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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 8-3

From जैनकोष



(232) सूत्रोक्त पुद्गल शब्द से कर्मों की पौद्गलिकता की सिद्धि―इस सूत्र में 5 वां पद है पुद्गलान् । कर्म पुद्गलात्मक होता है, यह विशेषता बताने के लिए पुद्गल शब्द को ग्रहण किया गया है । कार्माण वर्गणायें और जो कर्मरूप परिणम गई वे सब पौद्गलिक हैं । शंका―कर्म पौद्गलिक है यह बात असिद्ध मालूम पड़ती है क्योंकि कर्म तो आत्मा का गुण है और आत्मा अमूर्त है तो कर्म भी अमूर्त जीव जैसे ही होना चाहिए । वे पौद्गलिक कैसे कहलायेंगे? उत्तर―कर्म पौद्गलिक हैं, इसका कारण यह है कि कर्म यदि अमूर्त होता तो उसके द्वारा आत्मा का अनुग्रह और घात सम्भव न था । दों पदार्थ अमूर्त ही अमूर्त हों तो एक के द्वारा दूसरे में बाधा आ जाये या दूसरे का विघात हो जाये―यह बात नहीं बनती । जैसे कि आकाश अमूर्त है और दिशा आदिक भी अमूर्त हैं । तो अमूर्त आकाश दिशा आदिक का न अनुग्रह करता है, न विघात करता है । तो इसी प्रकार कर्म ये अमूर्त होते तो अमूर्त आत्मा का न अनुग्रह का कारण बन सकता था, न विघात का कारण बन सकता था । इस अनुमान प्रमाण से यह सिद्ध है कि कर्म को अमूर्त आत्मा के विरुद्ध होना चाहिये अर्थात् मूर्त होना चाहिए और जो मूर्त है सो पौद्गलिक है ।

(233) सूत्र में ‘आदत्ते’ पद के ग्रहण से एकक्षेत्रावगाह में बंधानुभवन की प्रसिद्धि―इस सूत्र में छठवाँ पद है आदत्ते अर्थात् ग्रहण करता है । जिस बंध का इस अध्याय में वर्णन चलेगा उस बंध को यह जीव अनुभवता है, क्योंकि कषाय सहित है । जो कषायसहित जीव है वह बंध को अनुभवता है, ग्रहण करता है । आदत्त का ग्रहण करना तो स्पष्ट अर्थ है ही मगर नवीन कर्मबंध भी करता है, और वर्तमान में बंधन का अनुभव भी करता है । ग्रहण करता है, बंध का अनुभव करता है इसका तात्पर्य यह है कि मिथ्यादर्शन आदिक के अभिप्राय से स्निग्ध हुए, गीले हुए, कषायिक हुए आत्मा में चारों ओर से मन, वचन, काय के कर्म का सूक्ष्म अनन्त प्रदेशी एक क्षेत्र में रहने वाले कर्म योग्य पुद्गल का बंध होता है । जिन कार्माणवर्गणावों का बंध होता है वे कार्माणवर्गणायें इस आत्मा के एक क्षेत्र में पड़ी हुई हैं, सो जैसे किसी बर्तन में अनेक प्रकार के रस वाले बीज फल फूल आदिक रख दिए जायें तो उनका मदिरारूप से परिणमन हो जाता है इसी प्रकार आत्मा में ही स्थित पुद्गल का योग और कषाय से कर्मरूप परिणमन हो जाता है । उस बनी हुई मदिरा को कहीं बाहर से नहीं आना पड़ा किन्तु उस ही बर्तन में रहने वाले पदार्थ ही मदिरारूप परिणम गए । ऐसे ही कर्म बनने के लिए उन कर्म पुद्गलों को बाहर से नहीं आना पड़ा किन्तु विस्रसोपचय के रूप में इस जीव के प्रदेशों में ही एक क्षेत्रावगाही जो कार्माणवर्गणा स्कंध रह रहा था वह ही योग कषाय के कारण कर्मरूप परिणम गया है ।

