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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 12

From जैनकोष



तथा न तत्कारण-कार्य-भावो

निरवन्या: केन समानरूपा: ।

असत्खपुष्पं न हि हेत्वपेक्षं

दृष्टं न सिद्धयत्युभयोरसिद्धम् ।।12।।

(41) संतानभिन्न चित्तों में वासना बनने की व कारणकार्यभाव होने की असंभवता―क्षणिकवादी लोग एक ही देह से भिन्न-भिन्न समयों में भिन्न-भिन्न भाव उत्पन्न होते हैं ऐसा पृथक्-पृथक् मानते हैं । तो भला जब अलग-

अलग जीव हैं तो एक जीव का विचार दूसरे जीव में कैसे आ सकता है और फिर एक जीव ने जो बात याद की वह दूसरे को कैसे याद रहेगी? तो उनके चित्त में वासना भी नहीं रह सकती, न खोटे काम की, न भले काम की वासना । जैसे कि अलग-अलग देह वाले जीवों में एक के किए हुए काम की दूसरे में वासना नहीं रह सकती ꠰ सोहन ने कोई काम किया उसकी वासना मोहन में कैसे आ सकती है? उसकी बाद भी नहीं रह सकती । तो जैसे अलग-अलग देह के जीवों में एक के किए हुए काम की वासना नहीं हो सकती, इसी तरह एक ही शरीर में उत्पन्न हुए उन भिन्न-भिन्न जीवों में एक के काम की दूसरे में वासना नहीं आ सकती और इस कारण उन जीवों में उपादानउपादेय भाव भी नहीं बन सकता याने इस जीव ने जो विचार बनाया उसके अनुरूप ही अगले जीव में विचार बने, ऐसा कारण-कार्यभाव जीव में नहीं बन सकता । यदि ऐसा माना जाये कि एक देह में जितने जीव पैदा होंगे उनमें उपादानउपादेय भाव बन जायेगा तो भिन्न-भिन्न होने पर भी जब यहाँ उपादान उपादेय भाव बनाया तो नाना शरीरों में रहने वाले जीवों में क्यों न उपादानउपादेयभाव बन बैठेगा? यह बात किसी को इष्ट नहीं है और न क्षणिकवादी भी चाहते हैं । इससे आत्मा क्षणिक है, नया-नया पैदा होता है यह बात मानना संगत नहीं है । मानना यह चाहिए कि जीवद्रव्य एक है और उसके परिणमन समय-समय में जुदे-जुदे होते हैं । एक जीव के जों परिणमन हैं उन परिणमनों को ही पूरा जीव मान लिया है क्षणिकवादियों ने पर जिसको क्षणिकवादी पूरा जीव मानते हैं वह तो एक पर्याय है । पर्याय; पर्याय के समय में द्रव्य से अभिन्न रहती है और इसी कारण एक ही जीव में एक पर्याय में जो बात गुजरी उसका संस्कार उस जीव की अगली पर्याय में चलता है, तो जीव की कथंचित् नित्य और कथंचित् अनित्य मानने में तो सर्व व्यवहार सही बनता है, किंतु सर्वथा अनित्य मानने में कोई सिद्धि नहीं होती ।

(42) निरन्वय चित्तक्षणों में एकसंतानवर्तित्व व भिन्नसंतानवर्तित्व के विशेष की असंभवता तथा किसी का किसी के साथ समानरूप कहने की अशक्यता―अब यहाँ शंकाकार कहता है कि एक ही शरीर से जो क्षण-क्षण में नाना जीव होते हैं ये होते हैं समान-समान । तो समान-समान उन जीवों में उपादानउपादेय भाव बन जाता याने पूर्व जीव कारण है, उत्तर जीव कार्य है । जो-जो कुछ पहले जीव ने किया है कार्य उन सबकी वासना अगले जीव में आ जायेगी, क्योंकि एक शरीर में जितने जीव उत्पन्न होते हैं लगातार वे सब समानरूप होते हैं और समानरूप चित्त क्षणों में कारणकार्यभाव हो जायेगा और जो जुदे-जुदे देह में रह रहे उनमें समानता नहीं है, इस कारण कारण-कार्यभाव का प्रसंग उनमें न आयेगा? समाधान―एक शरीर में जितने जीव लगातार हो रहे हैं तो वे निरन्वय संतान रहित और क्षण-क्षण में नष्ट होने वाले हैं, फिर उन्हें समानरूप कैसे कहा जा सकता है? जब एक जीव का दूसरे के साथ कोई संबंध ही नहीं है, जैनशासन के अनुसार पर्याय लीजिएगा । क्षणिकवादी पर्याय को ही पूरा पदार्थ मानते हैं तो जब क्षणिकवादियों के एक जीव से दूसरे जीव का कुछ अन्वय (सदृशता) नहीं है याने कोई संबंध ही नहीं है, संतान ही नहीं है तो समानरूप कैसे कहा जा सकता है? इस कारण से युक्ति लगाकर भी क्षणिकवादियों के एक देह में रहने वाले जीवों के साथ कारण-कार्यभाव नहीं बन सकता ।

