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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 9-47

From जैनकोष



संयमश्रुतप्रतिसेवनातीर्थलिंगलेश्योपपादस्थानविकल्पत: साध्वा: ।। 9-47 ।।

संयम और श्रुत की दृष्टि से पंच साधुओं में अंतर का दिग्दर्शन―पुलाक आदिक मुनियों में संयम, मृत, प्रतिसेवना, तीर्थ, लिंग, लेश्या, उपपाद और स्थान के भेदों से यह नाना प्रकार से निरखा जाता है । संयम की दृष्टि से क्या इनमें अंतर है सो बतलाते हैं । पुलाक, वकुश और प्रतिसेवना कुशील ये मुनि सामायिक और छेदोपस्थापना इन दो संयमों में मिलेंगे । कषाय कुशील सामायिक और छेदोपस्थापना संयम में तो होते ही हैं, पर इनके परिहार विशुद्धि और सूक्ष्म सांपराय भी हो सकेंगे । निर्ग्रंथ और स्नातक ये दो यथाख्यात संयमी ही होते हैं और इसी कारण ये 10वें गुणस्थान के ऊपर होते हैं । यद्यपि 11वां गुणस्थान भी निर्ग्रंथ है, यथाख्यात संयम वाला है फिर भी तत्काल मोक्ष का पात्र न होने से उसे यह गौण किए हुए हैं । श्रुत की दृष्टि से पुलाक आदिक मुनियों में अंतर बताते हैं । श्रुत मायने आगम का ज्ञान पुलाक वकुश और प्रतिसेवना कुशील ये 10 पूर्व के धारक होते हैं । कषाय कुशील और निर्ग्रंथ ये 14 पूर्व के धारी होते हैं । यहाँ जघन्य से उनका कितना श्रुतज्ञान है यह बतलाते हैं । पुलाक मुनि का जघन्य श्रुतज्ञान आचार वस्तु के ज्ञान तक ही सीमित है । मुनिव्रत में जितने आचरण किए जाते थे उतना उनका ज्ञान चलता है । वकुश कुशील और निर्ग्रंथ इनका जघन्य श्रुत अष्ट प्रवचन मातृका के ज्ञान तक है । अष्ट प्रवचन मातृका के मायने हैं 5 समिति और 3 गुप्ति । स्नातक केवल ज्ञानी हैं इस कारण वे श्रुत से अतीत हैं।

प्रतिसेवना तीर्थ व लिंग दृष्टि से साधुओं में अंतर का दिग्दर्शन―सेवना की दृष्टि से इनमें अंतर बतलाते हैं । पुलाक मुनि के 5 मूल गुण अर्थात महाव्रत और रात्रि भोजन विरति इनमें से किसी एक की विराधना संभव है । वह भी विराधना किसी परपुरुष के दबाव से ही संभव है वकुश मुनि दो प्रकार के देखे गए हैं―(1) उपकरण वकुश और शरीर वकुश, जिनका उपकरणों में चित्त आसक्त है, जो विचित्र परिग्रह से युक्त हैं, निरंतर सजे हुये उपकरणों की आकांक्षा रखते है, सुंदर सुडौल कमंडल अथवा शास्त्र लिखने के साधनभूत कलम आदिक सुंदर से सुंदर चाहते हैं सो इन संस्कारों के उपाय बनाने के इच्छुक हैं वे मुनि उपकरण वकुश कहलाते हैं । शरीर वकुश वे हैं जो शरीर के संस्कार की सेवा करते हैं जैसे मैल उतरवा लेना पुछा लेना आदिक । प्रतिसेवना कुशील के मूल गुणों में तो विराधना नहीं होती पर कभी-कभी उत्तर गुणों में विराधना होती है । कषाय कुशील निर्ग्रंथ और स्नातक इनकी कभी विराधना नहीं होती । प्रतिसेवना का अर्थ है कुछ विराधना या संस्कार आदिक की चेष्टा । तो उसकी दृष्टि से यहाँ अंतर बताया गया है । तीर्थ की अपेक्षा इनमें सामान्यतया अंतर नहीं क्योंकि सभी तीर्थंकरों के तीर्थ में पुलाक आदिक मुनि होते हैं, पर विशिष्ट तीर्थंकरों का नाम लेकर उस दृष्टि से कहें तो केवल एक नाम का अंतर है । लिंग की दृष्टि से इनका अंतर समझने के लिये दो विभाग करना चाहिये―(1) द्रव्यलिंग और (2) भावलिंग । भावलिंग की दृष्टि से ये पाँचों ही निर्ग्रंथ लिंगी होते हैं, और द्रव्यलिंग की दृष्टि से बाहर चूँकि सभी का निर्ग्रंथ दिगंबर भेष है अतएव अंतर नहीं है, पर प्रतिसेवना या संस्कार आदिक की दृष्टि से विभाग किए जा सकते हैं ।

