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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 5-30

From जैनकोष



उत्पादव्ययध्रौव्य युक्तं सत् ।। 5-30 ।।

सत् का स्वरूप―उत्पादव्यय ध्रौव्य से युक्त हो उसे सत् कहते हैं । यह लक्षण कहना क्यों आवश्यक हुआ कि एक मोटे रूप से कुछ ऐसा प्रतीत होता था कि जो पदार्थ गति, स्थिति आदिक का उपकार करे वह द्रव्य कहलाता है । तो कदाचित् ये पदार्थ उपकार करते हुये विदित न हों तो क्या ये द्रव्य न कहलायेंगे? उस प्रश्न के उत्तर में यह सूत्र आता है कि चाहें किसी को उनका उपकार विदित हो या न हो, लेकिन जो उत्पादव्यय ध्रौव्य युक्त है वह पदार्थ सत् होता है । उत्पाद का अर्थ है अपनी जाति का परित्याग न करके अन्य भावों की प्राप्ति होना उत्पाद है । चेतन अथवा अचेतन द्रव्यों का अपनी जाति न छोड़ते हुये निमित्त वश से अन्य भावों की प्राप्ति होना उत्पाद है । जैसे मिट्टी के पिंड में मिट्टी जाति को न छोड़कर घड़ा बन गया, यह उत्पाद हुआ, किसी भी पदार्थ में । उत्पाद अपनी जाति को त्याग कर नहीं होता । जैसे मिट्टी से कपड़ा न बन जायेगा । उस मिट्टी में जो भी उत्पाद होगा वह मिट्टी जाति का ही होगा, किसी जीव में जो भी उत्पाद होगा तो जीव में जो गुण हैं उन गुणों में ही उत्पाद होगा। कहीं जीव पुद्गल के रूप से न उत्पन्न हो जायेगा। कोई भी पदार्थ अपनी जाति को त्यागकर नहीं उत्पन्न हुआ करते, क्योंकि उत्पन्न होने के मायने कोई नई चीज बनती नहीं है, किंतु जो है उसकी ही अवस्थायें बदल जाती हैं। तो अवस्था बदलने का अर्थ ही यह है कि जाति वह ही रहेगी, उसकी अवस्थायें बदल जायेंगी। व्यय किसे कहते हैं? अपनी जाति का परित्याग न करके पहले भावों का विलय हो जाना इसे व्यय कहते हैं। जैसे जब घट उत्पन्न हो गया तो मृतपिंड के आकार का व्यय हो गया। ध्रुव नाम किसका है? जो अनादि परिणामिक स्वभाव रूप से न तो व्यय को प्राप्त होता है, न उदय को प्राप्त होता है किंतु ध्रुव रहता है, स्थिर रहता है उसे ध्रुव कहते हैं । और ध्रुव के भाव का नाम है ध्रौव्य । जैसे मृतपिंड अवस्था हो चाहे घट अवस्था हो, सभी में मिट्टी का अन्वय रहता है । जैसे जीव की चाहे संसार अवस्था हो या मुक्त अवस्था हो, सब अवस्थाओं में जीव स्वरूप का अन्वय रहता है ।

उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य व सत् का संज्ञा लक्षण प्रयोजनादि की अपेक्षा कथंचित् भेद और पदार्थ के स्वरूप प्रदेश की अपेक्षा अभेद―यहां एक प्रश्न होता है कि युक्त शब्द का प्रयोग वहाँ होता है कि पहले तो पदार्थ वे भिन्न-भिन्न हों, फिर उनका संयोग हो तब युक्त शब्द लगता है। जैसे छतरी से युक्त, घन से युक्त, तो ये पदार्थ पहले अलग-अलग हैं, फिर इनका संबंध बना तो ये युक्त कहलायेंगे। इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि युक्त शब्द युजि धातु से बना है। जिसके अर्थ में सत्ता का अर्थ समाया हुआ है। सभी धातु भेद पायी होती हैं, उनका विशेष हो तो भी उसमें सत्त्व गर्भित है। तो इसे सामान्य भेद सत्ता से वे सब विशेष धातुयें अपने अर्थ को और साथ लगाकर विषय किया करती हैं। धातु का जो विशेष अर्थ है उस अर्थ के साथ भी सत्त्व लगा हुआ है। तो यहाँ चाहे उत्पाद व्यय ध्रौव्य युक्त सत् कह दिया जाये, चाहे उत्पाद व्यय ध्रौव्य सत् कहो, एक ही बात है। यहाँ उत्पाद व्यय ध्रौव्य लक्षण आदिक भेद से भिन्न-भिन्न भी कथंचित् हैं और उन द्रव्यों से जुदे प्रदेशों में नहीं पाये जाते हैं इससे वे अभिन्न भी हैं। सर्वथा भेद नहीं सर्वथा अभेद नहीं, सर्वथा अभेद मानने पर अब प्रतिपादन ही नहीं हो सकता । सर्वथा भेद मानने पर वस्तु का स्वरूप ही नहीं हो सकता। इस कारण इस विषय को स्पष्ट करने के लिये इसमें युक्त शब्द दिया गया है। सत् शब्द के यद्यपि अर्थ अनेक होते हैं तो भी अस्तित्त्व अर्थ यहाँ सत् शब्द का लिया गया है। सत् का अर्थ सज्जन भी होता, जैसे सत्पुरुष, सत् का अर्थ सत्कार भी होता। जैसे सत्कार में खुद सत् शब्द जुड़ा हुआ है। सत् का अर्थ ‘होता हुआ’ ऐसा भी चलता है। जैसे गच्छन्सनं आदि। यहाँ सत् शब्द का अर्थ अस्तित्त्व लिया गया है। जो –जो भी पदार्थ उत्पाद व्यय ध्रौव्य युक्त होते है वे सत् हैं या जो –जो भी पदार्थ सत् हैं वे सब उत्पाद व्यय ध्रौव्य युक्त हैं।

पदार्थों की उत्पादव्यय ध्रौव्यात्मकता का नियम―जो भी पदार्थ होता है, वह प्रति समय नई दशा धारण करता है, पुरानी दशा विलीन करता है और स्वयं बना रहता है । नई अवस्था होने का नाम उत्पाद है, पहली अवस्था विलीन होने का नाम व्यय है और वही पदार्थ रहता है, वही ध्रौव्य है । जैसे कोई जीव मनुष्य है और मरकर देव बना तो देव पर्याय के रूप में जीव का उत्पाद है । मनुष्य पर्याय के रूप से जीव का नाश है और जीवत्व की दृष्टि से जीव का ध्रौव्य है । ऐसा उत्पाद व्यय ध्रौव्य प्रत्येक पदार्थ में होता है । यदि कोई पदार्थ निर्मल है शुद्ध है तो उसके उत्पाद व्यय का पता नहीं पड़ पाता कि क्या तो उत्पन्न हुआ और क्या चीज नष्ट हुई ? जैसे जब जीव केवल ज्ञानी बन जाता है तो केवलज्ञान में तो तीन लोक, तीन काल के समस्त पदार्थ ज्ञेय हो गये और एक ही समय में सर्व कुछ जान लिया। अब दूसरे समय में क्या करता है। यह सब कुछ दूसरे समय में जानता है। तीसरे समय में क्या करता है? यही सब कुछ तीसरे समय में जानता। तो वहाँ यही बात जल्दी में विदित होती है। जो पहले जाना वही अब जान रहा, कुछ नई दशा तो नहीं बनी, लेकिन दूसरे समय में वह पूर्णतया नई अवस्था है पर्याय दृष्टि से, क्योंकि जानने में ज्ञान शक्ति का परिणमन तो हो रहा है। तो दूसरे समय में जो जानना बना वह दूसरे समय का अवस्था होना है । और तब पहले समय की अवस्था न रही, जीव वही है । प्रत्येक पदार्थ चाहे वह शाश्वत, शुद्ध रहता हो, चाहे किसी प्रकार का हो, उत्पाद व्यय तो सदा रहता है ।

