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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 5-21

From जैनकोष



परस्परोपग्रहो जीवानाम् ।। 5-21 ।।

परस्परोपग्रह जीवों का उपकार―जीव का उपकार जीवों में ही परस्पर उपग्रह करना है, वह परस्पर का कार्य किस प्रकार है? जैसे मालिक और नौकर इनका भी परस्पर उपग्रह है । नौकर के द्वारा मालिक का उपकार होता और मालिक के द्वारा नौकर का उपकार होता । गुरू के द्वारा शिष्य का उपकार होता, शिष्यों को अध्ययन आचरण सिखलाता है और शिष्य के द्वारा गुरू का कार्य होता सेवा, विनय, व्यवहार के वचन, उनसे ही गुरू प्रसन्न होते, यह भी उपग्रह है । तो इस तरह जीवों का परस्पर उपकार चलता है । जैसे मालिक तो धन के त्याग आदिक से सेवकों के उपकार में रहता है और सेवक हित की बात कहने में और अहित की बात का निषेध करने में मालिक का उपकार करता है । यहाँ यह बात भी जानना कि कोई यह सोचे कि मालिक सेवक का उपकारी है सो यह एकांत ठीक नहीं, सेवक मालिक का भी उपकारी है । दूसरी बात यह जानना कि वास्तविक सेवक वह है जो मालिक के हित की बात करे और अहित की बात का त्याग कराये । तो इस प्रकार मालिक और सेवक में परस्पर उपग्रह हुआ । गुरू और शिष्य में कैसे उपकार हुआ? तो गुरू तो इह लोक परलोक के फल देने वाला उपदेश देता है कि ऐसे कार्य करने से इस लोक में यह मिलता है, परलोक में यह फल मिलता है, और उस उपदेश में बतायी गई क्रियाओं का आचरण करवाते हैं―तुम इस तरह से व्रत पालो, आचरण करो, यह तो है गुरू का शिष्य पर उपकार और शिष्यजन गुरू के

अनुकूल अपना आचरण रखने से विनय व्यवहार वचन बोलने से उनको मानसिक प्रसन्नता उत्पन्न कराते हैं । तो इस प्रकार शुरू और शिष्य ये परस्पर उपग्रह करते हैं ।

प्रकरण सिद्ध होने पर भी सूत्र में उपग्रह शब्द देने का रहस्य―अब यहाँ एक शंका होती है कि कई सूत्रों से ये उपग्रह की बातें बतायी जा रही हैं कि किसके द्वारा किसका कैसा कार्य बनता है, तो यह तो प्रकरण की ही बात थी, फिर इस सूत्र में उपग्रह शब्द क्यों कहा? वह तो अपने आप जाहिर हो जाता । जिसका उपकरण है उसकी बात अपने आप लग जाती है फिर उपग्रह कहना तो निरर्थक रहा । इसके उत्तर में कहते हैं कि यहाँ उपग्रह शब्द के कह देने से यह बात जाहिर होती है कि इससे पहले सूत्र में जो चार बातें बतायी थीं उस सुख, दुःख, जीवन, मरण रूप से उपग्रह होता है जीवों का परस्पर में, यह बात समझाने के लिये यहाँ उपग्रह शब्द का ग्रहण किया है । अथवा यहाँ एक बात यह भी समझना कि जीवों का परस्पर उपग्रह केवल दो के बीच भी कहा जा सकता है । लेकिन यहाँ केवल दो जीवों का ही परस्पर कार्य न लेना, जैसे स्त्री पुरुष रमण क्रिया में एक साथ एक के द्वारा दूसरे को सुखी देखते इस तरह की बात नहीं, किंतु एक जीव के द्वारा एक, दो या बहुतों के भी सुख दुःख आदिक हो जायें । एक ही जीव के द्वारा दो, चार अनेक का जीवन बने, अनेक का मरण बने तो ऐसी अनेकता बताने के लिये यहाँ उपग्रह शब्द दिया है, जैसे कोई जीव अपना सुख कर रहा है और दूसरे के एक का सुख कर रहा, कभी दो का कर रहा, कोई बहुतों का कर रहा, ऐसे ही दुःख, जीवन, मरण का भी समझना चाहिए । तो इस तरह से जीव जीवों के ही उपग्रह के काम आते हैं । अब यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जो भी सत् होता है उसे उपकारी अवश्य होना चाहिए । यह बात अब तक जाहिर हुई है । तो सत् तो काल भी है, तो काल का क्या उपकार है । सो काल का उपकार अगले सूत्र में कहते हैं ।


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