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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 7-13

From जैनकोष



प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हिंसा ।।7-13।।

(141) प्रमतयोग से प्राणव्यपरोपण की हिंसारूपता―कषाय सहित योग से प्राण का घात हो जाना हिंसा कहलाती है । प्रमत्तभाव किसका नाम है? इंद्रिय के प्रचार विशेष को न निरखकर जो परिणति होती है वह प्रमत्तभाव है । जिसमें विषयों को प्रीति है, लगाव है, स्वार्थ है, कषायभाव है ऐसा लौकिक प्रयोजन जहाँ बसा हुआ है, खुदगर्जी है ऐसे खोटे परिणामों के साथ जो प्राण विपरोहण होता है अर्थात् प्राणों का घात होता है उसका नाम हिंसा है अथवा यही प्रमत्त शब्द में यह लगाकर अर्थ करना । प्रमत्त की तरह योग से प्राण का घात करना हिंसा है । किस तरह कि जैसे मद्य पीने कला पुरुष जब उसका मदायलापन बढ़ जाता है तो यह कर्तव्य है, यह नहीं है कर्तव्य, यह बोलना चाहिए, यह न बोलना चाहिए इस विचार से वह हट जाता है । उसे कहते हैं प्रमत्त । तो ऐसे ही जिसको जीवस्थानों का पता नहीं, योनियों का पता नहीं, जीव कहां पैदा होते हैं, किस प्रकार के होते हैं, किन-किन आश्रयों में रहा करते हैं इसे जो नहीं जानता और कषाय का है उसके उदय, विषयों में है उसकी लगन, खुदगर्जी में वह बस रहा है तो हिंसा के कारणों में लग जाता है जिससे कि प्राणों का घात होता है । तो वह अहिंसा में प्रवृत्ति नहीं कर पाता, उसी का नाम प्रमत्त है, याने अज्ञानी और कषायवान जीव को प्रमत्त कहते हैं ।

(142) प्रमादविशेषों का वर्णन―प्रमाद 15 प्रकार के कहे गए हैं । उन भावों से जो च्युत हो उसे प्रमत्त कहते हैं । वे 15 प्रमाद कौन से हैं ? चार विकथायें―1-स्त्रीकथा, 2-राजकथा, 3-देशकथा और 4-भोजनकथा । स्त्रीविषयक चर्चा कहनी कहना सुनना यह स्त्रीकथा का प्रमाद है, क्योंकि स्त्रीविषयक कैसी भी चर्चा करने से थोड़ा राग का भाव आता है और उससे प्रमाद होता है, कषाय बढ़ती है । राजकथा―राजा की कथा करना, अमुक राजा ऐसा है अमुक ऐसा है, अरे क्या प्रयोजन पड़ा है राजाओं की चर्चा करने का? बल्कि उससे तो लौकिकता में गति बढ़ जाती है । देशकथा―देशों की कथा करना, अमुक देश में यह है अमुक यों है, यों देशों की बात करना देशकथा है । ये सब करना चाहिए या नहीं, इसके तो उत्तर लोगों के चित्त में भिन्न-भिन्न गुणों के अनुसार अनेक होंगे, किंतु मोक्षमार्ग में जहाँ संसार से छुटकारा पाकर मुक्ति पाने का पौरुष सोचा है । वहां तो किसी भी प्रकार के कषाय पर का लगाव रखना कर्तव्य नहीं है । तो ये सब प्रमाद करना योग्य नहीं है, भोजनकथा―इस प्रकार का भोजन बना, उसका स्वाद अच्छा है आदिक भोजन की कथा करना, मैंने अच्छा खाया, कल यों खाऊँगा, यह चीज बनाऊँगा, तो इस भोजनकथा में प्रमाद होता है, कषाय जगती है । भोजन किया जाता है शरीर की स्थिति रखने के लिए । इतना ही यदि भाव है तो भोजन करते हुए भी वह भोजन नहीं कर रहा । घाटी नीचे माटी । उस स्वाद का क्या उठता है? बल्कि स्वाद के वश होकर अपथ्य भोजन हो जाता है । तो भोजनकथा प्रमाद है । चार कषाय प्रमाद हैं―1-क्रोध, 2-मान, 2-माया, 4-लोभ । ये जीव के स्वभाव नही हैं, यह कर्म के उदय की झांकी है । और कर्मछाया जो कि इस जीव की भूमिका पर पड़ी है यह उसमें व्यामुग्ध हो जाता है और कषाय से भिन्न अपने को नहीं समझ पाता । कषाय प्रमाद है । 5 इंद्रिय के विषय―स्पर्शनइंद्रिय के विषय में अनुरागी होना, किसी का कोमल शरीर छूने का भाव होना, रसना के विषय को भोगने का भाव होना, घ्राण, चक्षु, कर्ण विषय के भोगने के भाव, यह इंद्रिय के वश होना है और निद्रा स्नेह ये दो प्रमाद और हैं, नींद आना आलस्य आना यह प्रमाद है और स्नेह जगना यह प्रमाद है । तो इन 15 प्रकार के प्रमादों में जो परिणमता है उसे प्रमत्त कहते हैं । योग शब्द यहाँ संबंध के अर्थ में आया है प्रमत्त के योग से ।

