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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 22

From जैनकोष



प्रत्यक्षबुद्धि: क्रमते न यत्र तल्लिंग-गम्यं न तदर्थ-लिंगम् ।

वाचो न वा तद्विषयेण योग: का तद्गति: ? कष्टमशृण्वतां ते ।꠰22।।

(84) क्षणिकवादियों के भेद विज्ञानाद्वैत का विवरण―क्षणिकवादियों का भेद जो एक विज्ञानाद्वैतवाद है उसमें प्रत्यक्षबुद्धि तो प्रवृत्त होती नहीं याने विज्ञानाद्वैत प्रत्यक्ष से समझ में नहीं आता । इस विषय में पहले विवरण किया गया था कि प्रत्यक्ष चार प्रकार के माने गए है―(1) इंद्रियप्रत्यक्ष, (2) योगिप्रत्यक्ष । (3) सुसंवेदनप्रत्यक्ष और (4) मानसिक प्रत्यक्ष । इन चारों प्रत्यक्षों का विषय विज्ञानाद्वैत सिद्ध नहीं हो पाता । जिस संवेदनाद्वैत में प्रत्यक्षबुद्धि की प्रवृत्ति नही है उसे लिंगगम्य भी नहीं माना जा सकता । लिंगगम्य के मायने यह है कि उसका कोई कार्य देखा जाये और उस कार्य से फिर ज्ञानाद्वैत की पहिचान करायी जाये । लिंग दो प्रकार के माने गए हैं―स्वभावलिंग और कार्यलिंग; याने एक तो पदार्थ का सुगमतया स्वभाव से ही परिचय बन जाये और एक कार्य देख करके परिचय बन जाये । तो स्वभावलिंग से तो संवेदनाद्वैत का परिचय होता नहीं । जैसे कि प्रत्यक्षबुद्धि से संवेदनाद्वैत का परिचय नहीं बनता, मगर कहने में स्वभावलिंग से ज्ञानाद्वैत का परिचय किया और स्वभावलिंग का अन्य साधन से परिचय किया । तो जब तो उस साधन का भी अन्य साधनों से परिचय बनाया । यों अनवस्था दोष आ जायेगा । दूसरा है कार्यलिंग याने ज्ञानमात्र तत्त्व का कोई कार्य देखा जाये और उस कार्य से फिर ज्ञानमात्र तत्त्व को माना जाये तो यह जिक्र भी संभव नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर द्वैतवाद का प्रसन्न आ जाता है जो कि शंकाकार को इष्ट नहीं है, क्योंकि कार्य हो गया और कारणभूत विज्ञानमात्र तत्त्व हो गया, तो अब खाली विज्ञानमात्र ही तो न रहा, कार्य भी तो उसका बना पदार्थ का ज्ञान या और कुछ भी बात । कहीं झूठे कार्यों से परमार्थ तत्त्व की सिद्धि नहीं की जा सकती । विज्ञानमात्र तत्त्व मानने में और भी दोष देखिये कि जो वचन बोले जायेंगे वे तो दूसरों के समझाने के लिए बोले जोते हैं याने वचन पदार्थ अनुमानरूप होते हैं । तो उन वचनों का विज्ञानाद्वैत विषय के साथ संयोग नहीं बैठता । परंपरा से भी संबंध नहीं बनता, फिर उस विज्ञानाद्वैत तत्त्व की किसी भी प्रकार जानकारी नहीं बन सकती याने विज्ञानमात्र तत्त्व न तो प्रत्यक्ष से सिद्ध है, न अनुमान से सिद्ध है और न वचनों से सिद्ध है । तो विज्ञानमात्र तत्त्व है ही नहीं । तो ज्ञान तो हो मगर सिर्फ ज्ञान ही हो और कुछ न हो यह बात युक्त नहीं है, इस कारण हे वीर जिनेंद्र ! आपकी वाणी को न सुनने वाले बौद्धों का यह ज्ञानाद्वैतवाद का दर्शन कष्टरूप ही है अर्थात् ऐसी क्लिष्ट कल्पना को समझने में दिमाग उल्झाना पड़ता है और जीव का इसमें कुछ भला नहीं हो पाता ।


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