लेश्या न उपपाद की दृष्टि से साधुओं में अंतर―लेश्या की दृष्टि से इनमें अंतर इस प्रकार है―पुलाक मुनि के पीत, पद्म, शुक्ल ये तीन लेश्यायें होती हैं । वकुश और प्रतिसेवना कुशील के छहों लेश्यायें हो सकती हैं, पर यहाँ तीन अशुभ लेश्याओं से मतलब केवल ऊपरी है जो कि उनकी चेष्टाओं में दिखता है और भाव दृष्टि से तो पीत, पद्य, शुक्ललेश्या ही मुनिजनों में संभव है । कषाय कुशील मुनि के और परिहार विशुद्धि वाले मुनि के अंत में चार लेश्यायें होती हैं । साधुओं में तीन ही लेश्यायें हैं, पर किसी कारण बाह्य चेष्टा आदिक से उनके विषय में अन्य लेश्याओं की बात कही गई है । सूक्ष्म सांपराय और निर्ग्रंथ स्नातकों के सिर्फ शुक्ल लेश्या होती है । सयोग केवली लेश्या रहित होते हैं । उपपाद की दृष्टि से इनके अंतर देखिये―पुलाक मुनि अधिक से अधिक 12वें स्वर्ग की उत्कृष्ट स्थिति वाले देवों में उत्पन्न होते हैं । यहाँ उपपाद के मायने हैं अगला जन्म, उस दृष्टि से अंतर बताया जा रहा है, वकुश और प्रतिसेवना कुशील का जन्म 16वें स्वर्ग तक की उत्कृष्ट स्थिति में होता है । कषाय कुशील और निर्ग्रंथ का सर्वार्थसिद्धि में जन्म होता है । जहाँ कि 33 सागर की स्थिति होती है । यह सब उत्कृष्ट उपपाद की बात कही गई है, जघन्य उपपाद सभी का प्रथम और द्वितीय स्वर्ग में होता है । स्नातक का उपपाद ही नहीं होता । वह तो केवल ज्ञानी पुरुष है, इसका निर्वाण ही होता है ।

संयम स्थानों की दृष्टि से साधुओं में अंतर बताते हुए संवर निर्जरा प्ररूपक अध्याय की समाप्ति का संकेत―अब स्थान की अपेक्षा इन पाँचों के भेद कहते हैं । स्थान के मायने है संयमों की डिग्रियां । कौन कितना विशेष संयम में है, उनके विभाग संयम स्थान से जाने जाते हैं । पुलाक और कषाय कुशील के सर्व जघन्य लब्धि स्थान होते हैं । वह आगे उन स्थानों में बढ़ता है तो असंख्यात स्थान तक पहुँचता है । उसके बाद वह पुलाक नहीं रहता । अब आगे और असंख्यात स्थानों तक कषाय कुशील चलते हैं । कषाय कुशील, प्रतिसेवना कुशील और वकुश मुनि ये सभी असंख्यात स्थानों तक बढ़ते हैं । फिर वहाँ वकुश मुनि नहीं रहते, अर्थात इनका पद और बढ़ जाता है । और आगे असंख्यात स्थानों तक ये कषाय कुशील और प्रतिसेवना कुशील जाते हैं । फिर आगे प्रतिसेवना कुशील नहीं रहता है इसका पद और बढ़ जाता है, तब आगे गमन है । इसके आगे असंख्यात स्थानों में कषाय कुशील चलता है । उसके ऊपर कषाय कुशील नहीं मिलता । इसके आगे संयम स्थान, निर्ग्रंथ मुनि के चलता है । यह निर्ग्रंथ आगे असंख्यात स्थानों तक जाता है आगे नहीं । इसके ऊपर एक स्थान जाकर वह निर्ग्रंथ स्नातक बनता है और वह निर्वाण को प्राप्त होता है । इस प्रकार इन मुनियों में संयम लब्धि अनंत गुणी कही गई है और, इन अंतरों से पुलाक आदिक में यह भेद समझा जाता हे कि किसका संयम अधिक है, किसका संयम उससे भी और अधिक है । इस प्रकार संवर और निर्जरा की सिद्धि करने वाले मुख्य ध्यानी मुनि की बात कही गई है, क्योंकि इस अध्याय में संवर और निर्जरा की हो चर्चा की गई थी । सो इस प्रकार पूर्ण संवर, पूर्ण निर्जरा पाकर निर्ग्रंथ होकर स्नातक बनकर यह निर्वाण को प्राप्त होता है । इसी नवम अध्याय में क्रम प्राप्त संवर तत्त्व के वर्णन के साथ ही निर्जरा तत्त्व का वर्णन कर दिया है इसका यह है कि जो हेतु संवर के हैं वे ही हेतु प्राय: निर्जरा के हैं । अत: संवर के साथ निर्जरा तत्त्व का वर्णन किया है । अब क्रम प्राप्त मोक्ष तत्त्व का वर्णन करेंगे ।


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