(143) प्रमादभाव में प्रमत्तता व प्राणव्यपरोपण में प्राणी का घात―यहां शंकाकार कहता है कि यदि प्रमत्तभाव के संबंध से यह अर्थ इस पद का है तो प्रमत्त शब्द में त्व प्रत्यय और लगाना चाहिए प्रमत्तपने के योग से, क्योंकि द्रव्यप्रधान शब्द रखने पर समय की प्रतीति नहीं होती । जैसे कषाय भाव के संबंध से यह तो युक्त हो जाता कि यह अमुक कार्य किया जा रहा है पर कषायी के संयोग से इसका कुछ संबंध नहीं बैठता । तो यहाँ प्रमत्त शब्द में त्व प्रत्यय और लगना चाहिए । इस शंका के उतर में कहते हैं कि यहाँ प्रमत्त शब्द आया तो है द्रव्यप्रधान, पर आत्मा के परिणाम के लिए ही यह प्रमत्त शब्द दिया है । कर्तृसाधन में बना हुआ प्रमत्त शब्द आत्मा के परिणाम में ही दिखाया गया है । जिसने प्रमाद किया है वह परिणाम उसके योग से प्राणों का घात होना हिंसा है अथवा यहाँ योग शब्द का अर्थ लीजिए काययोग, वचनयोग, मनोयोग । काय, वचन, मन की क्रिया से । तब इस पद का अर्थ होगा कि प्रमत्त जीव के काय, वचन, मन की क्रिया से प्राणों का घात होना हिंसा है । यहाँ व्यपरोपण शब्द दिया है, जिसका अर्थ है वियोग करना । प्राण 10 प्रकार के बताये गए हैं―5 इंद्रियप्राण, 3 बल, 1 श्वासोच्छ्वास और 1 आयु । इन प्राणों का वियोग करना सो व्यपरोपण कहलाता है । प्राणों का वियोग करने से हिंसा प्राणी की होती है, क्योंकि प्राणी तो निरवयव है, उसका क्या वियोग है? वह तो पूर्ण है । प्राण का वियोग होता है । जैसे आयु का विच्छेद, श्वास का विच्छेद । इंद्रिय को हटा देना । प्राण का वियोग होने से आत्मा को ही तो दुःख होता है, इस कारण प्राण का वियोग कर देना हिंसा है और अधर्म है क्योंकि प्राण आत्मा से सर्वथा जुदे नहीं हैं ।