(43) सत्स्वभाव व चित्स्वभाव के साथ एक देहवर्ती चित्तक्षणों में समानता मानने पर भिन्न देहवर्ती चित्तक्षणों में भी समानता का प्रसंग और वासना एवं कारणकार्यभाव के अभाव की तदवस्थता―यदि शंकाकार यह कहे कि जितने जीव उत्पन्न हुए हैं वे सब सत् हैं और सत्त्व के नाते से वे सब समान कहलायेंगे और समान हो जाने पर फिर कारणकार्यभाव बन जायेगा । इसी तरह एक ही देह में जितने जीव उत्पन्न होते चले जायेंगे वे सब चैतन्यस्वभावी हैं, सो चैतन्यस्वभाव के नाते उन सबमें समानता बन जायेगी और इस समानता के कारण फिर उनमें वासना संस्कार कारणकार्यभाव सभी बन लेंगे । तो समाधान में यह समझना कि सत्ता के नाते जब एक देह में लगातार उत्पन्न होने वाले जीवों में समानता मान ली तो ऐसी समानता तो अलग-अलग देहों में रहने वाले जीवों के साथ भी है । सभी जीव सत् हैं, उनकी सत्ता है, तो सत्ता की दृष्टि से तो अलग-अलग देह में रहने वाले जीवों की भी समानता आ गई, फिर उनके साथ कारणकार्यभाव क्यों न माना जायेगा? इसी प्रकार भिन्न-भिन्न देहों में रहने वाले जीवों के चैतन्यस्वभाव की समानता है । सभी जीव चेतन हैं, सबमें प्रतिभास है, सबमें विचार बनता है तो चैतन्यस्वभाव के नाते से भी सभी जीवों में समानता है । भिन्न-भिन्न देहों में जितने जीव हैं, जितने भी मनुष्य हैं, सब एक बराबर हैं, फिर सभी मनुष्यों में कारणकार्यभाव बन जाना चाहिए, किंतु ऐसा है नहीं, इस कारण जीव को क्षणिक मानने में वासना संस्कार नहीं बन सकता ।

(44) उत्पन्न, सत् होकर चित्तक्षण की हेत्वपेक्षिता की प्रसिद्धि होने से हेत्वपेक्षिता से भी समानरूप कहने की अशक्यता―यदि यह कहा जाये कि एक देह में जो अगले जीव पैदा होते हैं वे पहले जीव को कारण बनाकर होते हैं याने पहला जीव है उपादान और उत्तर जीव है उपादेय । यहाँ जीव की जगह क्षणिकवादी चित्तक्षण शब्द कहते हैं याने पहला चित्त है, अगले चित्त का उपादान कारण । सो यह ही उपादान उपादेय भाव की समानता है याने एक देह में, एक संतान में जितने जीव होते हैं वे सब समान हैं ऐसा शंकाकार अपना स्पष्टीकरण कर रहे हैं । उन्हें यह सोचना चाहिए कि जो अगला जीव उत्पन्न हुआ और अपने पहले जीव की अपेक्षा कर रहा है याने पहले समय के जीव को कारण बनाकर अगला जीव उत्पन्न हुआ है तो जो अगला जीव पहले जीव को कारण बनाता है सो वह उत्पन्न होकर बनाता है या बिना उत्पन्न हुए बनाता है याने वह अगला जीव अपनी उत्पत्ति करके पूर्व जीव को कारण बनाता है या अपनी उत्पत्ति न करके पहले जीव को कारण बनाता है । इसी तरह एक यह भी विकल्प सोचें कि अगला जीव के पूर्व जीव को कारण बनाकर उत्पन्न होता है सो वह उत्तर जीव सत् होकर पहले जीव को कारण बनाता है या असत् होकर बनाता है? यदि यह कहा जाये कि उत्तर जीव उत्पन्न होकर और सत् होकर पहले जीव को कारण बनाता है अपनी उत्पत्ति के लिए तो यह बात तो विरुद्ध बैठती है, क्योंकि पहले तो यह ही युक्ति विरुद्ध है कि जो उत्पन्न हो गया, सत् हो गया वह कारण की अपेक्षा क्यों रखेगा? दूसरी बात यह है कि जो सत् है वह तो अवक्तव्य है । तो वह हेतु की अपेक्षारूप से भी नहीं कहा जा सकता ।