द्रव्य का द्रव्यरूप से अवस्थान होने में ध्रौव्यत्व की सिद्धि―इस प्रकरण में एक शंका होती है कि पदार्थ में जो उत्पाद और व्यय बने याने नई परिणति बनी, पुरानी परिणति विलीन हुई सो ये दो बातें द्रव्य से अभिन्न हैं या भिन्न हैं। नई अवस्था का होना, पुरानी अवस्था का विलीन होना, ये क्या द्रव्य से बाहर हो रहे हैं या द्रव्य में ही अभिन्न हैं? उन ही की परिणति है। भिन्न तो हैं नहीं, क्योंकि द्रव्य से बाहर द्रव्य की कोई दशा नहीं पायी जाती। जैसे एक अंगुली सीधी है, उसे टेढ़ी की गई तो यह वहाँ निरखिये कि अंगुली का टेढ़ापन होता है तो उस समय सीधापन नष्ट हो जाता। ये उत्पाद व्यय बताओ अंगुली से बाहर हो रहे क्या? बाहर तो कोई नहीं कह सकता । अंगुली में ही चल रहे हैं, ऐसे ही प्रत्येक पदार्थ के उत्पाद और व्यय में पदार्थ से अभिन्न है तो लो जब उत्पाद द्रव्य से अभिन्न हो गये तो फिर द्रव्य ध्रुव कैसे रह गया ? उत्पाद हुआ और वह है, द्रव्य से अभिन्न तो मानो द्रव्य ही एक नया बन गया । तो ध्रुव तो न रहा, इसके उत्तर में कहते हैं कि जो द्रव्य को ध्रुव कहा जा रहा है कि द्रव्य सदा रहा करता है सो इस कारण से नहीं कहा जा रहा कि द्रव्य उत्पाद और व्यय से भिन्न है । याने द्रव्य की सत्ता बनी रहने का कारण यह नहीं है कि द्रव्य उत्पाद व्यय से भिन्न है, किंतु कारण है कि द्रव्य, द्रव्य रूप से सदा रहता है इसलिये द्रव्य ध्रुव है । द्रव्य उत्पत्ति, और विलीनता से अभिन्न है या भिन्न है? इसका समाधान तो आगे दिया जायेगा, किंतु यहाँ यह जानें कि उत्पाद व्यय से द्रव्य को भिन्न माने । तब ही ध्रुव बने यह कोई सिद्धांत नहीं है, द्रव्य में उत्पाद व्यय खूब होते हैं, प्रति समय होते हैं मगर द्रव्य, द्रव्य रूप से सदा रहता है इस कारण ध्रुव है । जैसे जीव अभी मनुष्य था, अब देव हो गया तो मनुष्य का विलीन होना, देव का उत्पन्न होना और जीव का सदा रहना ये तीन बातें जो कही गईं उसमें कोई यह प्रश्न करे कि बतलाओ मनुष्य का विलीन होना और देव का उत्पन्न होना यह जीव से अभिन्न है ना? तो हर एक कोई कहेगा कि हां अभिन्न है जीव तो आधार बने नहीं और उत्पाद व्यय बाहर होते रहें ऐसा तो कहीं नहीं होता । तो अभिन्न है देव का होना, मनुष्य का विलीन होना, इससे कहीं द्रव्य अध्रुव नहीं हो जाता । मनुष्य के विलीन होने से, देव के उत्पन्न होने से भिन्न जीव को माना जाये तब जीव सदा रहे ऐसा सिद्धांत नहीं है किंतु जीव जीवपने से सदा रहता है इस कारण ध्रुव हैं, ऐसे ही प्रत्येक द्रव्य, द्रव्यपने से सदा रहता है इसलिए ध्रुव कहा जाता है, इसके विपरीत कोई कल्पना तो करे कि उत्पाद और व्यय से द्रव्य जुदे हैं इस कारण ध्रुव, है तो फिर यों उल्टा भी कोई कह सकता कि चूंकि द्रव्य से भिन्न है उत्पाद व्यय इसलिये उत्पाद व्यय भी ध्रुव होना चाहिये, क्योंकि अब तो उत्पाद व्यय स्वतंत्र हो गये । द्रव्य से निराले हो गये । सो । भाई अपेक्षा सही जानें । पर्याय दृष्टि से तो उत्पाद व्यय है, पर द्रव्य, द्रव्य रूप से सदा रहता है इस कारण वह ध्रुव है । जब उत्पाद व्यय हो रहा है तब भी रूप स्थिर है । जैसे मिट्टी के लोंधे से घड़ा बन रहा है, घड़े का उत्पाद है और मृतपिंड का विनाश है । लेकिन इसी समय मिट्टी, मिट्टी रूप से है ही है इस कारण वह ध्रुव है । तो यह वस्तु का स्वरूप है । जो सत् है उसका स्वरूप ही यह है कि उसमें अवस्थायें तो बनती जायेगी और वह चीज अपने स्वरूपत: वही रहेगी ।

उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य व द्रव्य का परस्पर कथंचित् भेद व अभेद का प्रतिपादन―अब इन बातों का अनेकांत से निर्णय बनाइये । उत्पाद और व्यय द्रव्य से कथंचित् भिन्न हैं, कथंचित् अभिन्न है । भिन्न तो यों है कि जो व्यय का लक्षण है वह उत्पाद और द्रव्य में नहीं । जो उत्पाद का लक्षण है वह व्यय और ध्रौव्य में नहीं, द्रव्य में नहीं । जो द्रव्य या लक्षण है वह द्रव्य में है, तो लक्षण की दृष्टि से इनमें भेद है मगर हैं तो सब एक ही पदार्थ की विशेषतायें । एक ही द्रव्य किस रूप में परिणमा है और किस रूप में मिट गया है वह सब एक ही पदार्थ की चीज है । यहाँ सीधा निष्कर्ष यों जानें कि जो भी पदार्थ होते हैं वे अपनी जाति का त्याग न करके राग द्वेष रूप से उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं । और एकांत का पक्ष लेने से तो कुछ भी वचन नहीं बोले जा सकते । अच्छा ये शंकाकार ही बताये कि वे अपने पक्ष का समर्थन करने के लिये जिस हेतु का प्रयोग करते वह हेतु साधक है यह मानते, पर वह हेतु साधकपने से सर्वथा अभिन्न है या भिन्न है? यदि हेतु साधकपने से मायने अपने लक्ष्य को सिद्ध करता है इस रूप से सर्वथा अभिन्न है तो पर पक्ष का साधक भी बन जायेगा, क्योंकि साधक पर पक्ष में या दूसरे प्रतिवादियों में भी हुआ करता है । या परपक्ष की तरह अपने पक्ष का भी दूषण करने वाला बन जायेगा । इससे मानना कि ये तीन पर्यायें हैं―उत्पाद व्यय और ध्रौव्य । पर्याय के अनेक अर्थ होते हैं । भाग भी पर्याय कहलाते, अंश भी पर्याय हैं । कभी अखंड द्रव्य को समझने के लिये गुणों का भेद किया जाये वह भी पर्याय है । सो यह यहाँ उत्पाद व्ययध्रौव्य रूप पर्याय, पर्याय वाले द्रव्य में कथंचित् अभिन्न है, कथंचित् भिन्न है । प्रयोजन यह है कि जगत में जो भी पदार्थ हैं वे सदा बने रहते हैं, बनते हैं और बिगड़ते हैं । इस तथ्य को न जानने वाले लोग कोई तो यह हठ करेंगे कि द्रव्य नित्य विलीन वाला ही होता है । तो कोई यों हठ कर लेगा कि द्रव्य तो क्षण-क्षण में नया-नया बनता है । वस्तुत: तथ्य स्याद्वाद से सिद्ध होता है । यहाँ तो यह जानना कि जैसे गुण द्रव्य में सदा रहते हैं ऐसे ही पर्याय भी द्रव्य में सदा रहती है । इस तरह से गुण और पर्याय ये सब वही द्रव्य ही कहलाये, पर पर्यायें बाहरी तरफ तो दिखती हैं । अभी घड़े रूप में थी मिट्टी अब उसको मार दिया, खपरिया बन गई, तो लो पर्याय दूर हो गई और पर्याय से अभिन्न है द्रव्य तो द्रव्य भी शून्य हो जाना चाहिये । ऐसी आशंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि द्रव्य का स्वरूप कभी रहे कमी न रहे, यह नहीं माना गया है । द्रव्य की अवस्थायें तो कभी रहे कभी न रहे, यह तो हो जाता है पर द्रव्य का स्वरूप कभी रहे कभी न रहे, यह नहीं होता तो व्यय और उत्पाद होने पर भी द्रव्य सदा रहता है, यह ही बात अगले सूत्र में कहते हैं ।


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