(144) आत्मा की प्राणों से भिन्नता व अभिन्नता की मीमांसा―एक नय में आत्मा से प्राण जुदे दिखते हैं पर वह है निश्चयनय, स्वरूपदृष्टि । प्रत्येक पदार्थ का स्वरूपास्तित्व उसका उसमें ही हुआ करता है, इस दृष्टि से शरीर की बातें भिन्न हैं, आत्मा भिन्न है, किंतु इस समय सर्वथा भिन्न नहीं है । उनका संबंध है, उनका बंधन है और वहाँ प्राणों का घात होने पर आत्मा को कष्ट होता है । तो इस कारण प्राण का घात होने से दुःख है और हिंसा है और वही अधर्म है । प्राण आत्मा से भिन्न चीज है, इसको भी मना नहीं किया जा सकता । स्वरूपदृष्टि से देखें तो भिन्न है । पर यह शंका न रखना कि जब प्राण भिन्न हैं आत्मा से तो उनका वियोग करने पर आत्मा को दु:ख न होना चाहिए । यह शंका यों न रखना कि जब अत्यंत भिन्न पुत्र, स्त्री मित्रादिक के वियोग में आत्मा को कष्ट होता है फिर प्राण तो कथंचित् भिन्न हैं, सर्वथा भिन्न नहीं, तो उनके वियोग में कष्ट तो होता ही है जीवों को । यद्यपि शरीर जुदा है, शरीर में रहने वाले जीव जुदे हैं, शरीर जड़ है, आत्मा चेतन है, सो लक्षण के भेद से अत्यंत जुदी बात है, लेकिन दोनों का इस तरह का बंध है कि इस हालत में तो एकत्व बन रहा है । शरीर के वियोग से होने वाला दुःख आत्मा को ही होता है, इस कारण प्राण का वियोग करना हिंसा है, अधर्म है । जो लोग आत्मा को निष्क्रिय मानते हैं, नित्य शुद्ध मानते हैं, सर्वव्यापी मानते है उनके यहाँ शरीर से बंधन नहीं हो सकता, क्योंकि वहाँ आत्मा सर्वव्यापक माना है । शरीर तो थोड़े देश में है और जब शरीर से बंध न बन सका केवल उनकी कल्पना में तो दुःख भी न होगा, हिंसा भी न होगी, पाप भी न लगा । तो पाप से छूटने का उद्यम भी क्यों करना? फिर व्रत, तप आदिक भी न करने होंगे । तो धर्म कर्म का कुछ भी संबंध न रहा जो आत्मा को निष्क्रिय नित्य शुद्ध मानते हैं ।

(145) प्रमत्तयोग और प्राणव्यपरोपण का संबंध―इस सूत्र में दो बातें कही गई हैं―1-प्रमत योग और 2-प्राण व्यपरोपण । ये दोनों विशेषण इस बात को सूचित करते हैं कि दोनों के होने पर हिंसा होती है । इनमें से एक अगर नहीं है तो हिंसा नहीं होती । जैसे प्रमत्त योग न हो, सिर्फ प्राण विपरोपण हो तो वह हिंसा न कही जायेगी । जैसे मुनि महाराज शुद्धभाव से ईर्या समितिपूर्वक गमन कर रहे हैं और कदाचित् कोई छोटा प्राणी, कुंथु जीव पैर धरने के समय पर ही आ जाये और मर जाये तो भी चूंकि मुनि के परिणम में कोई भी खोटापन नहीं है, न कषाय है तो उसे हिंसा नहीं होती । तो प्रमत्त योग न होने पर प्राण विपरोपण भी हो जाये तो भी हिंसा नहीं होती । वास्तव में तो परिणामों में विकृति आये तब हिंसा है । तो विकृति का ही नाम प्रमत्त योग है, उसके अभाव में प्राणवियोग होने पर भी हिंसा नहीं है । यहाँ शंकाकार कहता है कि आप तो दोनों विशेषणों को आवश्यक बतला रहे हैं, किंतु शास्त्र में तो यह बताया है कि चाहे प्राण का घात न हो, पर प्रमत्तयोग हो तो हिंसा हो ही जाती है । जीव मरे या न मरे पर सावधान पूर्वक जो न चले, जिसके प्रमत्त योग बर्त रहा है उसे तो हिंसा ही है और जो प्रयत्नशील हैं, सावधानी से गमन कर रहे हैं उनके द्वारा कदाचित् कोई प्राणवियोग भी हो जाये तो भी बंध नहीं बताया, तो नियम तो न बना इन दोनों विशेषणों का कि एक न हो तो केवल दूसरे के रहने से हिंसा नहीं है । प्रमत्तयोग हो और प्राणविपरोपण हो, दोनों ही बातें हों तब हिंसा होती है, यह बात तो न बनी । अब इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि जहाँ प्रमत्तयोग है वहाँ प्राणों का घात नियम से है । दूसरे के प्राण का वियोग न सही मगर खुद के ज्ञान दर्शन प्राण का तो घात हो गया । और वास्तव में हिंसा तो अपने ही प्राणों का घात होने से हुआ करती है । तो भावप्राणों के वियोग की अपेक्षा दोनों विशेषण यहाँ सार्थक हैं, वास्तव में जिसके प्रमत्त योग है वह प्रमादी आत्मा पहले तो अपने विकार भाव के कारण अपनी हिंसा करता है, चाहे फिर दूसरे प्राणी का वध या प्राणवियोग हो अथवा न हो ।

