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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 5-8

From जैनकोष



असंख्येया: प्रदेशा धर्मीधर्मैक जीवानाम् ।। 5-8 ।।

असंख्यात प्रदेश वाले द्रव्यों का निर्देश―धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य और एक जीव, इसके असंख्यात प्रदेश होते हैं । कैसे जाना कि इसके असंख्यात प्रदेश होते हैं? तो धर्म और अधर्म द्रव्य का परिमाण देखिये―धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य का आदि अंत परिमाण है । आकाश की तरह अनंत नहीं हो सकता, क्योंकि यह लोकाकाश में ही रहता है, और लोक का परिमाण है । पृथ्वी, ढेला पत्थर आदिक जो कुछ बने हैं, यह ही तो समस्त लोक है, तो इनका अंत जरूर है कहीं । चाहे कितना ही बड़ा विस्तार हो, पर लोक का अंत कहीं जरूर है । तो धर्म द्रव्य लोकाकाश में है । जहाँ तक लोक है वहाँ तक धर्मद्रव्य है, या कहो कि जहाँ तक धर्मद्रव्य है वहाँ तक लोक है, तो धर्मद्रव्य का भी कहीं अंत है इसलिये अनंत प्रदेश तो हो नहीं सकते, पर इतना विशाल है कि उनके प्रदेश गिने नहीं जा सकते, इस कारण संख्यात भी नहीं है और संकोच विस्तार भी नहीं होता । भैया, मूल गणनायें 3 होती हैं―(1) संख्यात, (2) असंख्यात और, (3) अनंत । धर्म अधर्म द्रव्य के प्रदेश अनंत तो हैं नहीं, संख्यात भी नहीं, तब असंख्यात हैं यह अपने आप सिद्ध होता है । धर्म द्रव्य के असंख्यात प्रदेश है । अधर्मद्रव्य के असंख्यात प्रदेश हैं । और एक जीव के असंख्यात प्रदेश हैं ।

लोक पूरण समुद्घात की स्थिति से जीव के असंख्येय प्रदेशों का स्पष्ट परिचय―एक जीव के ये प्रदेश कैसे समझे गए? तो यों समझिये कि किसी अवस्था में यदि यह जीव फैल जाये तो उतना ही फैल पाता है जितना कि धर्म द्रव्य का परिमाण है, लोकाकाश का परिमाण । इतना फैलता कब है? केवली समुद्घात अवस्था में । जब किसी मुनिराज के चार घातिया कर्म का क्षय हो जाता हे तो वह संयोग केवली अरहंत कहलाता है । उनके अभी चार अघातिया कर्म बाकी हैं―(1) वेदनीय, (2 आयु, (3 नाम और, (4) गोत्र । सो आयु तो बहुत थोड़ी होती है उन तीन कर्मों के मुकाबले में और शेष तीन कर्म लाखों करोड़ों वर्षों के या उससे भी अधिक के होते हैं । तो यहाँ एक समस्या यह आती है कि आयु तो है मानो थोड़ी, मान लो चार मिनट की रह गई और तीन कर्म हैं लाखों करोड़ों वर्ष के तो आयु का क्षय होने पर फिर यह शरीर तो रहेगा नहीं, तो तीन का क्या हाल होगा? तीन कर्म तो सत्ता में हैं । तो बात यह है कि जिस समय आयु कर्म अंतर्मुहूर्त रह जाता है उस समय में सयोग केवली भगवान के समुद्घात होता है अर्थात् वे जीव प्रदेश शरीर से बाहर फैलते हैं और पहले तो वे दंडाकार फैलते हैं । पद्मासन में विराजे हों अरहंत भगवान तो उस आकार फैलते हैं । खड्गासन से विराजे हों उस ढंग से फैलते हैं, तिगुने आकार फैलते हैं, मगर लोक हैं 14 राजू तो वह सींक से भी पतला जैसा समझ लीजिए हो गया । डंडे के आकार हो गया फिर अगल बगल फैलता है फिर कपाट (किवाड़) के आकार हो गये प्रदेश । फिर आगे पीछे फैलते हैं, प्रतर हो गया फिर बाकी जो वातवलय बचा है उसमें फैलते हैं, उस समय सारे लोक में जीव के प्रदेश फैल चुकते हैं । उसके बाद घटते भी उस ही क्रम मे हैं, फिर शरीर प्रमाण रह जाते हैं । इस क्रिया में बाकी के जो तीन अघातिया कर्म हैं वे आयु कर्म के करीब बराबर हो जाते हैं । जो कुछ अंतर रहता है तो बाद में अपने आप नष्ट हो जाता है । तो चारों कर्म एक बराबर के हो गए । तो एक साथ क्षय हुआ और मोक्ष उनका हुआ । तो यहाँ यह बात जानना कि जिस समय लोक पूरण समुद्घात हुआ उस समय लोकाकाश के एक-एक प्रदेश पर जीव का एक-एक प्रदेश हो गया, और जीव के मध्य के जो 8 प्रदेश हैं वे मेरु पर्वत के नीचे बीचोबीच मध्य में जो 8 प्रदेश हैं वहाँ है और शेष सर्वत्र एकएक प्रदेश पर प्रदेश-प्रदेश ठहर कर ऊर्ध्वलोक मध्यलोक अधोलोक में समग्र लोकाकाश को व्याप लेते हैं । तो जीव धर्मद्रव्य के प्रदेश बराबर हो गये लोक पूरण अवस्था में, उससे जाना गया कि ये जीव के भी असंख्यात प्रदेश होते हैं । अब जीव के प्रदेश तो संकोच में आ जाते कि यह देह बराबर हो गया मगर धर्म द्रव्य के प्रदेश संकोच में नहीं आते । वे नित्य अवस्थित हैं । जैसे हैं वैसे ही हैं । तो इस प्रकार धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य और एक जीव इनके असंख्यात प्रदेश होते हैं ।