(45) अनुत्पन्न, असत् होकर भी चित्तक्षणों में हेत्वपेक्षिता की असिद्धि व निरन्वय चित्तक्षणों में समानरूपता सिद्ध न कर सकने की तदवस्थता―उत्तरचित्त उत्पन्न व सत् होकर पूर्वचित्त को कारण नहीं बना सकता है, इसी तरह दूसरी बात सोचिये कि अगला जीव याने चित्तक्षण क्या अनुत्पन्न होकर, असत् होकर पूर्व जीव को अर्थात् पूर्वचित्तक्षण को कारण बनाता है? यदि अगला जीव अनुत्पन्न होकर, असत् होकर पूर्व जीव को हेतु के रूप से अपेक्षा करता है तो भला बतलावो कि उत्पन्न होने से पहले तो वह जीव असत् है और असत् कभी कारण की अपेक्षा नहीं करता, क्योंकि असत् है ꠰ यदि असत् कारण की अपेक्षा करने लगे तो आकाश का फूल भी किसी कारण की अपेक्षा करे याने किसी को उपादान कर ले । और ऐसा किसीने भी नहीं माना कि जो असत् है वह हेतु की अपेक्षा रखेगा, है ही नहीं, तो यह किसकी अपेक्षा करें, उसकी तो चर्चा भी नहीं की जा सकती ।

(46) क्षणिकवाद में कार्य व व्यवहार सभा की असिद्धि―एक ही शरीर में जितने जीव उत्पन्न होते चले जाते हैं वे समान कैसे कहे जा सकते हैं ? जब वहाँ सत्त्व न्यारा-न्यारा है तो वे तो अलग-अलग ही हैं । एक का दूसरे के साथ कुछ संबंध नहीं और जब संबंध कुछ नहीं तो एक का दूसरे से उपादानउपादेय भाव नहीं, कारणकार्य भाव नहीं; जब कारणकार्य भाव नहीं तो जगत का कोई काम ही नहीं बन सकता । जैसे यहाँ देखा जाता कि एक मनुष्य सोता है, जगता है, काम करता है, खेती, व्यापार आदि करता है उसका फल भी पाता है, सुख भी पाता है तो ये बातें फिर कैसे हो सकती क्योंकि वह एक मनुष्य तो माना नहीं गया क्षणिकवादियों के यहाँ । वहाँ तो प्रति सेकेंड और उसके भी हजारवें भाग में जुदे-जुदे मनुष्य बन रहे हैं । जब जुदे-जुदे मनुष्य बन रहे हैं तो एककी की हुई बात का स्मरण दूसरे को रह नहीं सकता, जैसे कि अलग-अलग देहों में रहने वाले जीवों ने एक के किए हुए का दूसरे को स्मरण नहीं बनता, ऐसे ही एक ही मनुष्यदेह में जो अनगिनते मनुष्य पैदा होते हैं एक ही दिन में उनमें कैसे एक की बात दूसरे को याद रह सकती? और ऐसा हुए बिना हम आप कुछ काम ही नहीं कर सकते और काम तो कर रहे हैं ꠰ तो उसका अर्थ यह ही समझना कि जीव एक है और उसकी भिन्न-भिन्न पर्यायें हैं । एक होने के कारण पहली पर्याय में किए हुए काम को दूसरी पर्याय स्मरण रखती है और यह सब व्यवहार चलता जाता है । इससे आत्मा का क्षणिकवाद सही नहीं बनता ।


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