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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 5-5

From जैनकोष



रूपिण: पुद्गला: ।। 5-5 ।।

प्रकरण में अरूपित्व शब्द का वाच्य अमूर्तत्व―पुद्गल द्रव्य रूपी होते हैं यद्यपि रूप शब्द के अनेक अर्थ हैं । पर यहाँ रूपी से मतलब मूर्त का ही ग्रहण करना । रूप शब्द के क्या-क्या अर्थ होते है? रूप शब्द का कहीं तो द्रव्य अर्थ होता है । जैसे कोई कहे कि गोरूप, तो उसका अर्थ है गोद्रव्य । कहीं रूप का अर्थ स्वभाव बनता है―जैसे चैतन्यं पुरुषस्यस्वरूपं । चैतन्य पुरुष का स्वरूप है । तो स्वरूप मायने स्वभाव । आत्मा का स्वरूप ज्ञानदर्शन है । मायने ज्ञान दर्शन आत्मा का स्वभाव है । कहीं रूप शब्द अभ्यास अर्थ में आता है । जिसे दस रूप अध्ययन करना चाहिए जिसका अर्थ होता है कि 10 बार तक अभ्यास करना चाहिए । कहीं रूप शब्द श्रुति में आता है अर्थात श्रवण विषयभूत बने उसमें आता है । जैसे स्वंरूपं शब्दस्य स्वश्रुतिरित्यर्थ: याने शब्द का स्व रूप है मायने श्रवण का विषयभूत बने वही शब्द का रूप है । रूप शब्द का प्रयोग महाभूतों के लिए भी किया जाता है जैसे कथन आता है कि 4 महाभूत हैं । कहीं रूप शब्द गुण विशेष में आता है । जैसे चक्षु इंद्रिय द्वारा ग्रहण करने के जो योग्य है वह रूप कहलाता है । तो कहीं मूर्ति का पर्यायवाची रूप शब्द है । जैसे रूपि द्रव्यं ऐसा बोला जाए तो उसका अर्थ है कि मूर्तिमान द्रव्य । तो रूप शब्द के अनेक अर्थ होते हैं । उन अर्थो में से मूर्ति अर्थ लेना है । पुद्गल रूपी होते हैं अर्थात पुद्गल मूर्तिक होते हैं ।

रूपादिमत्व व संस्थान विशिष्टत्व की मूर्तिकता―अब कहते हैं कि वह मूर्ति क्या है जो रूप शब्द से ग्रहण कराया गया है । तो कहते हैं कि रूप, रस, गंध, स्पर्श का होना, गोल, त्रिकोण, चौकोर आदिक आकार का होना ये ही जिसके परिणाम हैं उसे मूर्ति कहते हैं । आकार और रूप, रस, गंध, स्पर्श इस ही को मूर्ति कहते हैं । अथवा रूपी शब्द से रूप गुण ले लीजिये । जो नेत्र इंद्रिय के द्वारा ग्रहण के योग्य होता है सो रूप अर्थ भी ले सकते हैं । पर यहाँ यह शंका न करना चाहिए कि रूप ग्रहण कर लें तो रस, गंध, स्पर्श छूट गए क्योंकि रस आदिकरूप के साथ ही अव्यतिरेकी है, याने रूप के अविनाभावी हैं । जहाँ रूप हैं वहाँ ये सब हैं । जहाँ इन 4 में से कोई एक है वहाँ वे सब हैं और इस कारण रूप शब्द कहते ही रस, गंध, स्पर्श का अंतर्भाव हो जाता है ।