असंख्यात को असंख्यात रूप में ही जानने में सर्वज्ञता―यहाँ एक जिज्ञासा होती है कि जब इसके प्रदेश गिनने में ही नहीं आते तो फिर उन प्रदेशों की कोई जानकारी ही नहीं रहती । कितने हैं प्रदेश ! उनकी कुछ गणना ही नहीं है तब फिर उनको कोई जान ही नहीं सकता । तो कोई फिर सर्वज्ञ नहीं रहा । कहते हैं जो सबको जाने सो सर्वज्ञ । जीव के सब प्रदेशों को कहाँ जाना? वे गिनती में ही नहीं आते । तो इस तरह तो असर्वज्ञता आ जायेगी । उत्तर में कहते हैं कि यह शंका करना ठीक नहीं, कारण यह है कि जानने में आया, मगर वह असंख्यात, असंख्यात रूप से जानने में आया, ये गिने नहीं जा सकते । इतने हैं इस रूप से जानने में आये तो जान लिया ना सबको । और ठीक ही जाना । असंख्यात को असंख्यात रूप से जानना यथार्थ जानना है । अनंत को अनंत रूप से जानना यथार्थ ज्ञान है । यदि असंख्यात को गिनती रूप में जाना जाता तो झूठा ज्ञान है । और जो जैसा अवस्थित है उसको उस तरह से जानना यह है सम्यग्ज्ञान । तो इस प्रकार सिद्ध हुआ किं धर्म द्रव्य के असंख्यात प्रदेश, अधर्मद्रव्य के असंख्यात प्रदेश और एक जीव के असंख्यात प्रदेश होते हैं ।

प्रदेश का प्रदेशन―प्रदेश का अर्थ क्या है? प्रदिश्यंते प्रतिपाद्यंते इति प्रदेश: जो प्रतिपादित हो, जो समझाया जाये वह प्रदेश है, यह कैसे प्रतिपादित किया गया? एक परमाणु जितनी जगह को घेरे उसे कहते हैं एक प्रदेश । परमाणु नाम है अविभागी पुद्गलद्रव्य का । जो कुछ ये दिखते हैं ये सब स्कंध हैं, इनमें अनंत परमाणु हैं । असंख्यात, संख्यात या दो चार परमाणु का कोई स्कंध बना हो तो वह आँखों से दिखने में न आयेगा । अर्थात जब अनंतानंत परमाणु हैं तब दृश्य होते हैं । फिर भी वे सब एक-एक ही तो हैं । वे बिखर जायें और बिखरते-बिखरते उनमें एक परमाणु रह जाये तो वह एक प्रदेश है । परमाणु-परमाणु एक प्रदेशी । अब ऐसा ध्यान में लीजिए कि सूई की नोक से जितना गड्ढा हो सकता है कागज में या पृथ्वी पर उतनी जगह में अनगिनते प्रदेश होते हैं आकाश के । इतनी जगह में पड़ा हुआ कोई स्कंध है तो वह भी अनगिनते परमाणुओं का स्कंध है अनंत का भी हो सकता है एक परमाणु कितना होता है? आज के विज्ञान में अणु बम, परमाणु बम कहते तो हैं मगर वह अणु नहीं है वह परमाणु नहीं है । अणु का कभी प्रयोग नहीं किया जा सकता । वह तो अपने आप जो कुछ हो सो हो । ये अणु बम परमाणु बम, यह भी अनंत परमाणुओं का स्कंध है । मगर शस्त्र विद्या में कम से कम जो कुछ स्कंध उनमें तैयार हों उसका नाम परमायु रखा । यही उनकी दृष्टि में छोटा है ।

