर रहा है और एक कण का दूसरे कण के साध बंधन भी नहीं है, किंतु वे सब अतिनिकट होकर रह रहे हैं, इस कारण वहाँ भी पिंड जैसा भ्रम हो जाता है । ऐसे ही परमाणु तो हैं सब न्यारे-न्यारे । उनका परस्पर एक दूसरे से बंधन नहीं है मगर वे समीपवर्ती हो जायें तो भ्रमवश लोग उन्हें स्कंध कह देते हैं । वास्तव में तो सूक्ष्म असाधारण क्षणिक परमाणु ही पदार्थ हैं और जो कुछ लोगों को प्रतीत हो रहा है कि अनेक समय तक ठहर रहा यह स्कंध, यह स्थूल है, अवयवी है, सो वह वास्तविक पदार्थ नहीं है । इस प्रकार यहां तक क्षणिकवादियों ने अवयवी का अर्थात् स्कंध का खंडन किया और जब स्कंध कोई चीज ही नहीं है तो संख्यात असंख्यात अनंत प्रदेश बताने वाला सूत्र निरर्थक है ।

परमाणु व स्कंधों की सिद्धि में उक्त आरेका का समाधान―अब उक्त शंका के समाधान में कहते हैं कि इन शंकाकारों के यहाँ भी तो अवयवी पदार्थ की सिद्धि नहीं हो पाती है और बहिरंग अंतरंग जो परमाणु हैं, स्वलक्षणमात्र हैं, वे अतींद्रिय हैं, वे बुद्धि के विषयभूत हो नहीं सकते । तो जब परमाणुओं का मिला हुआ अवयवी पदार्थ निरंशवादियों ने माना नहीं और परमाणु सभी स्वलक्षण मात्र हैं वे बुद्धि में आते नहीं, अतींद्रिय हैं, तो वहाँ भी तो बहिरंग और अंतरंग पदार्थों का ग्रहण नहीं हो सकता । सो इन निरंशवादी बौद्धों के यहाँ भी किसी पदार्थ का ग्रहण न हो पायेगा, इस पर यदि शंकाकार यह कहे कि हम तो परमाणुवों की प्रतिक्षण उत्पत्ति मानते रहते हैं, कोई-कोई इकट्ठे हुये परमाणु ही अपने कारणों की विशेषता से इंद्रियजंय ज्ञानों से जानने योग्य स्वभाव वाले बन जाते हैं, अर्थात् उनका ग्रहण होना सिद्ध हो जाता है । इस कारण संपूर्ण पदार्थों का ग्रहण नहीं हुआ, किंतु कुछ दृश्य परमाणुओं का इंद्रिय द्वारा ग्रहण हुआ है, ऐसी तर्कणा यदि शंकाकार प्रकट करे तो उनका यह मंतव्य भी सही नहीं है, क्योंकि कभी भी कहीं भी किसी भी अल्पज्ञ व्यक्ति को परमाणुओं की प्रत्यक्ष प्रतीति नहीं हो रही है, जब कि यह स्कंध एक ही अकेला ज्ञान में स्थूल रचना को धारण करने वाला प्रतीत हो रहा है । याने अलग-अलग परमाणुओं के प्रतिबिंबों को आकारों को शंकाकार के यहाँ ज्ञान नहीं धारण करता और स्व को जानने वाला ज्ञान भी अनाकार है, पर सविकल्प ज्ञान के द्वारा स्थूल आकार वाला एक अवयवी स्पष्ट जान लिया जाता है ।