पुद्गलद्रव्य और रूपगुण में पर्यायार्थिकदृष्टि से कथंचित भेद विदित किया जाने से रूप शब्द में इन् प्रत्यय की योजना―अब यहाँ शंकाकार कहता है कि रूपिन् शब्द बना है तद्धित में । रूप शब्द से इन् प्रत्यय लगाकर जिसका अर्थ होता हे रूप वाला, सो इन् प्रत्यय लगाना अनुचित जँचता है, रूप वाला कहना असंगत मालूम होना है क्योंकि पुद्गल रूप वाला नहीं, किंतु रूपमय है । पुद्गल के साथ रूप का अभेद ढोने से रूप वाला कहना ठीक नहीं जंचता । इसके उत्तर में कहते हैं कि सर्वथा ऐसा कहना उचित नहीं है कारण कि रूप में और पुद्गल में कथंचित भेद सिद्ध होता है । शंकाकार का तो यह अभिप्राय है कि जैसी दंडी, दंड वाला, छतरी वाला कहा तो चूंकि छतरी और पुरुष ये दोनों भिन्न-भिन्न हैं, सो वहाँ तो वाला शब्द मानना ठीक है, परंतु यहाँ रूप पुद्गल द्रव्य से भिन्न नहीं है । उस पुद्गल के ही रूपादिक पर्याय परिणाम है । रूप गुण में पुद्गल का ही गुण है । इस कारण इन् न लगाना चाहिए । वाला शब्द न लगाना चाहिए । तो वह भेद को देखकर ही तो कहा जा रहा है । सो यहाँ भी देख लो कि रूप पुद्गल से कथंचित भिन्न है, यद्यपि पुद्गल का अभिन्न परिणाम है रूप, सो अभेद है । द्रव्यार्थिक की दृष्टि में द्रव्य से, भेदरूप से रूप पाया नहीं जाता है तो भो पर्यायार्थिकनय की विवक्षा की जाती है तब यह विदित होता ही है कि रूप का विनाश होने पर पुद्गल अवस्थित रहते हैं । सो आदिमान और अनादिमान् ऐसे दो ढंग विदित होते हैं । रूप का जो हरा, पीला, नीला आदिक परिणमन है वह तो आदि वाला जंचता है, किंतु वह पुद्गल द्रव्य जिसमें हरे, पीले आदिक परिणमन आये वे अनादि विदित होता है । तो कथंचित रूप में और पुद्गल में भेद है । जैसे आत्मा और ज्ञान में कोई भेद नहीं है, पर प्रतिपादन के लिए अथवा पर्यायदृष्टि में तो यह विदित होता है कि आत्मा द्रव्य है और ज्ञानगुण है, जैसे ज्ञानगुण है वैसे ही अनंत गुण भी हैं । पर आत्मद्रव्य वह एक स्वभावी ही है । तब ही तो जो कुछ जाना उसकी आदि हुई, और आत्मा अनादि है । ऐसे हो रूप में जो बना उसकी आदि है और वह स्कंध पुद्गल भी अनादि है इस कारण से रूप में और पुद्गल में कथंचित भेद भी सिद्ध होता है । अन्वय व्यतिरेक भी पाया गया, इससे भी भेद सिद्ध हुआ तो रूप में और पुद्गल में कथंचित भेद सिद्ध होता है इस कारण इन् शब्द अर्थात वाला शब्द लगाना उचित ही है ।

अभेद होने पर भी मतुप् प्रत्यय की योजना का व्यवहार होने से भी रूप शब्द में इन् प्रत्यय लगने का औचित्य―दूसरी बात यह है कि लोक में ऐसा प्रकट व्यवहार दिखता है कि अभेद होने पर भी वान शब्द लगा करता है । जैसे आत्मा आत्मावान है, अपने स्वरूप वाला है । आत्मा कोई भिन्न वस्तु तो नहीं है लेकिन प्रतिपादन विधि से इसी प्रकार से प्रयुक्त होता है । जैसे कोई कहना कि यह काठ सारवान है । कोई मोटी कड़ी पड़ी थी । जिसे छत के नीचे लगाते हैं, वह है कड़ी तो वह कड़ी सारवान है, सार वाली है । अब देखिये सार अभिन्न है सारमय ही तो है वह वृक्ष, मगर सारवान इस प्रकार का शब्द का प्रयोग अभेद होने पर भी देखा जाता है । कहीं सार वृक्ष से अन्य नहीं है । तो भी व्यपदेश देखा गया ऐसे ही रूपी है पुद्गल ऐसा कहने पर यद्यपि रूप शक्ति पुद्गल में अभेद रूप है फिर भी लोक में ऐसा व्यवहार देखा ही जाता है ।

