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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 7-2

From जैनकोष



देशसर्वतोऽणुमहती ।।7―2।।

(122) व्रत के एकदेशविरति व सर्वदेशविरति के भेद से दो प्रकार―विरति दो प्रकार की है―(1) एकदेश विरति (2) सर्वदेश विरति । एकदेश से विरक्त होने का नाम अणुव्रत है, सर्व देश से विरक्त होने का नाम महाव्रत है । देश शब्द दिश् धातु से बना है, जिसकी निरुक्ति है―कुतश्चित् अवयवात् दिश्यते इति देश: कुछ अवयवों से जो कहा जाये उसे देश कहते हैं अर्थात् एक देश । और सर्व की निरुक्ति है―सरति अशेषान् अवयवान् इति सर्व: । जो समस्त अवयवों को प्राप्त हो उसको सर्व कहते हैं । सर्व, मायने परिपूर्ण । सो यही देश और सर्व इन दो शब्दों में द्वंद्व समास किया गया है और फिर पंचमी अर्थ में तसल् प्रत्यय किया गया है, जिसमें अर्थ हुआ कि एक देश और सर्वदेशों से । पूर्व सूत्र से विरति शब्द की यह । अनुवृत्ति की गई है तब अर्थ हुआ कि एक देश से विरक्त होना और सर्वदेश से विरक्त होना अणुव्रत और महाव्रत है । अणु और महान् ये दो शब्द विशेषण हैं । पूर्व सूत्र से व्रत शब्द की अनुवृत्ति लाकर यहाँ अणुव्रत और महाव्रत अर्थ होता है, इस ही से इस द्वितीय पद को द्वंद्व समास करके नपुंसक लिंग में द्विवचन में रखा गया है । यहाँ कोई जिज्ञासा करता है कि व्रत होता है एक अभिप्राय और संकल्प की दृढ़तापूर्वक । जैसे मैं हिंसा न करूंगा अथवा नहीं करता हूँ, मैं झूठ नहीं बोलता हूँ या न बोलूं या बिना दी हुई चीज न लूं मैं किसी अंगना का स्पर्श न करूं, मैं परिग्रह को न ग्रहण करूंगा, ऐसी दृढ़ता के साथ अभिसंधि करना, प्रयोग करना भाव बनाना व्रत कहलाता है । सो यहाँ यदि कोई इन भावों के करने में असमर्थ हो या ढील । हो जाये तो वह इस व्रत को कैसे निभा सकेगा, उसका कोई उपाय होना चाहिए? तो इस जिज्ञासु की मार्ग साधना के लिए कहते हैं कि उन सर्व व्रतों की 5-5 भावनायें होती हैं । उन भावनाओं के आने से व्रतों में दृढ़ता आती है । यही बात अब सूत्र में कहते हैं ।


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