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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 7-7

From जैनकोष



स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहरांगनिरीक्षणपूर्वरता-

नुस्मरणवृष्येष्टरसस्वशरीरसंस्कारत्याग:, पंच ।। 7-7 ।।

(128) ब्रह्मचर्यव्रत की स्त्रीरागकथाश्रवणत्याग व स्त्रीमनोहरांगनिरीक्षणत्याग एवं पूर्वरतानुस्मरणत्याग नाम की प्रथम, द्वितीय व तृतीय भावना―इस सूत्र में ब्रह्मचर्य व्रत की 5 भावनायें कही गई हैं―(1) स्त्रीरागकथाश्रवणत्याग―स्त्रियों में राग उत्पन्न होना इस प्रकार के कथन के सुनने का त्याग करना, क्योंकि यदि स्त्रीरागविषयक कथन सुनते रहेंगे तो उसका मन मलिन होगा और कामविषयक कल्पनायें जगने लगेंगी और उस ही का मन कर-कर यह जीव मन से वचन से काय से ब्रह्मचर्य से च्युत हो सकता है । इस कारण ऐसी कथावों के सुनने का त्याग करना आवश्यक ही है । सो उसका त्याग करना और त्याग की भावनायें निभाये रहना यह ब्रह्मचर्य व्रत की प्रथम भावना है । द्वितीय भावना है स्त्रीमनोहरांगनिरीक्षण त्याग । स्त्रियों के सुंदर अंगों के निरखने का त्याग करना । कामसंस्कार वाले पुरुषों को जो स्त्रियों के अंग निरंतर सुंदर लगा करते हैं, हाथ, मुख, जंघा आदिक ऐसे किसी भी अंगों का निरीक्षण का भाव करता रहेगा और कुछ उस ओर प्रयत्न रहेगा तो इसका मन कलुषित होगा और उस भावना में रह रहकर यह शील व्रत से च्युत हो जायेगा । इस कारण मनोहर अंगों के निरीक्षण का त्याग अनिवार्य है, अंत: उस त्याग की भावना बनाये रहना, उसके विरुद्ध कल्पना न जगना सो यह ब्रह्मचर्यव्रत की दूसरी भावना है । ब्रह्मचर्यव्रत की तृतीय भावना है पूर्वरतानुस्मरण त्याग । पहले जो भोग भोगे उनके स्मरण का त्याग करना । यदि कोई पुरुष पहले भोगे हुए भोगों की याद करता है तो उस याद में उसे भोगविषयक वासना जग सकती है और उसका ही ख्याल कर, कल्पना कर यह उस ओर आसक्त होकर पुन: जो वर्तमान कोई संयोग प्राप्त हो उसके यत्न में, उसके भाव में यह ब्रह्मचर्य से च्युत हो सकता है । इस कारण पहले भोगे हुए भोगों के स्मरण का त्याग होना अनिवार्य है । वास्तविकता तो यह है कि जिनको आत्मज्ञान जगा है, जो संयम मार्ग में आगे बढ़े हैं उनके अंतस्तत्त्व की धुन रहने के कारण उस श्रमण निरीक्षण के स्मरण की ओर दृष्टि ही नहीं जाती । आत्मानुभव के प्रकरण से उन्हें फुरसत ही नहीं है खोटे भावों में आने की । और फिर भी कदाचित् चारित्रमोह के विपाकवश कुछ थोड़ी कल्पनासी जगे तो ज्ञानबल से उस कल्पना को वहीं तोड़ कर यह ज्ञानी अपने शील को सुरक्षित रखता है ।

(129) ब्रह्मचर्यव्रत की वृष्येष्टरसत्याग व स्वशरीरसंस्कार त्याग नाम की चतुर्थ व पंचम भावना―ब्रह्मचर्यव्रत की चतुर्थ भावना है वृष्येष्टरस त्याग याने वृष्य इष्ट रस का त्याग करना । जो रस भोजन कामोत्तेजन हो, रसना इंद्रिय को प्रिय हो, ऐसे रस का परित्याग करना । यदि कामोत्तेजक औषधियाँ भस्म रस आदिक का सेवन रहा तो उससे शरीर में उत्तेजना होगी और तदनुरूप वासना उभरने लगेगी, जिसके कारण यह शील से च्युत हो सकता है । और जो शील से च्युत हुआ उसका मन मलीमस हो जाने से फिर वह मोक्षमार्ग का पात्र नहीं रहता । तो इस कारण कामोत्तेजक इष्ट रस का त्याग करना अनिवार्य है और उसकी भावना बनाये रखना कर्तव्य है । ब्रह्मचर्यव्रत की 5वी भावना है स्वशरीरसंस्कार त्याग । अपने शरीर के संस्कार का त्याग करना । जो पुरुष शरीर के संस्कार पर दृष्टि करता है, संस्कार करता है उस पुरुष के पर्यायबुद्धि है । शरीर को अपना माना, आपा समझा तब ही तो शरीर के संस्कार पर इसका उपयोग गया है । सो जिसको शरीर में आत्मबुद्धि है, शरीर के संस्कार में लगा है तो उसके कामवासना भी उभरने लगती है और वहाँ यह संस्कार करने वाला तो भावों में मलीमस होता ही, पर अन्य पुरुष स्त्रीजन जो इस ही वासना के विचार के हों वे इसके शरीर को संस्कृत सुथरा देखकर आकर्षित होने लगते हैं । परिणाम यह होता है कि संस्कार करने वाला यह पुरुष शील व्रत से पतित हो जाता है । इस कारण हिताभिलाषी पुरुषों को अपने शरीर के संस्कार का त्याग करना योग्य है, अत: इसकी भावना बनाये रखते जिससे कि कभी दुराचारभाव का अवसर न आये । यह मोक्षार्थी का कर्तव्य है इस प्रकार ब्रह्मचर्यव्रत की 5 भावनायें कहीं ।


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