प्रदेश लक्षण के आधार पर असंख्येय प्रदेश वाले पदार्थों का निरूपण―एक परमाणु जितनी जगह को घेरे उसे कहते हैं एक प्रदेश । एक परमाणु दो प्रदेशों को नहीं घेर सकता । हाँ एक प्रदेश में कई परमाणु रह सकते हैं । वह तो एक अवगाहना की बात है, किंतु एक परमाणु दो प्रदेशों को नहीं घेर पाता । तो एक परमाणु द्वारा जितने प्रदेश घिरे उसका नाम है प्रदेश । तो ऐसे-ऐसे असंख्यात प्रदेश हैं धर्मद्रव्य में । और ठीक उतने हो अधर्म द्रव्य में प्रदेश हैं और ठीक उतने ही एक जीव में प्रदेश हैं । चाहे चींटी के शरीर का जीव हो, चाहे हाथी के शरीर का जीव हो, प्रदेश सबके बराबर हैं, असंख्यात हैं । यह छोटे बड़े का जो अंतर लग रहा है यह संकोच और विस्तार के कारण है । तो इन तीन में जिसके असंख्यात प्रदेश बताये गये, धर्म द्रव्य और अधर्म द्रव्य तो निष्क्रिय है और लोकाकाश बराबर व्यापकर अवस्थित हैं, किंतु जीव उतने प्रदेश वाला है जितने कि धर्म द्रव्य में प्रदेश हैं, फिर भी उसके संकोच विस्तार का स्वभाव है । यह स्वभाव भी अन्य द्रव्य में न मिलेगा । परमाणु का भी संकोच विस्तार नहीं है, वहाँ तो बंध है, मिलना-जुलना है, बिछुड़ना है । अलग-अलग हो जाते हैं । धर्म द्रव्य में भी संकोच विस्तार नहीं, अधर्म में भी नहीं आकाश में भी नहीं और कालद्रव्य में भी नहीं ।

जीव पदार्थ में ही कर्मोपाधिवश संकोच विस्तार―जीव एक ही ऐसा पदार्थ है कि जिसके प्रदेश का परमाणु संकुचित भी हो जाये और विस्तार भी हो जाये तो इस संकोच और विस्तार का कारण क्या है? कर्मोदय । पुद्गल कर्म के उदय का निमित्त पाकर जैसी शरीर रचना हुई है उसमें फैल गया, अथवा सिकुड़ गया । तो जीव के प्रदेशों का सिकुड़ना या फैलना यह कर्मोदय का निमित्त पाकर होता है और यही कारण है किं जो जिस शरीर से मुक्त होता है वह उसी शरीर प्रमाण रहता है मोक्ष में । कुछ लोग पूछते हैं कि वे सिद्ध वटबीजप्रमाण या सर्वव्यापकयों क्यों नहीं रहते हैं । तो कोई जवाब देवे कि उससे घटकर रहे या बढ़कर? घट जाये इसका कारण क्या? बढ़ जाये इसका कारण क्या? घटने-बढ़ने का कारण तो कर्मोदय था । अब कर्मक्षय हो गया तो न घट सकता और न बढ़ सकता । जिस प्रमाण में था, मुक्त हुआ, मोक्ष होने पर वही प्रमाण रहता है । इस प्रकार इस अस्तिकाय के प्रमाण में प्रदेश बताये हैं―धर्म, अधर्म और एक जीव के असंख्यात । और वह असंख्यात भी न जघन्य असंख्यात न उत्कृष्ट असंख्यात किंतु मध्यम असंख्यात । असंख्यात भी असंख्यात तरह का होता है, उसमें जघन्य असंख्यात भी नहीं है उत्कृष्ट असंख्यात भी नहीं है किंतु मध्य का असंख्यात और वह भी एक नियत । उसकी गणना नहीं है इस कारण स्पष्ट ध्यान में नहीं आता मगर युक्ति से, आगम से यह भले प्रकार सिद्ध है कि इसमें असंख्यात प्रदेश होते हैं ।

