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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 6-7

From जैनकोष



अधिकरणंजीवाजीवाः ।।6-7।।

(29) जीव और अजीव आस्रव का आधाररूप―जीव और अजीव आस्रव के अधिकरण हैं । यद्यपि जीव और अजीव की व्याख्या हो चुकी, फिर भी उनको आस्रव के आधार रूपसे बताते हैं, इस कारण पुन: उनके अधिकरण के रूपसे वर्णन किया जा रहा है । जैसे हिंसा आदिक के उपकरण रूप से जीव आधार है, अजीव भी आधार है, यहां अधिकरणास्रव के दो भेद कहे हैं―(1) जीवाधिकरण और (2) अजीवाधिकरण । इसका आगे ब्योरा आयेगा उससे यह स्पष्ट हो जायेगा, पर यहां सामान्य रूप से इतना जानना कि चूंकि अनंत पर्याय वाले जीव और अजीव अधिकरण बनते हैं सो इसकी सूचना देने के लिए सूत्र में जीवाजीव: यह बहुवचन कहा गया है । अर्थ है कि जीव और अजीव आस्रव के अधिकरण होते है । यहाँ एक शंका होती है कि इन शब्दों को एक साथ मिला दिया जाना चाहिए । जीवाजीवाधिकरणं इतना ही सूत्र बनाना चाहिए । सूत्र भी छोटा हो गया और अर्थ भी निकल जायेगा इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि यह सुझाव ठीक नहीं है, क्योंकि यहां समास बन जाता है और यह समास कर्मधारय और तत्पुरुष इन दो रूपों में बनता है, जिससे अर्थ यह होता है कि अजीव ही अधिकरण हैं, और तत्पुरुष समास का यह अर्थ होता है कि जीव और अजीव का अधिकरण है । सो यहां जो सूत्र का अभिप्रेत अर्थ है वह इन दोनों समासों में भी नहीं निकलता । जब कर्मधारय समास किया अर्थात समानाधिकरण वाला समास किया तो वहाँ केवल जीव अजीव से विशिष्ट अधिकरण मात्र का ज्ञान होता । वहां आस्रव विशेष का ज्ञान न हो सका इस कारण यह समास ठीक नहीं है । दूसरा भिन्नाधिकरण्य वाला समास है तत्पुरुष समास, तो उस समास में एक जीव अजीव का आधार मात्र ही ज्ञात हो सका, इससे भी यह नहीं जाना जा सका कि आस्रव विशेष जीव और अजीव के आधार से होता है । जीव पाप करता है, कराता है, मन से सोचता है आदिक जो पाप करते, आस्रव होते वे जीव के आधार में हो रहे और तभी कोई तलवार बनाने वाला पुरुष तलवार बनाते हुए उसकी धार को निरखता है तो उसके मन में भाव जगता है कि यह तलवार अब खूब काम करेगी, पशु घात के लायक बन गई, तो उस अजीव पदार्थ तलवार के बनाने के प्रसंग में उसे पाप और आस्रव हो रहे हैं, यह सब रहस्य इन समासों में नहीं प्रकट होता है, और फिर जीव और अजीव का आधार अन्य कोई नहीं विदित होता । जीव स्वयं तो आपमें है । अजीव पदार्थ वह अपने आपमें है, तो ये दोनों ही समास ठीक नहीं बैठते इस कारण सूत्र में जो भिन्न-भिन्न निर्देश करके पाठ दिए गए हैं वे पाठ सही हैं, और उससे क्या ध्वनित होता है कि जीव और अजीव आधार है, तो प्रश्न होता है कि किसके आधार है? तो उत्तर होता है कि आस्रव के आधार है । यहां एक बात और समझ लेना है कि आस्रव शब्द इस सूत्र में तो कहा नहीं गया, उसकी अनवृत्ति लेनी पड़ेगी तो इससे पहले के जो सूत्र हैं, जिसके प्रकरण में यह सब विवरण चल रहा है वह है आस्रव । उसका सर्वप्रथम प्रयोग दूसरे सूत्र में किया गया हैं । स आस्रव:, सो यहां आस्रव शब्द प्रथमाविभक्ति के एक वचन में है । पर इस प्रकरण में उसकी अनवृत्ति करने पर भी विभक्ति बदल जायेगी । षष्ठी का एक वचन यहाँ प्रयुक्त होगा । तब अर्थ हुआ कि जीव और अजीव आस्रव के कारण है अर्थात् आस्रव इसके आधार में होता है । अब जिज्ञासा होती है कि क्या इतने ही दो भेद हैं या इसके और भी भेद हो सकते हैं? तो उसके समाधान में जानना कि इसके और भी भेद हैं जिसमें प्रथम है जीवाधिकरण्यास्रव जो कि सांपरायिक आस्रव का विशेषण है, सो उस जीवाधिकरण्य के भेद कहते हैं ।


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