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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 7-39

From जैनकोष



विधिद्रव्यदात् पात्रविशेषात्तद्विशेष: ।।7-39।।

(211) दान की विशेषतावों के कारणों का वर्णन―विधि द्रव्य, दाता और पात्र की विशेषता से दान में विशेषता होती है । विधि का अर्थ है पड़गाहना आदिक । उसमें पहले पड़गाहना यह अतिग्रह है, फिर उच्च आसन पर बैठालना यह दूसरा कार्य है । पश्चात् पादप्रक्षालन करना, पैर धोना यह तीसरा कार्य है । पीछे पूजा करना, गुणानुवाद करना अर्थात् हर्ष व्यक्त करना, पश्चात् प्रणाम करना, ऐसे ही आगे दान क्रिया, विनयभाव रखना यह सब क्रियाविशेष का जो क्रम है उसका नाम है विधि । उस विधि में गुणकृत विशेषता आना विधिविशेष कहलाता है । यहाँ विशेष शब्द का संबंध चारों के साथ लगाया गया है । विधि विशेष के वर्णन के बाद अब द्रव्यविशेष की बात कहते हैं, दिए जाने वाले अन्न आदिक को जो ग्रहण करते हैं उन पात्रों का तप स्वाध्याय बढ़े, परिणामों में वृद्धि आवे उस प्रकार से द्रव्य विशेष आहारदान आदिक देना यह द्रव्य की विशेषता कहलाती है । दात्रि विशेष देने वाला पुरुष सरल परिणामी हो, दूसरे से स्पर्धा रखकर दान न देता हो किंतु अपनी ही विनय प्रकृति से दान दे रहा है तो उसको ईर्ष्या नहीं और त्याग करने में विषाद नहीं । खुद देने की इच्छा करता है और देते हुए जिसको दिया जा रहा उसमें प्रसन्नता का भाव आ रहा है, पुण्यभाव जग रहे हैं और जो उस दान का फल है भोगभूमि में उत्पन्न होना, तत्काल यश-कीर्ति होना, उन फलों की अपेक्षा न रखना, दूसरा दान देता हो तो इसमें बाधा न डालना और निदान न करना यह सब दाता की विशेषता कहलाती है । ऐसा उच्च गुणवान दाता दातृविशेष कहलाता है । पात्रविशेष―मोक्ष के कारण है सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र । उन गुणों के साथ जिसका योग है वह पात्र विशेष पात्र कहलाता है । यदि पात्रविशेष हों तो उनके लिए किया गया दान एक विशिष्ट पुण्य का कारण होता है । इन चार विशेषताओं के कारण दान में विशेषता आती है । अर्थात उससे फलविशेष की प्राप्ति होती है । जैसे योग्य जमीन आदिक की विशेषता होने से उस पर सौंपा गया बीज अपने काल में कई सौ गुना फल देता है, ऐसे ही समझो कि विधि द्रव्य, दाता और पात्र इनकी विशेषता होने से दान में विशेषता आ जाती है ।

(212) स्याद्वादसम्मत नित्यानित्यात्मक जीव में ही विधि आदि विशेषताओं की उपपत्ति―अब इस प्रसंग में दार्शनिकता की दृष्टि से देखने पर यह निर्णय होता है कि स्याद्वादियों यहाँ तो विधि आदिक की उपपत्ति बनती है अर्थात् ये सब ठीक हो जाते हैं, किंतु जो आत्मा नहीं मानते उनके दर्शन की विधि आदिक का कोई स्वरूप नहीं बनता । यदि विधि आदिक का स्वरूप बनायेंगे तो सभी पदार्थ निरात्मक हैं, ऐसी जो उनकी मान्यता है उसे मिटाना पड़ेगा, इसी प्रकार जो क्षणिकवादी लोग हैं, जो मानते कि क्षणभर को विज्ञान उत्पन्न होता, उनके मत के अनुसार तो जो यह चर्चा है कि साधु संतजन व्रत, तप, स्वाध्याय आदि में लीन रहते हैं, वे पर अनुग्रह रखेंगे, इनके लिए दिया गया दान हमारी व्रत, शील आदि की भावना को बढ़ायेगा । यह सब अभिप्राय बन ही नहीं सकता क्योंकि उन क्षणिकवादियों ने आत्मा का कुछ अस्तित्त्व माना ही नहीं । वे तो मानते कि आत्मा क्षण-क्षण में नया-नया उत्पन्न होता । तो उनकी इस मान्यता के अनुसार वे सब अभिप्राय नहीं बन सकते । इसी प्रकार जो दार्शनिक आत्मा को नित्य अज्ञ और निष्क्रिय मानते हैं उनके यहाँ भी विधिविशेष आदिक नहीं बन सकता, क्योंकि जब आत्मा नित्य है तो उसमें कुछ परिणमन ही नहीं बन सकता, भाव भी नहीं बन सकता तो फिर ये विधि विशेष आदिक कैसे बनें? जिनका आत्मा अचेतन है अर्थात् ज्ञानगुण से रहित है, केवल ज्ञान गुण का स्मरण होने पर ही आत्मा जान पाता है, ऐसा जिनका सिद्धांत है तो उनका वह अज्ञ अचेतन आत्मा कैसे विधि आदिक का प्रसंग बना सकेगा और फिर मानो आत्मा जुदा है, ज्ञान जुदा है और ज्ञान के संबंध से आत्मा ज्ञानी बने तो आत्मा ज्ञानस्वभाव वाला तो नहीं बन सकता । जैसे डंडा के ग्रहण करने से कोई डंडे वाला बना तो कहीं वह पुरुष डंडे के स्वभाव वाला तो नहीं बन सकता । जो लोग आत्मा को सर्वव्यापी मानते हैं उनका आत्मा निष्क्रिय भी हो गया । अब उसकी विधि आदिक कैसे बनेगी? कोई दार्शनिक 24 प्रकार का क्षेत्र अचेतन प्रकृति का कहते हैं और उस क्षेत्र को जानने वाले पुरुष चेतन माने जाते, तो वहाँ पर भी तो वह सब परिणमन वाला क्षेत्र अचेतन का है, सो उसके विधि आदिक का अभिप्राय बन नहीं सकता है । जो अचेतन है वह बुद्धि की क्रिया कैसे कर सकेगा? और यदि प्रकृति में विधि आदिक के अभिप्राय हैं तो क्षेत्र अचेतन न रहा । यदि क्षेत्र निष्क्रिय आत्मा का माना जाये तो वहाँ विधि आदिक नहीं बनते । ये सब बातें तो स्याद्वाद में ही बन सकती हैं । क्योंकि वहाँ अनेकांत का आश्रय है । आत्मा कथंचित् नित्य है कथंचित् अनित्य है, स्वरूपदृष्टि से नित्य है पर्यायदृष्टि से अनित्य है । तो उनका संबंध बनाकर यह जीव विधिविशेष आदिक विशेषताओं को कर सकता है । इस प्रकार दान का प्रकरण समाप्त होते ही यह सप्तम अध्याय समाप्त होता है ।