(234) सूत्रोक्त सः पद से बन्धस्वरूप का अवधारण―कार्माणवर्गणावों का कर्मरूप परिणम जाना इस ही का नाम बंध है । बंध अन्य कुछ नहीं है । इसकी सूचना देने वाले इस सूत्र में सः शब्द कहा गया है मायने वही बंध । कुछ लोग गुणगुणी के बंध को बंध कहते हैं अर्थात् अदृष्ट नाम का गुण है । उसका आत्मा नाम के गुणी में समवाय सम्बन्ध हो जाता है । इस प्रकार से उसे बंधन माना । आत्मा के अदृष्ट का आत्मा में समवाय हो जाना बंध है, इस प्रकार की प्ररूपणा करने वाले दार्शनिकों के यहाँ गुणगुणी बंध माने जाने पर मुक्ति का अभाव हो जायेगा । कैसे कि अदृष्ट को तो मान लिया गुण और आत्मा है अदृष्टवान गुणी, तो गुण और गुणी कभी अलग नहीं होते । गुणी अपने गुण स्वभाव को कभी छोड़ता नहीं है । यदि गुणी अपने स्वभाव को छोड़ बैठे तो जब स्वभाव ही कुछ न रहा तो गुण ही क्या रहा, पदार्थ ही क्या रहा? तो जब आत्मा अदृष्ट को छोड़ ही न सकेगा तो मुक्ति कहां से होगी? जब तक अदृष्टि की प्रेरणा है तब तक जीव संसारी है, इस कारण गुणगुणी के बंध को बंध नहीं समझना किन्तु योग और कषाय के कारण जो आत्मा के एकक्षेत्रावगाह में रहने वाली कार्माणवर्गणायें कर्मरूप परिणम जाती हैं वह है बंध ।

(235) बंध शब्द का करणसाधन, कर्मसाधन, कर्तृसाधन व भावसाधन में अर्थ―यह बंध शब्द करणादिसाधनरूप है । जब करण साधन की विवक्षा है तो निरुक्ति होगी बध्यते अनेन आत्मा इति बन्ध: अर्थात् जिसके द्वारा आत्मा बँध जाये उसे बंध कहते हैं । इस विवक्षा में मिथ्यादर्शन आदिक को बंध कहा जायेगा । मिथ्यादर्शन आदिक जो सूत्र में कहे गए हैं वे बंध के कारण बताये हैं, फिर भी जो मिथ्यादर्शन अविरति आदिक भाव बन रहा है यह पूर्व में बांधे हुए कर्म के उदय के निमित्त से बन रहा है और जिस समय मिथ्यात्वादिक भाव बन रहा है उस समय आत्मा परतंत्र है । सो स्वयं बंधनरूप है अथवा कार्यरूप से आत्मा को परतंत्र करने के कारण यह बंध कहा जाता है । मिथ्यादर्शनभाव होने से वर्तमान में बन्धन और नवीन कर्म का बंधन होने से आगे भी बंधन रहेगा । जब बंध शब्द को कर्मसाधन की विवक्षा से कहा जायेगा तब निरुक्ति होगी―बध्यते इति बन्ध: अर्थात् मिथ्यादर्शन आदिक भावों से तो इस समय बंध ही रहा है और नवीन द्रव्यकर्म भी बंध रहा है, इस प्रकार मिथ्यादर्शन आदिक बंध के कारण भी हैं और बंधरूप भी हैं । बंध शब्द का जब कर्तृसाधन की अपेक्षा से अर्थ किया जाये तो निरुक्ति होगी―बध्नाति इति बंध:, जो बाँधे, आत्मशक्ति का प्रतिबंध करे वह बंध कहलाता है । आत्मशक्ति क्या है? ज्ञान, दर्शन, अव्यावाध, अनाम, अगोत्र, अन्तराय, चारित्र, आनन्द इन सब आत्मशक्तियों का जो प्रतिबंध करता है, रोकता है, प्रकट नहीं होने देता वह बंध कहलाता है । वस्तुस्वरूप की दृष्टि से कर्म यद्यपि आत्मा के किसी भी परिणमन को नहीं करता, चाहे वह शक्ति के रोकने रूप हो तथापि उन शक्तियों के रुकने में प्रकट न होने में निमित्त तो कर्मविपाक है, सो निमित्त दृष्टि की प्रधानता से यहां कर्तृसाधन बन जाता है और तब जैसे कि उपचार भाषा में कहते हैं, यह कहा जायेगा कि ज्ञानदर्शन आदिक आत्मशक्तियों का जो प्रतिबंध करे सो बंध कहलाता है । तो मिथ्यादर्शन आदिक भाव इन सब शक्तियों का प्रतिबंध करता ही है इसलिए वह बंध है और नवीन बंध का कारणरूप भी है । जिस समय बंध शब्द का अर्थ भावसाधन में किया जाये उस समय निरुक्ति होगी बंधन बंध:, बंधन को बंध कहते हैं, बंधन अर्थात् परतंत्रता । भाव बंधन में जैसे ज्ञान ही आत्मा है, जो जानना है सो आत्मा है, यहाँ अभेद विवक्षा से एक समान वृत्ति बन जाती है, इसी प्रकार भावसाधन की विवक्षा में बंधन को बंध कहते हैं ।

