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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 33

From जैनकोष



प्रत्यक्ष-निर्देशवदप्यसिद्धम-कल्पकं ज्ञापयितुं ह्यशक्यम् ।

बिना च सिद्धर्न च लक्षणार्थो न तावकद्वेषिणि वीर ! सत्यम् ।।33।।

(117) निरंश वस्तु का अभाव सिद्ध न होने देने के लिये शंकाकार की एक आशंका―यहां क्षणिकवादी कहते हैं कि हमारे माने गये निरंश वस्तु का अभाव कैसे सिद्ध किया जा सकता, क्योंकि निर्विकल्प प्रत्यक्ष से तो निरंश वस्तु का प्रतिभास है ही । और जो यह धर्म है, यह धर्मी है या अन्य प्रकार के निर्णय हैं उनका प्रतिभास करने वाला निर्विकल्पप्रत्यक्ष नहीं है । धर्म-धर्मीरूप जो सांश वस्तु है उसका प्रतिभास तो सविकल्प ज्ञान से होता है और यह सविकल्प ज्ञान निर्विकल्प प्रत्यक्ष के अनंतर होता है । तो अब दो प्रकार के ज्ञान हुए―निर्विकल्प प्रत्यक्ष और सविकल्प ज्ञान । सो निर्विकल्प-प्रत्यक्ष स्वलक्षण का प्रतिपादन कर नहीं सकता । प्रतिपादन जितना होता है वह सविकल्प ज्ञान से होता है । तो सविकल्प ज्ञान से निरंश वस्तु को मना भी नहीं कर सकते, क्योंकि वह बुद्धि मिथ्या है । निर्विकल्पज्ञान स्वलक्षण का प्रतिभास तो कराता है, मगर स्वलक्षण का प्रतिपादन नहीं कर सकता । तो अब स्वलक्षण का प्रतिपादन करना निर्विकल्प-प्रत्यक्ष के अधिकार की बात नहीं है तो निरंश वस्तु का अभाव भी इस ज्ञान से नहीं बताया जा सकता । और सविकल्प ज्ञान तो व्यवहार ज्ञान है, भ्रांति वाला ज्ञान है, उससे उसकी सिद्धि बन नहीं सकती और इसी तरह असिद्धि भी नहीं बन सकती, निर्विकल्प-प्रत्यक्ष का तो इतना ही काम है कि वह स्वलक्षण का प्रतिभास किये जाये । तो जब निर्विकल्प-प्रत्यक्ष द्वारा निरंश स्वलक्षण का प्रतिपादन नहीं हो सकता तो ऐसे असिद्ध दर्शन से निरंश वस्तु का अभाव कैसे कहा जा सकता है? जैसे कि झट कह देते हैं लोग कि निरंश वस्तु दिखती नहीं है, इस कारण उसकी सत्ता नहीं है, उसका अभाव नहीं कहा जा सकता ।

(118) निर्विकल्प-प्रत्यक्ष से निर्देश की तरह निर्विकल्पप्रत्यक्ष की भी असिद्धि वर्णित करते हुए उक्त शंका का समाधान―शंकाकार के उक्त प्रस्ताव में प्रारंभ से अंत तक असंगति-ही-असंगति मालूम पड़ती है । शंकाकार का कहना है कि प्रत्यक्ष के द्वारा निर्देश नहीं बनता । तो भला जब प्रत्यक्ष के द्वारा निर्देश नहीं बनता और प्रतिभास सो होता है―जैसे यह नील है, यह पीत है इस प्रकार से वचन बिना समझ में तो आ रहा और अंगुली द्वारा उसका संकेत किया जा सकता, ऐसा तत्त्व भी प्रत्यक्ष के द्वारा असिद्ध बताया गया है । तो पहले वे उसी प्रत्यक्ष को तो सिद्ध कर लें जो निर्विकल्प-प्रत्यक्ष है, उसकी सिद्धि कैसे कर सकते हैं? जरा, दूसरे व्यक्तियों को जिनको संशय हो या समझना चाहें उनको समझा तो दिया जाये कि निर्विकल्प प्रत्यक्ष कुछ होता है । किस प्रमाण से समझायेंगे ? प्रमाण दो ही तो माने गए हैं―निर्विकल्प-प्रत्यक्ष और अनुमान । क्षणिकवाद में केवल दो ही प्रमाण हैं, सो निर्विकल्प-प्रत्यक्ष के द्वारा निर्विकल्प-प्रत्यक्ष का ज्ञान नहीं किया जा सकता, क्योंकि निर्विकल्प-प्रत्यक्ष दूसरे के प्रत्यक्ष के द्वारा असंवेद्य है । किसी भी चित्त का निर्विकल्प-प्रत्यक्ष दूसरे चित्तके निर्विकल्प-प्रत्यक्ष से तो जाना नहीं जा सकता । तो निर्विकल्प-प्रत्यक्ष की प्रत्यक्ष से तो सिद्धि बन नहीं पायी और अनुमान द्वारा निर्विकल्प-प्रत्यक्ष की सिद्धि यों नहीं बनती कि ऐसा कोई साधन नहीं है कि जिसका अविनाभाव निर्विकल्प-प्रत्यक्ष के साथ हो, क्योंकि अनुमान ज्ञान इस प्रकार होता है ।

