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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 6-3

From जैनकोष



शुभ: पुण्यस्या शुभ: पापस्प ।। 6-3 ।।

(10) शुभयोग और अशुभयोग का स्वरूप, विश्लेषण एवं कार्य―शुभयोग पुण्य का आस्रव करता है और अल्पयोग पाप का आस्रव करता है । शुभयोग क्या होता हैं ? उत्तर―शुभपरिणामपूर्वक होने वाला योग शुभयोग कहलाता है । शुभयोग भी तीन प्रकारके हैं―(1) शुभकाययोग, (2) शुभ वचनयोग, (3) शुभ मनोयोग । और अशुभयोग भी तीनों ही प्रकार के हैं―(1) अशुभ काययोग, (2) अशुभ वचनयोग और (3) अशुभभनोयोग ।
शरीर से खोटी चेष्टायें होने को अशुभकाययोग कहते हैं । जैसे कोई जीवहिंसा की प्रवृत्ति करता है, चोरी, मैथुन आदिक प्रवृत्तियां करता है तो यह अशुभ काययोग है । कोई पुरुष झूठ बोलता है, कठोर वचन कहता है तो वह अशुभ वचनयोग है । कोई पुरुष विचार गंदे रखता है, किसी को मारने का विचार, किसी से ईर्ष्या करने का विचार, किसी से मात्सर्य रखने का विचार, तो वह अशुभ मनोयोग कहलाता है, ऐसे ही अशुभयोग अनंत प्रकार के होते हैं―अब शुभयोग सुनो―जीवदया, हिंसा से निवृत्ति का परिणाम, अचौर्यभाव, व्रह्मचर्यभाव ये सब शुभकाय
योग हैं । सच हितकारी परिमित बोलना शुमवचनयोग है । वीतराग प्रभुकी भक्ति, तपश्चरण की प्रीति, श्रुतशास्त्र का विनय आदिक विचार शुभमनोयोग कहलाते हैं । ये सब अव्ययसाय कहलाते हैं । अध्यवसाय के स्थान यद्यपि असंख्यात लोक प्रमाण है फिर भी अनंतानंत पुद्गलसे बंधे हुए जो कर्म हैं ज्ञानावरणादिक उनके क्षयोपशम के भेद से वे तीनों योग अनंत प्रकार के हो जाते हैं, क्योंकि जितना उनमें क्षयोपशम उदय आदिक पड़े हैं उतने ही
अननानंत प्रदेश वाले कर्मों का ग्रहण होता है और फिर जीव अनंतानंत हैं, उस दृष्टि से तीनों योग अनंत प्रकार के हो जाते है ।

(11) शुभयोग से विषय स्वरूप के विषय में चर्चा―यहां एक बात विशेष जानना कि जो शुभ अशुभ योग में शुभ अशुभपना है वह इस कारण से नहीं है कि जो शुभकर्म का कारणभूत योग हो वह अशुभयोग कहलाये, क्योंकि शुभयोग होने पर भी ज्ञानावरणादिक अशुभ कर्मों का बंध चलता रहता है । फिर शुभ अशुभपना किस प्रकार है? जिसमें सातावेदनीय आदिक पुण्य प्रकृतियों का विशेद आस्रव हो उसका निमित्तभूत योग शुभ है, पाप प्रकृतियों के आस्रव का निमित्तभूत योग अशुभ है । अथवा यहाँ यह अवधारण करना कि शुभ योग ही पुण्य का आस्रव करता है, इससे यह सिद्ध होगा कि कुछ शुभयोग होने पर भी पाप का आस्रव होता रहता है ।