(213) अष्टम अध्याय में द्रव्यबंध के विस्तार से वर्णन की सूचना―मोक्षशास्त्र के प्रथम अध्याय में मोक्षशास्त्र के वक्तव्य में रत्नत्रय जीवाधितत्त्व का प्रतिपादन करके उन सब तत्त्वों के जानने के उपाय प्रथम अध्याय में बताये गए हैं । दूसरे तीसरे और चौथे अध्याय में जीवतत्त्व का वर्णन किया है । सातवें अध्याय में अजीव तत्त्व का वर्णन किया है । छठे अध्याय में सामान्यतया आस्रव पदार्थ का वर्णन किया है । पंचम अध्याय में आस्रव के विशेषरूप पुण्यास्रव का वर्णन है किया है । यों 7 वें अध्याय तक आस्रव पदार्थ, पदार्थ बताये गए । अब बंध तत्त्व का वर्णन किया जाना चाहिए । आस्रव के पश्चात् सूत्रोक्त क्रम में बंधतत्त्व का क्रम वर्णन करने के लिए बैठता है । वह बंध चेतनबंध, अचेतनबंध अर्थात् चेतनद्रव्य का परिणामरूप बंध, अचेतनद्रव्य का परिणमन रूप बंध दो प्रकार का बंध है । चेतन द्रव्य का परिणामरूप बंध तो भावबंध की अवस्था है और अचेतन द्रव्य का परिणाम रूप बंध द्रव्यबंध की अवस्था है । इन बंधों का वर्णन (1) नामबंध (2) स्थापनाबंध (3) द्रव्यबंध और (4) भावबंध―इन चार रूपों से भी की जाती है । पर चार रूप तो एक पद्धति में हैं । इससे कहा जाता है द्रव्यबंध और भावबंध । उन दोनों में से द्रव्यबंध तो अनेक प्रकार के होते हैं । लाख को पेड़ में बंध जाना, काठ का काठ से बंध जाना, रस्सी का रस्सी से बंधना, सांकल का सांकल से बंधना, ये बहुत प्रकार के द्रव्यबंध हैं, पर यहाँ द्रव्यबंध विवक्षित है । कार्माणवर्गणावों में कर्मरूपता आना सो उसका वर्णन आगे किया जायेगा ।

(214) प्रथम सूत्र में द्रव्यबंध के अथवा द्रव्यास्रव के हेतुवों के वर्णन की सूचना―यहां अभी द्रव्यबंध के अथवा द्रव्यास्रव के हेतु का वर्णन करेंगे । माता पिता पुत्र से स्नेह का संबंध बनना यह नोकर्म बंध है । इसमें भी भावबंध की झलक आयी है और द्रव्यबंध कहलाता है कार्माणवर्गणावों का बंध । वह परंपरा से तो चला आया और व्यक्तिगत रूप से जिस समय जिस प्रकृति का बंध है उस समय वह है यों आदिमान है, सो ऐसे द्रव्यबंध का हेतुभूत जो भाव है याने बंध के जो कारण हैं उनका वर्णन किया जायेगा जिन भावों के द्वारा यह द्रव्यबंध चलता है । यदि कर्म का बंध सहेतुक न हो अर्थात् आत्मा के विभावपरिणाम का निमित्त पाकर बनता है द्रव्यबंध सो उसमें निमित्त न हो तब द्रव्यबंध अनंत हो जायेगा । उसमें कभी नाश न हो पायेगा । यदि कारण न माना जाये और चूंकि द्रव्यबंध उस द्रव्य की योग्यता से होता है । इसका एकांत किया जाये तब वह द्रव्यबंध सदा रहेगा और कभी मोक्ष न हो सकेगा क्योंकि जो अहेतुक चीज है वह कैसे बोली जा सकती है? कर्मबंध यदि अहेतुक हो तो कर्मबंध कभी टल ही न सकेगा । सो बंध तो हुआ कार्य और आत्मा के विभावपरिणाम हुए उस बंध के कारण, सो कार्य से पहिले कारणों का निर्देश किया जा रहा है, जिसके बाद फिर कर्मरूप द्रव्य का विस्ताररूप से वर्णन चलेगा । तो छठवें 7 वें अध्याय में जिनका विशेषरूप से वर्णन किया गया वे ही बंधन के हेतु हैं । सो उनको संक्षेप से सूत्र द्वारा कह रहे हैं ।


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