स्कंध के स्थूल आकार के दर्शन को भ्रांत कहने की शंका व उसका समाधान―यहाँ यदि शंकाकार यह कहे कि परमाणु तो चैतन्य आत्मा में विद्यमान नहीं हो रहे फिर भी भ्रांति ज्ञान से अतिस्थूल आकार को ये परमाणु दिखला देते हैं । जैसे कि एक स्थूल दर्शक काँच होता है उसको आंख के आगे लगाने से छोटा पदार्थ भी बहुत बड़ा दिखने लगता है । ऐसे ही ये परमाणु निकटवर्ती होकर जो मोटे रूप में दिखने लगता है सो वह केवल ऐसा समझ लेना भर है । वास्तव में अवयवी, स्थूल पदार्थ कोई नहीं होता, ऐसा तर्क करने वाले शंकाकार से यह पूछा जा रहा है कि वह परमाणु किसी न किसी प्रकार प्रतिभासित हो जाये तब स्थूल आकार को दिखलाता है या किसी भी प्रकार प्रतिभासित नहीं होता तो भी वे अविद्यमान स्थूल आकार को चेतन आत्मा में दिखला देंगे । इन दो पक्षों में कौन सा पक्ष स्वीकार है? दूसरे पक्ष की बात तो स्पष्ट है कि यदि परमाणु किसी भी प्रकार प्रतिभासित नहीं हो रहा तो वे स्थूल आकार को कैसे ग्रहण करा देंगे? क्योंकि कुछ भी प्रतिभासित न हो और दिखला दें, ऐसा माना जाये तो जहाँ कुछ नहीं है वहाँ पर तो कुछ प्रतिभास नहीं हो रहा, फिर तो उनके सभी तरह के स्कंध दिख जाने चाहिए । अब यदि पहले पक्ष के अनुसार शंकाकार यह कहे कि किसी न किसी प्रकार परमाणु प्रतिभासित हो जाये, तो वह अपने आप स्थूल आकार दिखला देता है । जैसे कि सत्त्व वस्तुत्व आदिक से तो परमाणुओं का ज्ञान हुआ है तो वे स्थूल आकार को दिखला देंगे । तो इस शंका का समाधान यह है कि जब यह शंकाकार परमाणुओं को सर्वांगीण प्रतिभासित कर चुका है तो परमाणु रूप से सूक्ष्म रूप से, क्षणिक रूप से भी उन परमाणुओं का प्रतिभास हो जाना चाहिए किंतु ऐसा हो रहा नहीं, किसी भी अल्पज्ञ को परमाणु का परमाणुपन आदिक रूप स स्पष्ट प्रतिभास नहीं होता ।

परमाणु की अप्रतिभा समानता और स्थूल आकार की भ्रांति से ज्ञायकला की शंका का शंकाकार द्वारा समर्थन―अब यहाँ शंकाकार निरंशवादी कह रहे हैं कि बस यही कहना सत्य है कि परमाणुपन आदिक स्वभाव से नहीं प्रतिभासित हो रहे, परमाणु समूह से उस आकार को दिखला देता है । सो हम तो इसी दूसरे पक्ष को मानते हैं क्योंकि हम निरंशवादियों के ग्रंथ में भी ऐसा ही कथन है कि अर्थ के एक स्वभाव का जब स्वतः ही प्रत्यक्ष ज्ञान हो गया है तो उस पदार्थ का कौन सा अन्य भाग देखा नहीं जा चुका अर्थात् पदार्थों में अनेक स्वभाव तो हैं नहीं सो किसी भी पदार्थ का एक बार प्रत्यक्ष कर लेने पर उस पदार्थ का पूर्ण रूप से प्रत्यक्ष हो जाता है । याने कोई भाग न देखा गया नहीं रहता । सिर्फ इतनी ही कसर रहती है कि उस निर्विकल्प प्रत्यक्ष से निश्चय की उत्पत्ति नहीं होती, सो उन परमाणुओं को अप्रतिभासित कह दिया जाता है । सो निश्चय करने वाला ज्ञान अप्रमाण माना गया है, निर्विकल्प प्रत्यक्ष ही प्रमाण माना गया है । सो इस प्रकार निर्विकल्प प्रत्यक्ष के द्वारा पदार्थ के संपूर्ण गुण देखे जा चुकते हैं, परंतु कदाचित् भ्रांति हो जाने से यदि किसी गुण का निश्चय नहीं किया जा सकता है तो अनुमान की प्रवृत्ति होती है और वहाँ साधन के द्वारा अनिर्णीत गुण का निश्चय कर लिया जाता है । जैसे परमाणु स्वरूप का ज्ञान निर्विकल्प प्रत्यक्ष द्वारा उसी समय हो चुका था जब कि निर्विकल्प प्रत्यक्ष हुआ, वह परमाणु असाधारण है, सूक्ष्म है, स्वलक्षणमात्र है । इस प्रकार सब कुछ जाना जा चुका था तो उस पदार्थ में कोई अलग-अलग अनेक अंश तो हैं नहीं । पदार्थ तो निरंश होते हैं । सो उस निर्विकल्प प्रत्यक्ष के समय यह न था कि कुछ अंशों को तो जान लिया गया और कुछ स्वभाव को छोड़ दिया गया । वहाँ तो निर्विकल्प प्रत्यक्ष द्वारा पदार्थ का सर्वांगीण प्रत्यक्ष हुआ था किंतु अनादिकाल से जीवों को भ्रम संस्कार की वासना लगी है तो वहाँ भ्रांतिज्ञान बना क्षणिक पदार्थ में चूंकि यह अनेक समय रहता है या पदार्थ स्थूल है ऐसी भ्रांति होने लगती है । उस भ्रांति को दूर करने का सामर्थ्य निर्विकल्प ज्ञान में नहीं है, क्योंकि निर्विकल्प ज्ञान का विषय तो यथार्थ दर्शन है । सो उस भ्रांति को दूर करने के लिये फिर अनुमान प्रमाण बनता है । जैसे अनुमान बना कि समस्त पदार्थ क्षणिक हैं सत्त्व होने से । तो इस अनुमान द्वारा उसी का ही निर्णय किया गया है कि जो निर्विकल्प ज्ञान में प्रत्यक्ष किया था सो यों परमाणु को जान चुकने पर भी उसके कुछ गुणों का निश्चय नहीं हुआ था । सो परमाणुओं को अप्रतिभासित कह दिया जाता है । सो जो अप्रतिभासित होने लगे उन्हीं के निश्चय के लिये विकल्पज्ञान जगता है । सो उसमें अभ्यास, प्रकरण, बुद्धि पातव और अर्थित्व इन 4 के कारण निश्चय बनता है । सो परमाणु के सूक्ष्मपने क्षणिकपने के स्वभाव का अभ्यास अधिक नहीं है, ऐसे उसका शीघ्र स्मरण नहीं हो पाता और इसी तरह एक परमाणु में भी यह अज्ञानी प्राणी स्वभाव भेद समझ बैठता है । अत: जो बात कही गई थी कि अप्रतिभासित परमाणु भी अपने में अविद्यमान स्थूल आकार को किसी भ्रम से दिखला देता है अत: अवयवी याने पिंडभूत पदार्थ कुछ नहीं है । वह तो भ्रममात्र है ।