एक द्रव्य में प्रदेशपरिमाण निरूपण की संगतता में आशंका―पंचम अध्याय के प्रथम सूत्र में अजीव अस्तिकायों के नाम लिये और उसके बाद जीव अस्तिकाय को भी बताया था । तो अस्तिकाय शब्द से इतना तो बोध हुआ कि ये द्रव्य बहुप्रदेशी हैं, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य, आकाशद्रव्य, पुद्गल भी लिया गया है, स्कंध के नाते से और जीवद्रव्य, ये सब बहुप्रदेशी हैं । अब यहाँ प्रत्येक द्रव्य के प्रदेशों की गणना बता रहे हैं । इस सूत्र में बताया गया है कि धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य और एक जीवद्रव्य असंख्यात प्रदेशी होते हैं । यहाँ एक शंका यह हो सकती है कि धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य तो एक द्रव्य हैं और एक जीव भी एक द्रव्य है । तो एक द्रव्य में प्रदेश की कल्पना करना उपचार सा मालूम होता हे । जैसे बड़ी चीज हो, चौकी है तो कह सकते हैं कि इसमें अनंत प्रदेश हे, अनंत परमाणु हैं । इसके अनंत हिस्से हैं मगर एक द्रव्य के बारे में हिस्सा बताना, प्रदेश बताना, अवयव बताना यह कैसे ठीक हो सकता है । और उपचार की जो बात है वह मिथ्यावचन है और मिथ्यावचन का तत्त्वपरीक्षा में कोई अधिकार नहीं । लोकव्यवहार में तो उपचार चलेगा, किंतु जहाँ तत्त्व परीक्षण हो रहा वही उपचार से कोई प्रयोजन नहीं । झूठ बात की क्या चर्चा बढ़ाना? पानी से तो प्यास बुझेगी, मृगतृष्णा से नहीं इसलिये एक द्रव्य में असंख्यात प्रदेश बताना यह उपचार से कही हुई बात है, वास्तव में नहीं है । जो एक द्रव्य है सो एक है, उसमें अवयव की क्या कल्पना ?

एक द्रव्य में मुख्य क्षेत्र विभाग प्रतिपाद्य होने से प्रदेश परिणाम निरूपण की संगतता का समाधान―उक्त शंका का उत्तर देते हैं । कल्पना नहीं, उपचार नहीं किंतु मुख्य क्षेत्र का विभाग है । एक धर्मद्रव्य है जो असंख्यातप्रदेशी कहा गया है । तो धर्मद्रव्य का निज का हे । सो तो युक्त ही है । हाँ दोनों कहो, अन्य कहो । तो धर्मद्रव्य के वर्णन में जब यह कहा जाए कि धर्मद्रव्य के द्वारा अवगाहित जो आकाश प्रदेश है तो वह प्रदेश अन्य है, पर धर्मद्रव्य के स्वयं के क्षेत्र में जो असंख्यात प्रदेश बताये हैं वे तो द्रव्य के ही मुख्य हैं । ऐसे ही अधर्मद्रव्य के और एक जीव द्रव्य के उसके जो प्रदेश कहे गए हैं वे मुख्य हैं । निज का द्रव्य, निज का क्षेत्र, निज का काल और निज का भाव वह तो निज द्रव्य का ही है । तो निज केवल द्रव्य का जो क्षेत्र है उस ही को असंख्यात रूप से बताया ।

