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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 9-24

From जैनकोष



आचार्योपाध्यायतपस्विशैक्ष्यग्लानगणकुलसंघसाधुमनोज्ञानाम् ।। 9-24 ।।

वैयावृत्य नामक तप के दस भेदों में प्रथम 5 वैयावृत्यों का निर्देश―दस प्रकार के गुरुजनों का वैयावृत्य करना सो 10 प्रकार का वैयावृत्य कहलाता है । (1) आचार्यवैयावृत्य―जिस आचार्य के आश्रय से साधना चल रही है निश्चयत: तो आत्मा के आश्रय से ही साधना है, पर जिनकी छत्र-छाया में रह कर आत्मसाधना चल रही है ऐसे सम्यग्ज्ञान आदिक गुणों के आधारभूत आचार्यजनों से हे भव्य जीव व्रत को धारण, निर्वाह व आचरण करते हैं, उन आचार्यजनों के मन, वचन, काय से भक्तिपूर्वक सेवा करना आचार्यवैयावृत्य है । वैयावृत्य करने से एक समाधि के धारण में उत्साह मिलता है । ग्लानि पर विजय होती है, धर्मात्माओं में वात्सल्य बढ़ता है । और धर्मात्माजनों को एक यह विश्वास रहता है कि किसी रुग्णादिक होने के समय हम अनाथ न रहेंगे । सेवा करने वाले धर्मात्माजन मौजूद हैं । इस प्रकार उनका चित्त समाधान रूप रहता है । जिससे वे धर्म मार्ग में निर्बाध चलते हैं । (2) उपाध्याय वैयावृत्य―जिन साधुओं के पास जाकर भव्य जीव विनयपूर्वक आगम का अध्ययन करते हैं वे उपाध्याय कहलाते हैं ये उपाध्याय व्रत, शील की निरंतर भावना रखते हैं । आगम के बड़े ज्ञाता होते हैं । अध्यापन की विधि को भलीभांति जानते हैं । ऐसे उपाध्याय जनों की सेवा करना उपाध्याय वैयावृत्य कहलाता है । उपाध्याय वैयावृत्य के समय ज्ञानभावना में बहुत उमंग रहा करती है और ऐसा वैयावृत्य करने वाले साधुजन ज्ञानभावना में सफल होते हैं और मोक्षमार्ग में निर्बाध विचरण करते हैं । (3) तपस्विवैयावृत्य―एक महीने का उपवास या अन्य प्रकार के उपवास आदिक तपों को तपने वाले तपस्वीजन हैं । ऐसे तपस्वी साधुओं की वैयावृत्ति के समय रत्नत्रय के सेवन का भाव रहता है, जिससे आत्मगुणों की वृद्धि होती है, ऐसे तपस्वीजनों का वैयावृत्य यहाँ तीसरा वैयावृत्य कहा गया है । (4) शैक्ष्य वैयावृत्य―श्रुतज्ञान के शिक्षण में लीन और निरंतर व्रतभावना में निपुण साधु शैक्ष्य कहलाते हैं याने जो उत्तम शिष्यजन हैं जिनकी विद्या में तीव्र रुचि है ऐसे साधु शैक्ष्य हैं । उनकी सेवा करना शैक्ष्य वैयावृत्ति है । (5) ग्लान वैयावृत्य―जिनका शरीर रोग से आक्रांत है वे साधु पलान कहलाते है । ऐसे रोगी साधुजनों की वैयावृत्ति करना ग्लान वैयावृत्य है । वैयावृत्य हर प्रकार की सेवा करने को कहते हैं । वैसे वैयावृत्य का शब्दार्थ है व्यावृत्त पुरुषों का काम । जो संसार के कर्मो से निवृत्त हैं । जिन्हें रिटायर्ड कहते हैं । जिनको अब लौकिक कार्यों से कुछ प्रयोजन नहीं रहा, ऐसे साधुजनों का जो कर्तव्य है उसे वैयावृत्य कहते हैं । सो वैयावृत्य का अर्थ एक सामान्य है फिर भी रूढ़ि से वैयावृत्य का अर्थ शरीर की सेवा करना, वचन से सेवा करना, मन से सराहना करना यह सब वैयावृत्य कहलाता है ।