(236) संसारी जीवों में कर्म का उपचय और अपचय―इन संसारी जीवों के हो क्या रहा है कि पहले बंधे हुए कर्म तो उदय में आकर खिरते जाते हैं और नवीन कर्म बँधते जाते हैं । जैसे कि भंडार से पुराने धान निकाल लिए जाते हैं और नये धान भर दिए जाते हैं, ऐसे ही अनादि कार्माण शरीररूप भंडार में कर्मों का आना जाना होता रहता है । वास्तव में कर्म कर्मशरीर के साथ बनता है, उन्हीं के साथ रहता है इसलिए भंडार कार्माण शरीर ही कहा गया है । तो इस कार्माण शरीर में जो पहले आये हुए कर्म हैं वे तो फल देकर झड़ जाते हैं और नवीन कर्म आ जाते हैं, इस प्रकार इस कार्माण शरीर में कर्म का हटना और आना अर्थात् उपचय और अपचय ये बराबर चलते रहते हैं? यहाँ जिज्ञासा होती है कि क्या ये बंध एक रूप हैं अथवा इनके अनेक प्रकार हैं? इस जिज्ञासा के समाधान के लिए सूत्र कहते हैं ।

प्रकृतिस्थित्यनुभवप्रदेशास्तद्विधय: ।।8-3 ।।

(237) चार प्रकार के बंध का निर्देश―प्रकृतिबंध, स्थितिबंध, अनुभव बंध और प्रदेशबंध ये चार प्रकार के बंध होते हैं । कर्मों में प्रकृति का पड़ना कि यह कर्मवर्गणा समूह ज्ञान का आवरण करेगा, यह दर्शन का आवरण करेगा आदिक रूप से बंधे हुए कर्मों में प्रकृति का नियत हो जाना प्रकृतिबंध कहलाता है, अर्थात् उन कार्माणवर्गणाओं में प्रकृतिपने का परिणमन होना प्रकृतिबंध है । स्थितिबंध―बद्ध कार्माणवर्गणावों में स्थिति का पड़ना कि यह कर्मसमूह इतने काल तक आत्मा के साथ रहेगा इस प्रकार की स्थिति के बंधने का नाम है स्थितिबंध । अनुभवबंध अर्थात् अनुभागबंध―बद्ध कर्मों में अनुभाग का पड़ना कि यह कर्मसमूह इतनी श्रेणी का फल देगा, ऐसा अनुभाग का बँधना अनुभागबंध कहलाता है । प्रदेशबंध―प्रदेश के मायने परमाणु है । कर्मपरमाणु का बंधना प्रदेशबंध कहलाता है । ये चारों बंध एक साथ ही होते हैं । जिस समय योग और कषाय का निमित्त पाकर कार्माणवर्गणायें कर्मरूप परिणमती हैं उस ही समय वह इन चार रूपों में परिणमता है । प्रकृति शब्द में प्र उपसर्ग है और कृ जिसका मूल रूप है डुकृञ् करणे कृ धातु है और उसमें इवितन् प्रत्यय लगा है, जिसका व्युत्पत्ति अर्थ हुआ ज्ञानावरणादि रूप से अर्थात् अर्थ का बोध न हो सके इस रूप से कर्म का परिणमना प्रकृतिबंध है । इसकी निरुक्ति है―प्रक्रियते इति प्रकृति: । ज्ञानावरणादिक रूप से, अर्थात् पदार्थ का ज्ञान न होना इस रूप से जो कार्माणवर्गणा कर्मरूप की जाती है वह प्रकृति है । स्थिति शब्द ष्ठा स्वगतिनिवृत्तौ धातु से बना है । स्थिति का अर्थ है स्थान । अथ स्थान अर्थात् ठहरे रहना । जितने काल तक कर्म आत्मा में ठहरता है उतने काल उसकी स्थिति कहलाती है । अनुभव शब्द में अनु उपसर्ग है । उस उपसर्गपूर्वक भू धातु से अनुभव शब्द बना है । जिसका अर्थ है फलदान शक्ति । स्थिति और अनुभव―ये दो शब्द भावसाधन में प्रयुक्त किए गए हैं । प्रदेशबंध, प्रदिश्यते असौ इति प्रदेश: यह कर्मसाधन का रूप है, जो कहा जाये, बताया जाये वह प्रदेश है अर्थात् कर्मपरमाणु । कर्म परमाणुओं का कर्मरूप परिणमना प्रदेशबंध है ।

