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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 18

From जैनकोष



अनर्थिका साधनसाध्यधीश्चेद्,

विज्ञानमात्रस्य न हेतुसिद्धि: ।

अथार्थवत्त्वं व्यभिचारदोषो,

न योगिगम्यं परवादिसिद्धम् ।।18।।

(67) योगाचार क्षणिकवादी द्वारा विज्ञानाद्वैत मात्र तत्त्व का सुझाव―क्षणिकवादी कहते हैं कि ऐसी कोई बुद्धि नहीं है जो बाह्य लक्षण के आलंबन की कल्पना से रहित हो याने वस्तु के स्वरूप के बारे में कोई न कोई कल्पना यह बुद्धि बनाती रहती है । जैसे स्वप्न बुद्धि किसी न किसी पदार्थ का आलंबन बनाये रहती है और वह स्वप्न-बुद्धि भ्रम है याने वैसा पदार्थ है सो तो नहीं है, लेकिन ख्याल जरूर रहता है । स्वप्न के मायने क्या है कि जिससे पदार्थ का आलंबन बनकर ख्यालात चला करते हैं सो पदार्थ तो वहाँ नहीं है और ख्यालात जरूर हैं । तो ऐसे ही हर समय दिन पदार्थों का आलंबन करके ज्ञानबुद्धि चलती रहती है सो वह पदार्थ तो वास्तव में नहीं है, पर यह ज्ञानबुद्धि, यह अवश्य चल रही है । तो पदार्थ की तो कल्पना ही की जाती है और ज्ञान प्रतिभास यह वास्तव में हो रहा है, इस कारण प्रतिभासमात्र ही तत्त्व है, पदार्थ कोई सत्त्व नहीं है । यह शंका विज्ञानाद्वैतवादी की और से है । यह भी क्षणिकवादियों का एक भेद है, जो बाह्य पदार्थ का सत्त्व नहीं मानता, किंतु बाह्य पदार्थ का आलंबन बनाता, जिसमें आलंबन बनता है, ऐसी बुद्धि ही तत्त्व है और वह भी क्षण-क्षण में नया-नया होता रहता है, पर बाहरी और कोई पदार्थ नहीं है । सिर्फ चित्त क्षण ज्ञान ज्ञान ही तत्त्व है बाह्य पदार्थ कोई तत्त्व नहीं है । बाह्य पदार्थों की तो विकल्प-वासना से कल्पना की गई है, इसलिए केवल विज्ञानमात्र ही तत्त्व मापना चाहिए ।

(68) विज्ञानाद्वैत को सिद्ध करने काला साधन मानने पर साध्यसाधनबुद्धि को अनर्थिका मानने के विकल्प में दोषप्रसंग―विज्ञानाद्वैत को शंका होने पर समाधान दिया जा रहा है कि जो शंकाकार विज्ञानमात्र की सिद्धि करना चाहते हैं सो वे यह बतलायें कि विज्ञानमात्र की सिद्धि साधनपूर्वक है या साधनरहित है याने विज्ञानमात्र की सिद्धि किसी साधन से हो रही है या उसकी सिद्धि करने वाला कोई साधन नहीं है । यदि कहा जाये कि उस विज्ञानमात्र की सिद्धि साधनसहित है तो अब यहाँ दो बातें बन गई कि विज्ञानमात्र तो साध्य है और उसको सिद्ध करने के लिए जो हेतु बताया जाये वह साधन है । तो अब दो बातें तो सिद्ध हो ही गई हैं । विज्ञानमात्र की सिद्धि करने वाला साधन और विज्ञानमात्र तत्त्व, अब दो बातें हो गई तो एक विज्ञानमात्र ही तो न रहा ।

(69) शंकाकार की साध्य-साधन के विषय में एक ओर शंका―यहां शंकाकार कहता है कि साध्य-साधन की जो बुद्धि हुई है वह भी तो ऐसा विज्ञानमात्रपना है । इसकी बात कहां से आयी ? तब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि साध्यसाधन की जो बुद्धि हुई है यह बुद्धि अनर्थक है या सार्थक याने साध्य और साधन दोनों बराबर हैं तब उसे बुद्धि ने जाना या साधन साध्य दोनों हें ही नहीं, मिथ्या है ऐसा बुद्धि में पाया । अगर कहो कि साध्य-साधन की बुद्धि अनर्थक है याने उसका कोई अर्थ ही नहीं हे तो विज्ञानमात्र तत्त्व को सिद्ध करने के लिए जो भी हेतु दिया जाता उस हेतु की भी सिद्धि नहीं होती ꠰ हेतु दिया जाता है प्रतिभासमात्रपना, जैसे कि स्वप्न में जो बुद्धि हुई है वह प्रतिभासमान मात्र है, ऐसे ही जगने में जो बुद्धि हुई है वह प्रतिभासमान मात्र है, तो यह हेतु जब अनर्थक है, हेतुकी ही सिद्धि नहीं है तो विज्ञानमात्र तत्त्व है, इस साध्य की भी सिद्धि नहीं हो सकती । विज्ञानमात्र तत्त्व को मानने वाले क्षणिकवादियों से यह पूछा गया था कि विज्ञानमात्र की सिद्धि किसी साधनपूर्वक है या साधनरहित है? उसमें यदि साधनपूर्वक विज्ञानमात्र की सिद्धि मानी जाती है तो यहाँ दो बातें हो गई । विज्ञानमात्र तो साध्य हुआ जिसको कि सिद्ध करना है और उसका साधन कोई अन्य हुआ । तो ऐसी वहाँ दो बातें होती हैं ꠰ तो विज्ञानमात्र तो न रहा उस पर विज्ञानवादियों ने यह कहा था कि साध्य और साधन की बुद्धि भी विज्ञानमात्र है । तो इस बुद्धि के बारे में दो विकल्प किए गए थे कि विज्ञानमात्र साध्य है और उसका साधन प्रतिभासमानपना है, ऐसी दो बातों की बुद्धि यदि विज्ञानमात्र ही है तो वह अनर्थक है या अर्थ वाली है? यदि अनर्थक है तो उस विकल्प का तो उत्तर दे दिया गया था ।

