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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 7-26

From जैनकोष



मिथ्योपदेशरहोऽभ्याख्यानकूलेटखक्रियांयासापहारसाकारमंत्रभेदा: ।।7-26।।

(195) सत्याणुव्रत के पांच अतिचार―सत्यव्रत के अतिचार इस प्रकार हैं―(1) मोक्ष और स्वर्ग के प्रयोजनभूत क्रिया विशेषों में अन्य प्रवर्तन करना―इस प्रकार का विचार उपदेश करना मिथ्योपदेश नाम का अतिचार है । (2) स्त्री पुरुष के द्वारा एकांत में किए जाने वाली क्रिया विशेष का प्रकाशन करना, प्रकट करना रहोम्याख्यान नाम का अतिचार है । (3) किसी अन्य ने तो कहा नहीं पर दूसरे के प्रयोग के वश, जबरदस्ती के वश उसने ऐसा कहा, उसने ऐसा किया, एक छल करने के लिए लेख लिखना कूटलेख क्रिया नाम का अतिचार है । (4) कोई पुरुष स्वर्ण चाँदी रुपया पैसा आदिक धरोहर किसी के पास रख जाये और वह वापिस आकर कुछ कम माँगने लगे, उसको स्मरण न रहा कि मैं कितनी रख गया था सो वह कम मांगे तो उसे बड़े भले वचन कहकर कि हां ले जाइये, उतना दे देना, बाकी अधिक जो बचा है उसे हड़प लेना इस क्रिया में जो वचन बोले गए हैं वह न्यासापहार नाम का अतिचार है । (5) प्रकरण और चेष्टा आदिक से दूसरे के अभिप्राय को समझकर ईर्ष्यावश उस अभिप्राय को प्रकट कर देना साकार मंत्रभेद है । यह सत्याणुव्रत का 5 वां अतिचार है । सत्याणुव्रत ग्रहण करने वाले को ऐसे 5 प्रकार के व्यवहार न करने चाहिए । और यदि कुछ सत्यव्रत का संबंध लगाव रखकर भी कर रहा है तो यह सत्याणुव्रत का अतिचार कहलाता है । अब अचौर्याणुव्रत के अतिचार कहते हैं ।


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