मुख्य क्षेत्र विभाग होने से एक द्रव्य की निरवयवता की अनुपपत्ति की शंका व समाधान―अब इसी से संबंधित एक, शंका और हो सकती है कि यदि धर्मद्रव्य में असंख्यात प्रदेश मान लिया, अधर्म में एक जीव में असंख्यात प्रदेश मान लिया तब तो यह निरवयव न होगा याने इसके अवयव बन गए । जैसे शरीर के अवयव है, पैर हैं, हाथ हैं, पेट है, सिर है तो इसके बाद क्षेत्र में है ना यह शरीर । इतना ही बड़ा परिमाण जब धर्म, अधर्म और एक जीव का है तो वह अवयव रहित नहीं कहलाया । निरवयव नहीं बनेगा । उनमें भी अवयव बन गये । जैसे कुर्सी टेबल में अवयव हुए क्योंकि अब तो प्रदेश को मुख्य विभाग मान लिया कि उसके विभाग हैं । वह मुख्य मान लिया गया । तो फिर अब यह ही बन जाएगा । इस शंका का उत्तर यह है कि एक द्रव्य में मुख्य विभाग तो माना है, पर द्रव्यदृष्टि से नहीं माना, क्षेत्र दृष्टि से है वह बात । अवयव नाना तो तब कहलाते जब कि द्रव्य दृष्टि से यह नानापन होता । जैसे चौकी में द्रव्य नाना हैं, अनंत परमाणु हैं तो उनके अवयव बन जायेंगे । यह निचला अवयव है, यह चौड़ाई में है, यह पाया में है । यों अवयव बन जायेंगे, मगर जो एक ही द्रव्य है उस एक का अवयव कुछ नहीं हो सकता । भले ही क्षेत्र से असंख्यात प्रदेश हैं मगर वह एक है । देखिये जो अवयवी हो, जिसमें बहुत अवयव होते तो वहाँ यह बात बना करती है कि एक अवयव में कुछ घटना घटी तो अन्य अवयव में नहीं घटती । चौकी का एक हिस्सा जला तो बाकी हिस्सा नहीं जल रहा । बुझा दीजिए उतनी जल चुकी, बाकी चौकी सही है, क्योंकि यह चौकी अनेक द्रव्य है । एक द्रव्य में ही यह बात नहीं घटी । अब जैसे एक जीव है तो उसमें यह न बन पाएगा कि पैर के प्रदेशों में तो मौज माना जा रहा और हाथ के प्रदेश कष्ट मान रहे । कष्ट होगा तो समग्र भाव में होगा क्योंकि वह एक है, मौज होगा तो समग्र जीव में होगा । धर्मद्रव्य में भी जो अगुरुलघुत्वगुण की षड्गुण हानि वृद्धि से जो एक परिणमन होता है वह एक ही समग्र में है, किंतु घट पट आदिक पदार्थों में ऐसी बात नहीं बनती । इससे सिद्ध है कि स्कंध तो अवयव वाला है, पर धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य एक जीव आकाश भी प्रत्येक एक-एक द्रव्य निरवयव है ।

सूत्रगत एक शब्द की सार्थकता―यह सूत्र चल रहा धर्म, अधर्म और एक जीव के प्रदेश परिमाण का । तो इस सूत्र में एक जीव शब्द दिया । उसका तात्पर्य यह है कि एक जीव के हैं असंख्यात प्रदेश । जीव तो अनंतानंत हैं । उनके प्रदेश तो मिलने-जुलने से अनंतानंत बनेंगे फिर । फिर मिलने जुलने का क्या सवाल? प्रत्येक जीव का सत्त्व अलग-अलग है, और उनमें से एक जीव के असंख्यात प्रदेश हैं । इसी कारण इस सूत्र में एक जीव शब्द दिया है । जैसे धर्म द्रव्य एक है, दो या अनेक हैं ही नहीं तो वहाँ एक शब्द देने की जरूरत नहीं पड़ती । अधर्मद्रव्य भी एक है, अनेक नहीं है, इस कारण अधर्म के साथ ही एक शब्द बोलने की आवश्यकता नहीं हुई । किंतु जीव हैं अनंतानंत । परंतु एक-एक जीव में यह असंख्यात प्रदेशी है, यह बताने के लिए इस जीव के एक शब्द दिया है । जीव कितने होते हैं? देखिये―मनुष्यों की संख्या चारों गतियों में सबसे कम है । और मनुष्यों से असंख्यात गुने नरक गति के जीव हैं और नारकियों से असंख्यातगुने देवगति के जीव हैं । देवगति के जीवों से असंख्यातगुने त्रस जीव हैं । जितने अभी बताये ये तो आ ही गए और दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रिय और पंचेंद्रिय तिर्यंच ये भी मिल गये तो ये सभी त्रस जीव कहलाते हैं, और इन त्रस जीवों से असंख्यातगुने निगोद को छोड़कर बाकी के सब स्थावर जीव हैं । पृथ्वीकाय जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय और प्रत्येक वनस्पतिकाय और जितने जीव अभी बताये हैं स्थावर तक के उन सबसे अनंत गुने सिद्ध भगवान हैं, और सिद्ध भगवान से अनंत गुने निगोदिया जीव हैं । अब जीवों की संख्या जान लो इन अनंतानंत जीवों में से एक-एक प्रत्येक जीव के असंख्यात प्रदेश होते हैं ।

