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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 7-4

From जैनकोष



वाङ् मनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि पंच ।।7―4।।

(124) वचनगुप्ति व मनोगुप्ति विषयक भावनावों की अहिंसाव्रतसाधकता―अहिंसा व्रत की 5 भावनायें ये हैं―(1) वचनगुप्ति, (2) मनोगुप्ति, (3) ईर्यासमिति (4) आदान-निक्षेपण समिति और (4) आलोकितपानभोजन । वचन को वश करना वचनगुप्ति है । जो पुरुष मौन से रहे, जिसके नियंत्रण में वचन हैं, सो वचनों के प्रयोग से जो अपने चित्त का संभ्रम होता है और दूसरे को क्लेशोत्पत्ति की संभावना हो सकती है वह सब न होने से वचनगुप्ति का प्रयोग करना। यह वचनगुप्ति भावना अहिंसा व्रत का साधक है । वचन बोलकर या तो राग बढ़ता है या द्वेष बढ़ता है तो राग और द्वेष दोनों ही हिंसारूप हैं और द्वेष बढ़ जाये तो उसके इस जीवन में भी विडंबना का रूप हो जाता है इस कारण वचनगुप्ति की भावना करने वाला और यथा बल वचनगुप्ति का प्रयोग करने वाला अहिंसा व्रत का साधक होता है । मनोगुति का अर्थ है मन को वश में करना । पाप, हिंसा, अपने को सताना, दूसरे जीवों के दुःख का निमित्त होना ये सब मन से हुआ करते हैं । जिसने मन को वश किया, ज्ञान की लहर से मन को पवित्र बनाया उसके अहिंसा व्रत की साधना संभव है इस कारण यथाबल मनोगुप्ति करना । मनोगुप्ति की भावना रखना अहिंसा व्रत का साधक है ।

(125) ईर्यासमिति आदाननिक्षेपणसमिति व आलोकितपानभोजन-विषयक भावनावों की अहिंसाव्रत साधकता―ईर्यासमिति―अच्छे परिणाम से अच्छे कार्य के लिए दिन में खूब देख भालकर चलना ईर्यासमिति कहलाती है । ईर्यासमिति से प्रवृत्ति वाले पुरुष के हिंसा टलती है, भावहिंसा भी दूर है, द्रव्यहिंसा भी दूर होती है अत: ईर्यासमिति की भावना अहिंसा व्रत का साधक है । आदाननिक्षेपणसमिति―कोई चीज धरना अथवा उठाना तो देख भालकर उस वस्तु को शोधन करना, धरना उठाना आदाननिक्षेपणसमिति है । इस प्रकार की जो क्रिया में चलता है और ऐसी शुभ प्रवृत्ति की भावना रखता है उसके अहिंसाव्रत की साधना होती है और इस कारण आदाननिक्षेपणसमिति अहिंसा व्रत की साधक है । आलोकितपानभोजन―देखा हुआ भोजन पान करना आलोकितपानभोजन है अर्थात् । दिन में भले प्रकार देख शोधकर भोजन पान करना इस प्रकार जो रात्रिभोजन त्याग रखता है और इस प्रकार की भावना रखता है, उसका यह आलोकितपानभोजन अहिंसाव्रत का साधन है । अहिंसाव्रत की शुद्धि निर्दोष चाहने वाले पुरुषों को ये 5 भावनायें भाना चाहिये । अब सत्य व्रत की भावनाओं का सूत्र कहते हैं ।


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