सविकल्पज्ञान से किये गये निर्णय को अवास्तविक कहने पर प्रमाणता के निर्णय के अभाव का प्रसंग बताते हुये उक्त शंका का समाधान―शंकाकार की उक्त शंका का समाधान यह है कि जब शंकाकार ही स्वयं कह रहा है कि जाने गये परमाणु में कुछ निश्चितपना है कुछ धर्मों में अनिश्चितपना है । तो जब निश्चय और अनिश्चय का निर्णय हो रहा है तो परमाणु अनेक स्वभाव वाला अपने आप सिद्ध हो गया । यहाँ यह समाधान न चलेगा कि निश्चय ज्ञान तों वस्तु को विषय नहीं करता और निर्विकल्प प्रत्यक्ष वस्तु को विषय करता है । सो निश्चय द्वारा कल्पित अंश जाना जाता । सो निश्चय अवस्तुभूत को जानता है, सो स्वभाव भेद नहीं हो सकता । शंकाकार यदि उक्त समाधान दे तब तो निश्चय की उत्पत्ति द्वारा जो निर्विकार प्रत्यक्ष को प्रमाणपन सिद्ध करते हैं तो प्रमाणपन अप्रमाणपन की व्यवस्था उस सविकल्प ज्ञान से कैसे हो सकेगी, क्योंकि निर्णय करने वाले ज्ञान को अवस्तु विषयक बताया है । वह यथार्थ वस्तु को नहीं जानता । तो यथार्थ वस्तु को न जानने वाले सविकल्प ज्ञान से तो निर्विकल्प प्रत्यक्ष की प्रमाणता कैसे सिद्ध करेंगे? तो अवस्तुभूत ज्ञान से निर्विकल्प प्रत्यक्ष का प्रमाणपन सिद्ध कर बैठते हैं तो विपर्यय ज्ञान की उत्पत्ति और अनुत्पत्ति के द्वारा उस दर्शन के प्रमाणपने और अप्रमाणपने की व्यवस्था बन बैठेगी । यहाँ यह बात स्पष्ट समझियेगा कि क्षणिकवाद के सिद्धांत में निर्विकल्प प्रत्यक्ष को तो वस्तु का यथार्थ दर्शक बताया है परंतु उसमें निश्चय कुछ नहीं बना । उसका निश्चय किया सविकल्प ज्ञान ने । तो उस सविकल्प के ज्ञान को मानते हैं अवस्तु विषयक ज्ञान । तो यहाँ परस्पर विरोध हो रहा है । जो झूठा ज्ञान है उसका प्रमाणपन मानते और वस्तु को विषय करने वाला नहीं मानते । सो जो वस्तु का निर्णय करे उसे तो खोटा मानते और जहाँ निर्णय नहीं है उसे संपूर्ण ज्ञान मानते । तो ऐसे झूठ ज्ञान से प्रमाणता का निर्णय करने वाले फिर विपरीत ज्ञान का भी निर्णय कर बैठें । तब तो कोई सही व्यवस्था न बन सकेगी ।