(146) प्रमत्तयोग बिना हिंसा न होने से अटपट शंकावों का अनवकाश―प्रमत्तयोग बिना हिंसा न होने के कारण यह दोष भी नहीं बन सकता कि संसार में तो सब जगह प्राणी भरे हैं―जल में, थल में, नभ में, तुम कहा बैठोगे? जहाँ बैठोगे वहीं प्राणी भरे पड़े हैं, वहाँ कितने ही प्राणों का घात हो रहा है । तो अहिंसक कोई नहीं बन सकता । तो यह दोष शंका नहीं बनता, क्योंकि जो ज्ञानध्यान में लवलीन है, प्रमादरहित है, कषाय पर विजय करने वाला है, विषयों से विरक्त है, ऐसे साधु को केवल प्राणवियोग हो जाने से हिंसा नहीं होती । हिंसा का मूल आधार है अपने प्राणों का घात होना । बाहर में कौन पदार्थ कैसा परिणम रहा है, कहां क्या बन गया है? इसके आधार पर हिंसा नहीं है, अपने ही भाव खोटे होने के आधार पर हिंसा मानी गई है । अन्यथा अनेक अटपट शंकायें आ सकती हैं । कोई साधु उपवास करता है तो उपवास करने से पेट के कीड़ों को कष्ट पहुंचा कि नहीं? उनको खुराक न मिली और जब पेट के कीड़ों को दुःख हुआ तो साधु को हिंसा लग जाना चाहिए, क्योंकि आहार का त्याग कर देने से पेट के अंदर के अनेक कीड़ों की मौत हुई । तो यों हिंसा नहीं लगती साधु के, क्योंकि उसके खोटे भाव तो नहीं हैं । उसके तो अपने रत्नत्रय का परिणाम है, स्वभावदृष्टि है, आत्मा की साधना है, तो जहाँ प्रमत्त योग हो, जहाँ खोटे परिणाम हों वहाँ खुद का घात तो हो ही जाता है । ज्ञान दर्शन सही रूप में न रह सके, यही तो हिंसा है । जीव दो प्रकार के पाये जाते है―1) स्थूल और (2) सूक्ष्म । तो उनमें जो सूक्ष्म जीव हैं वे न तो किसी से रुक सकते हैं, न किसी को रोक सकते हैं, उनके तो हिंसा होती ही नहीं है । जगत में सूक्ष्म जीव सूक्ष्म एकेंद्रिय निगोद जीव, उनका किसी से छिड़ना भिड़ना हो ही नहीं सकता । अग्नि भी जल रही हो तो भी अग्नि के कारण नहीं मरते । उनकी स्वयं आयु एक सेकेंड में 23वें हिस्से की है अर्थात् वे सेकेंड में 22-23 बार जन्ममरण करते हैं, पर सूक्ष्म जीव किसी परपदार्थ की टक्कर से नहीं मरा करते । जो स्थूल जीव हैं उनकी यथाशक्ति रक्षा की जाती है और उनकी हिंसा रोकना शक्य है । अपनी चेष्टा सही बनाये, देख-भालकर निरखकर प्रवृत्ति करें तो उन स्थूल जीवों की हिंसा न होगी, तो इसी कारण स्थूल जीवों की यथाशक्ति रक्षा की जाती है । तो जिनकी हिंसा रोकना शक्य है उनके हिंसा का भाव जो नहीं रख रहे और प्रयत्नपूर्वक उस हिंसा को दूर करता रहे तो ऐसे संयत की हिंसा कैसे संभव हो सकती?