(118) उपरोक्त शंका के समाधान में एक उदाहरण―जैसे धुवां देखकर अग्नि का ज्ञान किया । तो धुवां अग्नि का अविनाभावी है मायने अग्नि न हो तो धुवाँ नहीं हो सकता । ऐसा अविनाभाव संबंध है । और फिर धुवां दिख जाये तो उससे अग्नि का ज्ञान होता है । ऐसे ही निर्विकल्प-प्रत्यक्ष के बिना जो चिह्न दिख जाये तो निर्विकल्प-प्रत्यक्ष का अनुमान बने, किंतु निर्विकल्प-प्रत्यक्ष का अविनाभावी साधन कुछ है नहीं, फिर उसका ज्ञान भी संभव नहीं है । जब तक अविनाभाव लिंग का संबंध ग्रहण में न आये तब तक अनुमान द्वारा बताया कैसे जा सकता है? यहाँ दो बुद्धियां बतायी गई हैं कि पहले तो निर्विकल्प-प्रत्यक्ष का अविनाभावी लिंग ही नहीं है और कदाचित् लिंग हो तो उसका ज्ञान संभव ही नहीं है और फिर निर्विकल्पप्रत्यक्ष के साथ कुछ अविनाभाव है, ऐसा संबंध भी ज्ञात नहीं हो सकता ।

(119) निर्विकल्प-प्रत्यक्ष के साथ साधन के संबंध के प्रतिपत्ता व अप्रतिपत्ता दोनों के अनुमान ज्ञान की अनुपपत्ति―जिसको साध्य-साधन संबंध नहीं ज्ञात हुआ उसको अनुमान द्वारा कैसे बताया जायेगा अर्थात् नहीं बताया जा सकता, और यदि कोई उस तत्त्व का स्वयं ज्ञाता है लिंग-लिंगी के संबंध को जानता है तो उस पुरुष को निर्विकल्प-प्रत्यक्ष का बोध कराने के लिए अनुमान देना निरर्थक है । दो प्रकार के यहाँ विकल्प रखे हैं―एक तो वह पुरुष जो निर्विकल्प-प्रत्यक्ष के साथ उसके साधन का संबंध नहीं जान रहा उसको तो अनुमान कराया ही कैसे जा सकता है? और दूसरे वह पुरुष जो निर्विकल्प-प्रत्यक्ष के साथ उसके अविनाभावी साधन का संबंध जान रहा तो इसके मायने यह हुआ कि वह निर्विकल्प-प्रत्यक्ष को जान रहा है । तो जो स्वयं प्रतिपन्न है, निर्विकल्प-प्रत्यक्ष का जाननहार है उसको अनुमान बताने की जरूरत ही क्या है? शायद शंकाकार यह कहे कि बीच में भ्रम उत्पन्न हो जाये तो उसका निराकरण अनुमान द्वारा कराया जायेगा, सो यह भी बात असंगत है, क्योंकि जो साध्य-साधन के संबंध को जानने वाला है, जो निर्विकल्प-प्रत्यक्ष के साथ उसके साधन का संबंध जानता है उसको भ्रम ही क्यों होगा? और जो संबंध को नहीं जानता है उसे संबंध ग्रहण कराना संभव ही नहीं है, इस कारण समारोप के व्यवच्छेद का बहाना लेकर अनुमान-प्रमाण की उपयोगिता सिद्ध करना व्यर्थ है ꠰ तो निर्विकल्प-प्रत्यक्ष को न तो प्रत्यक्ष द्वारा जान सकते हैं, और न अनुमान द्वारा जान सकते हैं और इसी तरह गृहीत की विस्मृति न बनने से भी अनुमान द्वारा नहीं जान सकते । तो उस निर्विकल्प-प्रत्यक्ष को सिद्ध करने वाला कोई ज्ञान नहीं है । सो वह प्रत्यक्ष ही असिद्ध है । जो जब निर्विकल्प-प्रत्यक्ष की भी सिद्धि नहीं है तो निर्विकल्प-प्रत्यक्ष द्वारा निर्देश किए जाने वाले निरंश वस्तु की सिद्धि कैसे बन सकती है? तो इस प्रकार दोनों ही असिद्ध हैं । न तो निर्विकल्प-प्रत्यक्ष की सिद्धि है और न निर्विकल्प-प्रत्यक्ष के विषय की सिद्धि है ।

(120) प्रत्यक्ष की सिद्धि के अभाव में प्रत्यक्ष के लक्षणार्थक निर्देश की असंभवता―अब इसी विषय में एक बात और समझिये कि जब प्रत्यक्ष की सिद्धि नहीं है तो प्रत्यक्ष का लक्षणार्थ कैसे बन सकता है? याने प्रत्यक्ष का लक्षण क्रिया है जो ज्ञान कल्पना से रहित है वह प्रत्यक्ष है । तो चीज तो कुछ है नहीं, लक्षण बना दिया तो यह तो एक विडंबना ही हुई । न तो लक्षण का कहना युक्त है, न प्रत्यक्ष का नाम लेना युक्त है, ऐसा प्रत्यक्ष का कि जो निर्विकल्प है और कल्पित स्वलक्षण का प्रतिभास करने वाला है, और न उसका विषय ही सिद्ध है, सो हे वीर जिनेंद्र ! आपके स्याद्वादशासन का जो द्वेषी है अर्थात् सत् असत् नित्य अनित्य किसी भी प्रकार का एकांत करता हो, उसमें सत्य घटित नहीं होता ।


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