सूत्र में असंख्येया: प्रदेशा: इन दो पदों को समास न करके अलग अलग प्रयुक्त करने का प्रयोजन―सूत्र में तीन पद दिये हैं, असंख्येया: प्रदेश: धर्माधर्मैक जीवानां यह जो संबंध विवक्षा की है, इसके प्रदेश असंख्यात हैं । तो प्रदेश तो पदार्थ से जुदे नहीं हैं, मगर कथंचित् भेद पूर्वक कहे बिना समझ ही न आयेगी और उसी के वास्ते यहाँ संबंध का निर्देश किया है । इसके प्रदेश होते हैं समझने के लिये । एक जो संपूर्ण द्रव्य हे वह तो द्रव्य है और एक क्षेत्र की दृष्टि से परमाणु में देखें तो वहाँ यह प्रदेश है । तो कथंचित् प्रदेश के भेद का परिचय बन रहा है अन्यथा समझाने का व्यवहार भी खतम हो जायेगा । इसी तरह यहाँ संबंध का निर्देश किया, अन्यथा सूत्र यों बना सकते थे असंख्येयप्रदेशा: धर्माधर्मैक जीवानां या असंख्येयप्रदेशा: धर्माधर्मैकजीवा: एक दो अक्षर कम हो गये । और सूत्र में जितने अक्षर कम हों उतना ही महत्त्व माना जाता है । पर ऐसा क्यों न किया गया? संबंध बुद्धि की और असंख्येय प्रदेश इनको भिन्न-भिन्न पदों में रखा, इसका एक कारण यह भी है कि यदि इस सूत्र में असंख्येया: प्रदेशा:, यों अलग-अलग न बोलते तो आगे जितने सूत्र बताये जाते प्रदेश बताने के लिये सभी सूत्रों में प्रदेश शब्द देना पड़ता । असंख्यात प्रदेशी तो ये हैं तो अनंत प्रदेशी आकाश है और संख्यात असंख्यात, अनंतप्रदेशी पुद्गल हैं, यों बोलना पड़ता, तो यहाँ ही एक शब्द की ही तो बात है । इतना लाघव न किया तो उसका लाभ यह हुआ कि आगे जितने सूत्र कहे जायेंगे सबमें लाघव बन जायेगा । लाघव कहते हैं छोटे सूत्र को, सब छोटे सूत्र बन जायेंगे । इसलिये यहाँ कर्मधारय समास न करके भिन्न-भिन्न पदों में यह बात रखी गई ।

बालक को उपचार से सिंह बताने की तरह निरवयव एक द्रव्य को उपचार से ही बहुप्रदेशी कहे जाने की आरेका―अब पुन: एक शंका बनती है कि जब इतना वर्णन चल रहा है जीव के बारे में और इसका प्रमाण जाना जा रहा है तिस पर भी आपने बताया कि यह निरवयव है―यह एक-एक द्रव्य, इसमें विभाग नहीं हैं, टुकड़े नहीं हैं । आधा पाना नीचा-ऊँचा ये कोई विभाग नहीं है । निरवयव हैं, तब तो प्रदेश कल्पना बिल्कुल उपचार की है, वास्तविक नहीं है । समझाने के लिये प्रदेश की कल्पना है कि लोग समझ जाएं कि यह एक द्रव्य इतना बड़ा है । वास्तव में प्रदेश तो परमाणु में हैं । स्कंधों में खूब समझ में आ रहा । बाकी जो सबमें बहुत प्रदेश बताये जाते हैं वह तो एक उपचार की बात है, अंदाज की बात है । कैसे कि वास्तव में द्रव्य है पुद्गल और पुद्गल की तरह समझा गया इसको तो यह उपचार है । जैसे किसी बच्चे को कहते हैं कि यह तो सिंह है तो यह बात सचमुच है या उपचार की बात है? अगर सचमुच है तो बस घर खतम हो जाएगा । फिर तो कोई न बचेगा । वह बच्चा सबको खा जाएगा । और उपचार की बात है तो यही अपनी बात आयी कि वास्तव में सिंह तो कुछ और है और उसकी तरह इस बच्चे को बता रहे, तो ऐसे ही यहाँ यह बात नजर आती है कि प्रदेश तो वास्तव में पुद्गल में ही होते हैं, मगर उसकी तरह इसे समझाया जाता है । जैसी शूरवीरता, क्रूरता, तेज सिंह में है वैसे ही लक्षण उस बच्चे में नजर से आये तो जैसे वहाँ सिंह का उपचार कर दिया ऐसा ही उपचार इस एकद्रव्य के प्रदेश भेद मानने में है ।