(12) पाप और पुण्य के विषय में स्वरूप निरुक्ति, विश्लेषण आदिकी चर्चा―पुण्य शब्द की निरुक्ति है ‘पुनाति आत्मानं अथवा पूयते अनेन' इति पुण्यं जब कर्तुसाधन की विवक्षा हो तो उस स्वतंत्रता को विवक्षा में तो यह निरुक्ति हैं कि जो आत्मा की प्रीति उत्पन्न कराये, हर्ष उत्पन्न कराये वह पुण्य है और जब करणसाधन की विवक्षा हो, जिसकी रीति परतंत्रता की विधि का प्रयोग है तो वहां अर्थ होता है कि हर्षरूप होता है जिसके द्वारा वह पुण्य कहलाता है । वे पुण्य प्रकृतियां क्या हैं सो स्वयं इस ग्रंथ में आगे कहा जायेगा कि साता वेदनीय आदिक पुण्य प्रकृतियां हैं । पाप पुण्य का प्रतिपक्षी है और पाप शब्द की निरुक्ति इस प्रकार है 'यातिरक्षति आत्मानं शुभपरिणामात् इति पापं,' धातु के अर्थ की दृष्टि से अर्थ होता है कि जो आत्मा को शुभ परिणाम से बचाये उसे पाप कहते हैं अर्थात् शुभ परिणाम न होने दे, खोटे परिणाम रहें वह पाप है । पाप कर्म असातावेदनीय आदिक हैं सो आगे के अध्यायों में कहेंगे । यहाँ शंकाकार कहता है कि जैसे बेड़ी चाहे सोने की हो अथवा लोहे की हो, उस बेड़ी के प्रयोग से परतंत्रता होना यह इससे समान ही पाया जाता है तो फल तो बराबर ही रहा । पुण्य भी परतंत्रता का कारण रहा, पाप भी परतंत्रता का कारण रहा, क्योंकि पुण्यफल में भी संसार में ही रहना पड़ता, पाप के फल में भी संसार में रहना पड़ता, तो समान ही निमित्त बना रहा केवल कल्पना का भेद करना अच्छा नहीं । वास्तविकता पर ध्यान दें तो दोनों का निमित्तभूत जो योग है वह एक समान है । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि हां एक दृष्टि से ऐसा ठीक है मगर इष्ट और अनिष्ट का निमित्त होने से उन दोनों में भेद है । पुण्यकर्म तो इष्टगति जाति शरीर इंद्रियविषय आदिक का निर्माण करने वाला है और पापकर्म अनिष्ट गति जाति शरीर आदिक सभी अनिष्ट विषयों का रचने वाला है । यह उनमें भेद है, सो जो शुभ योग है वह तो पुण्य का आस्रव करता है और जो अशुभ योग है वह पाप का आस्रव करता है ।

(13) शुभ अशुभ योग व पुण्य पाप के सामर्थ्यों का संदर्शन―यहां शंकाकार कहता है कि जब शुभ परिणाम होते संते घातिया कर्मोंका बंध होता ही रहता है, तो यह विभाग करना गलत रहा कि शुभ परिणाम पुण्य के आस्रव का कारण है, लो शुभ परिणाम तो पाप का भी आस्रव कराता है । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि यह पुण्य पाप की जो चर्चा है वह अघातिया कर्म की दृष्टि से समझना । अघातिया कर्मों में जो पुण्य है उनमें आस्रव का कारण अशुभयोग है अथवा शुभयोग पुण्य का ही कारण है, यह निश्चय नहीं कर रहे, किंतु यह निश्चय करना कि शुभयोग ही पुण्य का कारण है, इससे यह भी बात आ गयी कि शुभयोग होते हुए भी घातिया कर्मों का, पाप कर्मों का आस्रव हो सकता है । शंकाकार पुन: कहता है कि यदि शुभ पाप का और अशुभ पुण्य का भी कारण होता है तो जो आगममें बताया है कि सब कर्मों का उत्कृष्ट स्थितिबंध उत्कृष्ट संक्लेश से बताया गया है और जघन्य स्थिति बंध मंद संक्लेश से बताया गया है । तो ये दोनों ही बातें जो आगम में कही है वे निरर्थक हो जायेंगी । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि इन दोनों सूत्रों का अर्थ यों देखें कि तीव्र सक्लेश से उत्कृष्ट स्थितिबंध और मंद संक्लेश से जघन्य स्थितिबंध जो बताया है सो अनुभाग बंध की अपेक्षा जानना, क्योंकि फल में मुख्य निमित्त अनुभाग बंध होता है । कितने ही कर्मपरमाणु बँध जायें और कितनी ही स्थिति बंध जायें, यदि उनमें अनुभाग विशेष नहीं है तो वह फल विशेष नहीं दे सकता । तो चारों प्रकारके बंधोंमें अनुभाग बंध बड़ा प्रबल बंध है । सो यह अर्थ लेना कि समस्त शुभ प्रकृतियों का उत्कृष्ट अनुभाग बंध उत्कृष्ट विशुद्ध परिणाम से होता है और समस्त अशुभ प्रकृतियों का उत्कृष्ट अनुभाग बंध तीव्र संक्लेश परिणाम से होता है और स्पष्ट बात फिर यह है कि जैसे लोक में कोई पुरुष बहुत तो उपकार करता है और कदाचित् थोड़ा अपकार भी कर दे तो लोग उसको उपकारक ही मानते हैं, ऐसे ही शुभयोग होने पर कुछ पापकर्म का बंध भी हो जाये तो चूंकि अधिक पुण्य का ही बंध है इस कारण उसे पुण्यबंध का ही कारण कहा जाता है । अब यहाँ एक जिज्ञासा होती है कि क्या ये आस्रव समस्त संसारी जीवों के समान फल देने के हेतुभूत हैं या कुछ विशेषता है? इसके समाधान में सूत्र कहते हैं―


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