(147) प्राणव्यपरोपण से प्राणी का घात होने के कारण हिंसा की उपपत्ति―इस सूत्र में बताया है कि प्राण का वियोग तो प्राण का हुआ मगर हिंसा किसकी बनी ? प्राणी की । यदि प्राणी न हो तो प्राण किसके? प्राण पुण्य पाप भाव से बनते हैं और पुण्य पाप कर्म जीव के पाप का निमित्त पाकर बनते हैं । अगर जीव नहीं है तो पुण्य पाप भी नहीं है । प्राण भी नहीं है, पर ऐसा नहीं है । यह प्राणों का सद्भाव प्राणी के अस्तित्त्व को सिद्ध करता है । जीव है शरीर में क्योंकि श्वास आ रही, इंद्रियां काम कर रहीं, तो इन प्राणों के सद्भाव से प्राणी जीव का परिचय होता है । जैसे कि किसी घर में कोई लुहार बैठा हुआ लोहे का कार्य कर रहा है, संडासी से लोहपिंड को नीचा ऊँचा उठा रहा है, वह लुहार दरवाजे के एक तरफ भींत की आड़ में है, वह बाहर से दिखता नहीं, मगर संडासी का उठाना, पकड़ना, चलाना देखकर यह अनुमान बनता है, कि यह लुहार है और कार्य कर रहा है, ऐसे ही इंद्रिय आदिक प्राणी का सद्भाव देखकर यह ज्ञान बनता है कि इसमें प्राणी है जीव है । यदि प्राणी न हो तो देखना, अनुभवना, पाना, ग्रहण करना, संस्कार बनना आदि सब बातें न हो सकेंगी । तो अब शक्तिहीन हो जाने से ये भौतिक पदार्थ अथवा कोई क्षणिक आत्मा माने तो वह एक दूसरे के उपकार के प्रति अब उत्सुकता न रखेगा । तो आत्मा का सद्भाव न मानने पर कर्ता का अभाव होने से फिर पुण्य पापकर्म न बनेगा और प्राणों का अभाव हो जायेगा और जो कुछ यह देखना अनुभवना चल रहा है, ये कुछ न बनेंगे । ये अचेतन पदार्थ अथवा क्षणिक आत्मा जब अपने ही कार्य करने में असमर्थ है तो हिंसा का व्यापार कैसे कर सकेगा और हिंसा का व्यापार देखा जा रहा है, इस कारण हिंसा करने वाला आत्मा का सद्भाव है और उस प्राणी का सद्भाव होने से प्राणों का भी सद्भाव बनता है । और प्राणों के व्यपरोपण से प्राणी का घात होता है ।

(148) क्षणिकवाद में हिंसा हिंसाफल संसार मोक्षमार्ग व मोक्ष की अनुपपत्ति―जो सिद्धांत आत्मा को क्षणिक मानते हैं उनके यहाँ एक ही आत्मा कोई देखे, अनुभवे, प्राप्त करे, निमित्त का ग्रहण करे उसमें संस्कार आये, स्मरण करे―ये सारी बातें नहीं हो सकती हैं, क्योंकि ये बातें भिन्न-भिन्न आत्मावों में रहेंगी । एक ही समय में ये सारी क्रियायें नहीं हो सकता । तो जब स्मरण न हो सकेगा तो कैसे यह कर्ता है? इसने फल भोगा, यह फल पायेगा । यह एक कर्ता में नहीं बन सकता । तो न हिंसा का व्यापार बन सकेगा और न फल पाने का व्यापार बन सकेगा । उत्पत्ति के बाद जब आत्मा तुरंत नष्ट हो गया और विनाश अहेतुक है तो किसी का प्राण नष्ट हो गया उसमें भी कोई हेतु न रहा । जब किसी के द्वारा किसी का प्राण नष्ट होता ही नहीं है तो कोई हिंसक कैसे कहलाया? और उसे हिंसा का फल क्यों मिलेगा? फल मिलता रहेगा दूसरे को जिसने हिंसा नहीं की । ऐसी अंधेरगर्दी होवे तो फिर इस लोक में कोई हिंसक ही नहीं हो सकता । करेगा कोई, पाप लगेगा दूसरे का, फल पायेगा कोई और ही । ऐसा तो हो न सकेगा कि किसी भिन्न संतान में आये हुए आत्मा के प्राण के वियोग से हिंसा लग जाये । तो क्षणिकवाद में न पाप की व्यवस्था बनती, न फल पाने की व्यवस्था बनती, और न मोक्षमार्ग बनता । जो सिद्धांत आत्मा को नित्यानित्यात्मक मानते हैं और है भी ऐसा ही सो उनके यहाँ ही संसार और मोक्ष की व्यवस्था हो सकती है । अब हिंसा का लक्षण कह कर असत्य का लक्षण कहते हैं ।


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