अब यहाँ निरंशवादी शंकाकार कहता है कि निर्विकल्प प्रत्यक्ष में प्रमाणपना बताने वाला सविकल्प ज्ञान ही है । क्योंकि सविकल्प ज्ञान ने निर्विकल्प प्रत्यक्ष के द्वारा जाने गये पदार्थ का ही निर्णय कराया है, किंतु विपर्यय ज्ञान और संशय ज्ञान ये निर्विकल्प प्रत्यक्ष की प्रमाणता के संपादक नहीं हैं, क्योंकि ये खोटे ज्ञान दृष्ट अर्थ का निर्णय नहीं कराते । ऐसी निरंशवादियों का शंका रूप यह कहना युक्त नहीं है, क्योंकि एक ओर तो यह कहा जा रहा है कि सविकल्प ज्ञान स्वलक्षण को अर्थात् पदार्थ को विषय नहीं करता और दूसरी ओर कहा जा रहा कि सविकल्प ज्ञान निर्विकल्प प्रत्यक्ष द्वारा देखे गये पदार्थ का निर्णय करता है तो यह तो यों हुआ कि जैसे कोई पुरुष अपने को अज्ञानी मानता हुआ भी स्वयं को सर्वज्ञ कह बैठे । भला जो सविकल्प ज्ञान अर्थात् निर्णायक ज्ञान वास्तविक पदार्थ को न जानेगा तो वह दृष्ट अर्थ का निर्णय करने वाला कैसे हो सकता है? पदार्थ को विषय करने वाला ही पदार्थ का निर्णय कर सकता है । इस प्रकार निर्णायक ज्ञान सविकल्प ज्ञान वास्तविक पदार्थ का जाननहार है । तो उसी निर्णायक ज्ञान से कुछ अंश प्रतिभासित हुये और कुछ अंश अप्रतिभासित हुये । तो यों वस्तु के स्वभाव का भेद बन जायेगा । तब निरंशवाद का यह कहना ठीक नहीं है कि परमाणु ही अविद्यमान स्थूल आकार को भ्रम से दिखला देता है । यदि ये निरंशवादी पुरुष परमाणुवों के सर्वथा अनिश्चय होने पर भी उनमें भ्रांति ज्ञान स्वीकार करने लगे तब तो रेत आदि कुछ भी न हो वहाँ भी जल का भ्रम हो जाना चाहिये । बात तो यह है कि जहाँ जल नहीं है, मात्र रेत है वहाँ जल का भ्रम होता था, मगर सर्वथा अनिश्चय में भी भ्रम माना जाये तो रेत के बिना भी एकदम जल का भ्रम हो जाना चाहिये । पर ऐसा तो नहीं होता । कोई लंबी रस्सी पड़ी हो तो सांप का भ्रम हो जाता, पर कुछ भी न हो और भ्रम बनता हो, ऐसा तो नहीं होता । अत: यह बात अवश्य ही मानना चाहिए कि परमाणु भले ही इंद्रियगम्य नहीं है मगर उन परमाणुओं में मूर्तपना तो है । जहाँ अनेक परमाणु जब बद्ध हो जाते हैं तो वहाँ आकार फिर स्थूल हो आने से इंद्रियगम्य हो जाता है ।

पुद्गल स्कंधों को सावयवता की सिद्धि का उपसंहार―यह हठ करना ठीक नहीं है कि परमाणु इंद्रियगम्य नहीं है, तो परमाणु का संयोग होने पर भी पिंड इंद्रियगम्य नहीं हो सकता । सभी को अनेक परमाणुओं का पिंडरूप स्कंध मानना ही पड़ रहा है और जब स्कंध हैं ये सब, तो उनमें कुछ स्कंध संख्यात प्रदेश वाले हैं, कुछ असंख्यात प्रदेश वाले हैं, कुछ अनंत प्रदेश वाले हैं । यहाँ प्रदेश शब्द से परमाणु का ग्रहण किया गया है । अनेक स्कंधों का चक्षु इंद्रिय द्वारा समव्यवहार प्रत्यक्ष हो ही रहा है । अब जो सूक्ष्म स्कंध हैं या मात्र परमाणु ही हैं उनको अनुमान या आगम ज्ञान से जान लिया जाता है । वस्तु की व्यवस्था प्रतीति के अनुसार होती है और प्रतीतियाँ उसी प्रकार होतीं जैसी कि वस्तु है । सो किसी पदार्थ में कोई तथ्य जान लिया उसके द्वारा उसके अज्ञानतत्त्व को जानने में कोई दोष नहीं आता । यों पुद्गल स्कंध कोई इंद्रियगम्य हो जाता है और कोई इंद्रियगम्य नहीं हो पाते । और ये सब स्कंध संख्यात, असंख्यात और अनंत परमाणुओं के पिंड रूप हैं इसी कारण इनमें ये अनेक प्रकार के प्रदेश बताये गये हैं । अब पुद्गल के प्रदेश इस सूत्र में कहे गये तो वहाँ एक आशंका हो जाती है कि पुद्गल परमाणु के भी ये प्रदेश होते हैं क्या? तो उसका उत्तर इस सूत्र में कह रहे हैं ।


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