उक्त शंका के समाधान में सोपपदता होने से धर्म अधर्म आकाश पुद्गल जीव सभी में स्वतंत्र मुख्य प्रदेशों का औचित्य―उक्त शंका का यह उत्तर है कि एक द्रव्य के प्रदेश के लिये सिंह बालक का दृष्टांत उचित नहीं बैठता, क्योंकि वहाँ तो यह बात है कि दो को एक विशेष्य विशेषण की तरह रखा जा रहा है । बालक सिंह है इस एक जीव के प्रदेशों का पुद्गल के साथ एक समान रूप से वर्णन नहीं है, किंतु वहाँ पर स्वतंत्र-स्वतंत्र बात है । पुद्गल के इतने प्रदेश हैं, धर्मद्रव्य के इतने हैं । सबमें स्वतंत्र-स्वतंत्र बात कही गई, यह तो उपपद सहित है जैसे घट के प्रदेश ऐसे ही धर्मद्रव्य के प्रदेश । बालक सिंह इस तरह पुद्गल धर्म यह कुछ उपचार नहीं बन गया, सबमें स्वाधीन प्रदेश हैं । प्रत्येक पदार्थ अपने आपके क्षेत्र में है, अपने आपके भाव में है, किसी अन्य के क्षेत्र में नहीं है और इस दृष्टि से यह भी वास्तविक बात नहीं है कि हम आप सब आकाश में रह रहे । हम आकाश में रहते हैं यह बात तो तब कही जायेगी कि पहले तो हम आकाश से अलग धरे हों, और फिर उठाकर आकाश में धरे गये हों:, तब यह कहना ठीक था किं हम आकाश में हैं । भले ही हम छोटे हैं और आकाश बड़ा है, फिर भी आकाश आकाश में है, हम हम में हैं । सभी एक जगह रह रहे हैं वह बात है मगर आधार आधेय तो तब समझा जाता है कि जब पहले आधार से अलग हों, फिर आधार में रखे हों । जैसे बोरे में चने भर दिये, ये चने बोरे में हैं यह बात ठीक है । चने पहले बोरे से अलग रखे, फिर उन्हें बोरे में रख दिया, पर ऐसा हम आप लोगों के लिए किसी भी द्रव्य के लिए नहीं है कि वह द्रव्य पहले आकाश में न था फिर किस तरह यह आकाश में आ गया? अनादि से समस्त द्रव्य हैं, अपने-अपने स्वरूप में हैं, अपने-अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव में हैं, इसलिये एक को दूसरे का आधार नहीं बताया जा सकता ।

अत्यंत परोक्ष होने से धर्म द्रव्य आदि अमूर्त द्रव्यों में प्रदेशों का संव्यवहार प्रत्यक्ष न होने पर भी प्रदेशों की मुख्यता―यहां एक जिज्ञासा होती है कि जैसे घट की बात बिल्कुल स्पष्ट है, चौकी की बात बिल्कुल साफ है कि इस चौकी में इतने अवयव हैं, इतने अंश हैं, ऐसे धर्म या अधर्म, या एक जीव में तो विदित नहीं होता । तो स्वत: कोई अवधारण नहीं हो रहा । कोई यहाँ स्पष्ट बात नहीं चल रही । कैसे मानें कि धर्मादिक में प्रदेश होते हैं सो खुद ही को प्रकट होगा । अभी यहाँ यह बताते कि जितना आकाश का हिस्सा एक परमाणु रोके उतने को प्रदेश कहते हैं, और ऐसे-ऐसे प्रदेश धर्म में असंख्यात हैं तो यह तो दूसरे के द्वारा कथन बना । अगर इसमें खुद प्रदेश होते तो अपने आप ही कथन बनना चाहिये था । इस कारण से उतने प्रदेश मुख्य नहीं कहे जा सकते । उत्तर यह है इनका कि भाई धर्मादिक द्रव्य अमूर्त हैं, ये आंखों से देखे नहीं जा सकते, इसलिये परोक्ष हैं, तो इनको कैसे कहा जाए, कैसे निरखा आए? घट आदिक तो प्रत्यक्ष हो रहे । चौकी टेबल वगैरह साफ दिख रहे हैं, इसमें तो प्रदेश बताये जा सकते हैं, पर धर्मादिक तो सब अत्यंत परोक्ष हैं । सो उनमें प्रदेश मुख्य होने पर भी अपने आप में कहीं इंद्रिय आदिक के द्वारा निश्चय नहीं कराया जा सकता । उन्हें तो युक्ति से समझना होगा ।