सूत्र में विविधता की प्रसिद्धि के लिये पुद्गल शब्द का बहुवचन में प्रयोग―इस सूत्र में दो पद हैं । पहला पद है―रूपिण: और दूसरा पद है―पुद्गला: । पहले पद के संबंध में वर्णन हुआ है । अब द्वितीय पद पुद्गल के विषय में सुनो । सूत्र में पुद्गला ऐसा बहुवचन कहा गया है, सो यह बहुवचन भेद का प्रतिपादन करने के लिए है याने पुद्गल के अनेक प्रकार बताने के लिए बहुवचन में प्रयोग किया गया है । पुद्गल नाना प्रकार के हैं । पहले तो देखिये―परमाणु और स्कंध । स्कंध नाना तरह के हैं, दो परमाणुओं का समुदाय भी स्कंध कहलाता है । अनंत परमाणुओं का समुदाय भी स्कंध है । सो पुद्गल के अनेक भेद आगे बताये जायेंगे । यहाँ केवल इतना ही निर्देश किया जाता है कि सूत्र में पुद्गला: शब्द बहुवचन में प्रयुक्त होता है, तो उससे विदित होता है कि अनेक जाति के पुद्गल मूर्तिमान हैं, यह अर्थ बनता है । ये पुद्गल एक-एक परमाणु रूप भिन्न-भिन्न हैं और ये अनंतानंत परमाणु हैं । समस्त परमाणु कितने हैं इसका अंदाज बनावें इस ढंग से कि पहले जीव द्रव्य के द्वारा ग्रहण किये गये पुद्गल की ही गणना समझ लीजिये । जो जीव विकास में अत्यंत हीन हो । जैसे कोई सूक्ष्म जीव, छोटी से छोटी अवगाहना वाला जीव के भी साथ जो शरीर लदा है औदारिक शरीर उसमें अनंत परमाणु हैं और उससे अनंतगुणे शरीर के आहार वर्गणा के विस्रसोपचय परमाणु हैं । उसे अनंत गुणे तैजस परमाणु हैं । उससे अनंतगुणे कार्माण परमाणु हैं और उससे अनंतगुने कार्माण वर्गणा के विस्रसोपचय परमाणु हैं । इतने परमाणु तो लगे हैं सूक्ष्म जीव के साथ । एक इंद्रिय के साथ, पर जो दो इंद्रिय जीव हैं तो उतने परमाणु तो उसके साथ हैं ही । पर भाषावर्गणा के परमाणु भी उस जीव से अधिष्ठित हैं । फिर 3 इंद्रिय को देखिये तो उतने तो हैं ही और भाषावर्गणा के परमाणु उसके साथ हैं, इसी प्रकार 4 इंद्रिय में व 5 इंद्रिय में हैं संज्ञी पंचेंद्रिय जीवों के मनोवर्गणा के परमाणु भी लग गए । यह तो जीव के द्वारा गृहीत का वर्णन है―जो कि ग्रहण में आ गये । अब देखो वे परमाणु और हैं जिन्हें जीव ने ग्रहण करके छोड़ दिया । वे और जो जीव के द्वारा ग्रहण में नहीं आ सकते वे परमाणु और हैं । तो इस प्रकार अनंतानंत परमाणु विदित होते हैं । सो ये सब परमाणु एक दूसरे से भिन्न-भिन्न हैं तो क्या इसी तरह से और द्रव्य भी भिन्न-भिन्न अनेक हैं उसके उत्तर में कहते हैं―


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