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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 8-20

From जैनकोष



शेषाणामंतर्मुहूर्ता ।।8-20।।

(307) ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, आयुकर्म व अंतरायकर्म के जघन्य स्थितिबंध का वर्णन―अभी तक वेदनीय, नामकर्म और गोत्र नामकर्म की जघन्य स्थिति कही गई । इन तीन कर्मों को छोड़कर शेष 5 कर्म बचे । उनकी जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त प्रमाण होती है । जैसे―ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अंतरायकर्म, इनका जघन्य स्थितिबंध सूक्ष्म सांपराय गुणस्थान में होता है । स्थितिबंध तो 10वें गुणस्थान से ऊपर किसी कर्म का होता ही नहीं है, क्योंकि ऊपर के गुणस्थानों में ईर्यापथास्रव होता है । तो इन तीन कर्मों का जघन्य स्थितिबंध 10 वें गुणस्थान में होता है । मोहनीयकर्म का जघन्य स्थिति बंध 9वें गुणस्थान में होता है । इसका कारण यह है कि मोहनीयकर्म की अंतिम शेष प्रकृति संज्वलन लोभ है, वह 10 वें गुणस्थान के अंत में समाप्त हो जायेगी, इस कारण 10 वें गुणस्थान में इसका स्थितिबंध नहीं बन पाता । सो मोहनीयकर्म का जघन्य स्थिति बंध 9 वें गुणस्थान में संभव है । आयुकर्म अंतर्मुहूर्त प्रमाण तिर्यंच और मनुष्यो में ही बंधता है अर्थात् तिर्यंचायु का जघन्य स्थिति बंध अंतर्मुहूर्त बन जाता है, ऐसे ही मनुष्यायु का भी जघन्य स्थितिबंध अंतर्मुहूर्त बनता है, पर ऐसे तिर्यंच और मनुष्य कर्मभूमिया ही होंगे, जिनकी संख्यात वर्ष की आयु होती है । ऐसे तिर्यंच, मनुष्यों में ही यह नवीन स्थिति बंध संभव है । लब्ध्यपर्याप्तक जीव भी होते हैं, उनकी आयु की जघन्य स्थिति एक श्वांस में 18 भाग प्रमाण होती है । इस प्रकार कर्म की स्थिति बंध का प्रकरण समाप्त हुआ । यहाँ तक प्रकृतिबंध और स्थितिबंध का वर्णन किया । अब क्रम प्राप्त अनुभव बंध का वर्णन करते हैं, इसका दूसरा नाम अनुभाग बंध है ।


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