आगम प्रामाण्य से एक द्रव्य के बहुप्रदेशित्व का अवगम―आगम से भी धर्मादिक द्रव्यों का बहुप्रदेशित्व जानना होगा । अरहंत भगवान के आगम की प्रमाणता से यह ही बात सिद्ध होती है । भगवान कौन? जो समस्त पदार्थों को स्पष्ट जाने ऐसे ज्ञान का अतिशय जहाँ प्रकट हो उसे कहते हैं सर्वज्ञ । उनके द्वारा कहा गया आगम जिसको गणधरों ने सुनकर उसकी द्वादशांग रचना की और उनके शिष्य उनकी बुद्धि के प्रसार से परंपरा से आज आगम पाया जा रहा है । उसमें उपदेश किया । धर्मादिक के क्षेत्र बताना मुख्य ही है, ऐसा जानना चाहिये । दूसरी बात एक जीव के बारे में स्थित प्रदेश और अवस्थित प्रदेश का आगम में वर्णन है । जीव असंख्यात प्रदेशी है । जैसे आज इस शरीर में है, तो इस शरीर प्रमाण जीव है । तो इतना विस्तार तो बना । मगर एक-एक प्रदेश करके विस्तार देखा जाये तो असंख्यात प्रदेश हैं । और जब यह लोक भर में फैलता तब भी असंख्यात है । आकाश प्रदेश की अपेक्षा से तो ये अनेक प्रकार के असंख्यात बन गये, जो जीव के द्वारा क्षेत्र प्रदेश रोके गये और स्वक्षेत्र की दृष्टि से सभी जीवों में एक समान नियत असंख्यात प्रदेश होते हैं । संकोच विस्तार के कारण छोटे बड़े का प्रमाण नजर आता है ।

स्थित और अस्थित आत्म प्रदेशों के निरूपण से एक जीव के बहुप्रदेशित्व की सिद्धि―आत्मप्रदेशों को बताया गया है स्थित और अस्थित । जीव के मध्य के 8 प्रदेश इनमें योग नहीं होता, ये चंचल नहीं होते, यहाँ परिस्पंद नहीं होता, ये सर्वदा स्थित रहते हैं । और इसके अतिरिक्त भगवान अयोग केवली 14वें गुणस्थान में तो उनके सारे प्रदेश सिद्ध होते हैं और सिद्ध भगवान के सब प्रदेश स्थित हैं वहाँ हलन-डुलन नहीं, परिस्पंद नहीं । यहाँ हम आप संसारी जीवों के प्रदेशों उन 8 प्रदेशों के अतिरिक्त बाकी प्रदेश चंचल हैं, उनमें परिस्पंद है, व्यायाम किया किसी ने तो प्रदेश का बहुत परिस्पंद है । दुःख संताप आया तो बड़ा परिस्पंद, पर उन 8 प्रदेशों को छोड़कर शेष प्रदेशों में यह परिस्पंद है और वह अवस्थित है । तो शेष अन्य प्राणियों के कभी स्थित है कभी अस्थित । तो ऐसा जो विशेष रूप से निरूपण है उससे ही सिद्ध हुआ कि जीव में असंख्यात प्रदेश मुख्य ही हैं । इस तरह यहाँ यह बतलाया गया कि धर्म द्रव्य में असंख्यात प्रदेश, अधर्मद्रव्य में असंख्यात और जीव द्रव्य में असंख्यात प्रदेश हैं । दुनिया में क्या-क्या है, उनकी विशेष विवरण के साथ जब जानकारी होती है तो स्वपर का भेद विज्ञान बड़ा दृढ़ होता है कि यह तो सब पर है और यह मैं स्वयं ज्ञानस्वरूप स्व हूँ । स्वपर भेद विज्ञान से ही आत्मकल्याण होता है । इस पंचम अध्याय के प्रथम सूत्र में धर्म, अधर्म, आकाश और पुद्गल ये चार पदार्थ बताये गये थे―इसके आगे जीव को भी अस्तिकाय कहा है । इन 5 अस्तिकायों में किसके कितने प्रदेश हैं यह प्रकरण चल रहा है । तो धर्म, अधर्म एक जीवद्रव्य इनके प्रदेश कितने हैं वह वर्णन हो चुका । अब आकाश द्रव्य के कितने प्रदेश हैं, यह वर्णन करते हैं।


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