(238) प्रकृतिबंध का स्वरूप―प्रकृति और स्वभाव ये दोनों पर्यायवाची शब्द हैं । जैसे प्रश्न किया जाये कि नीम की क्या प्रकृति है ? तो उत्तर होता है कि कड़वापन स्वभाव है । गुड़ की क्या प्रकृति है? तो उत्तर है कि मधुरता स्वभाव है । प्रकृति और स्वभाव ये भिन्न चीजें नहीं हैं, उसी प्रकार कोई पूछे कि ज्ञानावरण की क्या प्रकृति है? तो उत्तर है कि पदार्थ का ज्ञान न होना । जो कार्माणवर्गणायें ज्ञानरूप परिणमी हैं उनके विपाक में जीव पदार्थों का अवगम नहीं कर पाता । दर्शनावरण की क्या प्रकृति है? सुख दुःख का संवेदन होना । दर्शनमोह की प्रकृति है प्रयोजनभूत अर्थों का श्रद्धान न होना । जो मोक्षमार्ग के काम के हैं ऐसे तत्त्वों का श्रद्धान न होना यह दर्शनमोहनीय का स्वभाव है । चारित्रमोहनीय की क्या प्रकृति है? असंयम परिणाम होना । विषयों से विरक्ति न होना तथा हिंसा आदिक परिणामों से विरक्ति न होना । आयुकर्म की क्या प्रकृति है? अवधारण । भव में जीव को रखे रहना । जो शरीर पाया है उस शरीर में जीव को अवस्थित रखना आयुकर्म की प्रकृति है । नाम कर्म की क्या प्रकृति है? नारकादिक नाम का करना । नाम तो किसी वस्तु का किया जाता है । जो घटना घटे, जो देहपिंड बने उसमें नाम किया जाता। है । यह नामकर्म की प्रकृति है । गोत्रकर्म की प्रकृति क्या है? उच्च और नीच स्थानों का बोधित होना । तो कोई उच्च कुली है, कोई नीच कुली है । इस प्रकार का व्यवहार गोत्रकर्म की प्रकृति है । अंतराय कर्म की प्रकृति दान आदिक में विघ्न करना है । सो इस प्रकार के लक्षण वाला कार्य जिसकी प्रकृति बने उस कार्य के होने का जो स्रोत बने, निमित्त बने उसे प्रकृति कहते हैं ।

(239) स्थितिबंध, अनुभवबंध व प्रदेशबंध का स्वरूप―स्थिति नाम है उस स्वभाव को च्युति न होने का, अर्थात् जिस कर्म प्रकृति में जो स्वभाव पड़ा है वह स्वभाव बना रहना । जितने काल तक उस स्वभावरूप से कर्म बना रहे उतने को स्थिति कहते हैं । जैसे कहा जाये कि गौ दूध की क्या स्थिति है अर्थात् गाय के दूध में जो मीठापन है वह चलित न हो, उसमें बना रहे यह उसकी स्थिति है? सो जब तक रस न बदले तब तक उसकी स्थिति कहलाती है । और इन दूधों की स्थिति में अंतर है । जैसे ऊंटनी का दूध अधिक समय नहीं ठहरता, उसके रस, गंध सब एकदम बदल जाते हैं । तो उसकी स्थिति थोड़ी कहलायी । बकरी का दूध कुछ अधिक देर तक बना रहता है । गाय भैंस का दूध अपनी सही अवस्था में कुछ और अधिक देर तक बना रहता है । तो जिसमें जो माधुर्य स्वभाव बना है वह नष्ट न होना उसे स्थितिबंध कहते हैं । अनुभवबंध―जैसे बकरी गाय, भैंस आदिक के दूध में तीव्र मंद आदिक भावों से रस विशेष पाया जाता है उसी प्रकार कर्म पुद्गल के अपने आपमें प्राप्त सामर्थ्य विशेष को अनुभव कहते हैं अर्थात् फल देने की डिग्रियाँ यह अनुभागबंध है । प्रदेशबंध परमाणु की इयत्ता का निश्चय होना अर्थात् इस प्रकृति में इतने कर्मपरमाणु बंधे हैं आदिक रूप से इयत्ता का अनुभव होना प्रदेशबंध है । इस सूत्र में विधि शब्द प्रकार का कहने वाला है । उस बंध के कितने प्रकार है? तो प्रकृति आदिक चार प्रकार के हैं । यहाँ जो चार बंध कहे गए हैं उनमें से प्रकृतिबंध और प्रदेशबंध ये दो तो योग निमित्तक होते हैं, किंतु स्थितिबंध और अनुभागबंध ये कषाय हेतुक होते हैं । जैसे-जैसे तीव्र कषाय होती जाये वैसे ही वैसे विशेष तीव्र बंध होता जाता है । कार्य कारण के अनुरूप होता है । तो जैसे-जैसे कषायें हों वैसे ही वैसे ये बंध भी होते रहते हैं । यहाँ तक बंध चार प्रकार के कहे गए । पहला बंध है प्रकृतिबंध । सो प्रकृतिबंध में मूल प्रकृतियाँ भी हैं, उत्तर प्रकृतियां भी हैं । तो उनमें मूल प्रकृतियों का वर्णन कर रहे हैं ।



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