(70) विज्ञानाद्वैतवाद को सिद्ध करने वाले साधन और साध्य की बुद्धि को अर्थवती मानने पर शंकाकार के लिये अनिष्टप्रसंग―अब यदि साध्य साधन की बुद्धि अर्थवती मानी जाती है याने उस बुद्धि का कोई अर्थ है, उस अर्थ को आलंबन लेकर यह बुद्धि बनी है तो इसी से ही हेतु में व्यभिचार दोष आता है, क्योंकि घोषणा तो यह कही जा रही थी कि सर्वज्ञान निरालंबन है ज्ञान होने से याने ज्ञान का आलंबनभूत कोई पदार्थ नहीं है और तब ही तो विज्ञानमात्र तत्त्व सिद्ध किया जा सकता था । सो कही तो यह घोषणा करना कि विज्ञानमात्र तत्त्व को सिद्ध करने के लिए जो साधन दिया जा रहा है सो उस समय साधन की विधि अर्थ का आलंबन करती है तो उस हेतु का इसी से ही व्यभिचार आता है । व्यभिचार बन आता कि जैसे इस निधि से सालंबन माने कि विज्ञानमात्र साध्य है और प्रतिभासमानपना हेतु साधन है उस विधि को जैसे-जैसे अवलंबन वाला मानता है, ऐसे ही विज्ञानमात्र तत्त्व को अवलंबन वाला क्यों नहीं मान लेता? निष्कर्ष यह निकला कि जगत् में सब पदार्थ हैं यह सिद्ध हो जाता है, केवलज्ञान ज्ञान ही तत्त्व है, अन्य कुछ है ही नहीं, इस मत का निराकरण हो जाता है तो । तो साध्य साधन बताया, अर्थ कहीं भी न रहे इससे विज्ञानमात्र तत्त्व को सिद्ध करने के लिए साधन मानने में खुद के ही उद्देश्य का निराकरण हो जाता है ।

(71) विज्ञानाद्वैत तत्त्व की सिद्धि निःसाधना व योगिगम्य मात्र मानने पर अनेक दोषप्रसंग―अब यदि दूसरा मूल विकल्प लेते हैं कि विज्ञानमात्र साध्य को सिद्ध तो किया जा रहा है, पर यह साधनरहित है याने विज्ञानमात्र तत्त्व किसी अनुमान से सिद्ध नहीं है, किंतु वह योगिगम्य है, उसको तो योगी पुरुष ही जान सकते हैं । इस विकल्प में यह भाव है कि विज्ञानमात्रपना साध्य तो है पर उसके साधन का साध्य के साथ संबंध भी है, यह भी सब साध्य की कोटि में स्थित है, इस कारण समाधि अवस्था में जो योगीजन रहते हैं उनको जो प्रतिभास होता है ऐसा जो संवेदनाद्वैत है वही तत्त्व है याने उस विज्ञानमात्र तत्त्व को योगीपुरुष ही जानते हैं, क्योंकि विज्ञानमात्र जो स्वरूप है उसकी ज्ञप्ति स्वत: होती है । उसकी जानकारी किसी दूसरे साधन के द्वारा नहीं होतीं । वह सब अपने आप ही जाना जाता है । तो ऐसा वह विज्ञानमात्र तत्त्व योगियों द्वारा गम्य है । उक्त शंका का समाधान करते हैं कि यह कहना इस कारण ठीक नहीं कि खुद ही कहे जा रहे तो कहते जावो, पर वादियों को तो यह बात सिद्ध है नहीं । दूसरों को यह बात मान्य नहीं है, स्वयं अपने आपमें सभी लोग अपनी-अपनी ही बात कहते हैं, पर दूसरों को भी संगत बैठ जाये तत्त्व तो वह कहलायेगा, क्योंकि जो तत्त्वस्वरूप है उसमें यह पक्ष नहीं है कि अमुक के लिए ही मान्य बैठे, अन्य के लिए नहीं । बिल्कुल झूठ बात में पक्ष है कि यह अमुक के लिए ही मान्य है अन्य के लिए नहीं, पर वस्तु का स्वरूप तो एकदम प्रकट स्पष्ट है और उसे जो समझ ले वह सबके लिए मान्य होता है । विज्ञानवादियों ने जो यह हेतु दिया कि विज्ञानमात्र तत्त्व योगियों के द्वारा ही गम्य है तो यह बात परवादी कोई नहीं मान सकता । यह तो घरेलू मान्यता ठहरी, इस कारण विज्ञानमात्र तत्त्व की सिद्धि निःसाधना होती है ऐसा कहकर दूसरे को नहीं समझाया जा सकता कि हां; वास्तव में विज्ञानमात्र कोई तत्त्व है । तो इस तरह क्षणिकवादियों में जो पदार्थ को क्षणिक मानते थे उसका निराकरण तो इससे पहले किया ही जा चुका था, अब उन्हीं में से जो केवल विज्ञानमात्र तत्त्व को ही मानते हैं याने चित्त क्षण ही मानते हैं उनकी भी बात सिद्ध नहीं हो पाती ।


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