दशविध वैयावृत्त्यों से उत्तर के 5 वैयावृत्यों का निर्देश―6 गण वैयावृत्य―स्थगन प्रबुद्ध साधुजनों की संतति चली आयी है उनके शिष्य ये, उनके शिष्य ये इस प्रकार के जो साधुजनों की संतति है उसे गण कहते हैं । ऐसे गण में रहने वाले साधुजनों की सेवा करना गण वैयावृत्य कहलाता है । (7) कुल वैयावृत्य―दीक्षा देने वाले आचार्य की जो शिष्य परंपरा है उसे कुल कहते हैं । जैसे किसी गुरु से एक शिष्य ने दीक्षा ली, अब वह शिष्य किसी और को दीक्षा देगा । इस तरह दीक्षा की जिसकी परंपरा चली आयी है उसको कुल कहते हैं । ऐसे कुल की वैयावृत्य करना कुल वैयावृत्य है । (8) संघवैयावृत्य―चारों प्रकार के श्रवणों के समूह को संघ कहते हैं (1) ऋषि, (2) यती, (3) मुनि और (4) अनागार । ये चारों ही मुनि निर्ग्रंथ दिगंबर हैं, पर जिनके ऋद्धि विशेष हो जाये उन्हें ऋषि कहते हैं । जो आत्म में ध्यान देने में यत्नपूर्वक प्रवृत्ति करते हैं उन्हें यती कहते हैं । जो ध्यान अध्ययन, मनन में विशेष निपुण हैं वे मुनि कहलाते हैं । बाकी सभी साधुओं का नाम अनागार है । अनागार का अर्थ है अगार जिनके नहीं है, घर का जिन्होंने त्याग कर दिया है ऐसे 4 प्रकार के श्रमणों के समूह का वैयावृत्य करना संघ वैयावृत्य है । (9) साधु वैयावृत्य―बहुत काल से दीक्षित पुराने साधकों को साधु कहते हैं । जिनको दीक्षा लिए हुए बहुत समय हो गया और भली साधना भी अनेक वर्षों से करते आ रहे हैं उन साधुओं की सेवा करना साधु वैयावृत्य है । (10) मनोज्ञ वैयावृत्य―जो ज्ञान की विशेषता से, देह की विशेषता से, वचनों की विशेषता से सबको प्रिय हो, ऐसे मुनि को मनोज्ञ कहते हैं । लोक में जो विद्वान हैं, कुशल वक्ता हैं, ऊँचे कुल के हैं वे सब सर्वप्रिय होते हैं । ऐसे मनोज्ञ संतों का वैयावृत्य करना मनोज्ञ वैयावृत्य है ।

वैयावृत्य का विधान व प्रयोजन―वैयावृत्य में क्या-क्या किया जाता है? इन साधुओं पर कोई व्याधि आ जाये तो प्रासुक औषधि की व्यवस्था बनवाना, पथ्य आहारदान की व्यवस्था बनाना, उनका संस्तर बिछाना, उनको समय-समय पर धर्मोपकरण देना आदिक विधियों से उनके खेद का प्रतिकार करना, उनको सम्यक्त्व मार्ग में दृढ़ करना वैयावृत्य कहलाता है । ये साधुजन ग्लानि पर विजय किए हुए हैं । सो रोगी साधुजनों को कफ आया और कोई रखने का बर्तन मिट्टी आदिक का साधन नहीं है तो अपने हाथ से खकार निकालना, नाक आदिक भीतरी मल को साफ करना, और उनके मन को स्वच्छ प्रसन्न बना देना ये सब वैयावृत्य कहलाते हैं । यहाँ यद्यपि इतना हीं कह देने से वैयावृत्य की बात आ जाती थी कि उनकी इस तरह सेवा करना । 10 भेद कहना कोई अधिक आवश्यक न था फिर भी वैयावृत्य के अनेक भावों का निर्देश इस कारण किया है कि लोगों की रुचि के अनुसार किसी की किसी में विशेष प्रवृत्ति सेवा देखी जाती है सो उसके ही प्रकार इस 10 संख्या में बताये गये हैं ।


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