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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 40

From जैनकोष



सामान्यनिष्ठा विविधा विशेषा पदं विशेषांतर पक्षपाति ।

अंतर्विशेषांतर र्वृत्तितोऽन्यत᳭ समानभावं नयते विशेषम् ।।40।।

(140) विशेषों की सामान्यनिष्ठता―7वीं कारिका में यह बताया गया था कि अर्थतत्त्व अभेदभेदात्मक है अर्थात् सामान्यविशेषात्मक है । जो अभेद तत्त्व है वह सामान्य है और जो भेद तत्त्व है वह विशेष है । जो भी सत् है वह सामान्यविशेषात्मक होता ही है । ऐसे वचन सुनकर एक यह प्रश्न होता है कि उसमें जो विशेष है वह क्या सामान्य में निष्ठ है याने सामान्य में लीन व परिसमाप्त है या सामान्य विशेष में निष्ठ है अथवा सामान्य और विशेष दोनों परस्पर एक दूसरे में निष्ठ हैं ? ऐसे यहीं तीन प्रकार के विकल्प किए गए । प्रथम विकल्प तो यों सही नहीं है याने सामान्य विशेष में निष्ठ है, यह कहना तो यों युक्त नहीं है कि विशेष होते हैं अस्थिर, कुछ काल रहने वाले और सामान्य, यदि विशेष में रहता है तो उस विशेष का अभाव होने पर सामान्य के भी अभाव का प्रसंग होता । फिर तो सत् ही कुछ न रहा । विशेष नाम गुणों का भी हे और पर्यायों का भी है । गुण तो अखंड सद्भूत द्रव्य में कल्पना से किया गया भेद है और पर्याय द्रव्यत्व गुण के कारण पदार्थ में अनिवार्य क्षण-क्षण में होने वाली अवस्था है । अगर विशेषों में सामान्य का रहना कहा जाये तो जो पर्याय नष्ट हुई है और पर्यायों में सामान्य लीन है तो पर्याय के नष्ट होते ही सामान्य भी समाप्त हो जायेगा, इस कारण प्रथम विकल्प तो युक्तिसंगत नहीं है, पर हां दूसरा विकल्प सही है याने विशेष सामान्य में निष्ठ होता है । एक द्रव्य में क्रमभावी और सहभावी और उनके भी अनेक भेद प्रभेद ये सब विशेष हैं और परिस्पंद-अपरिस्पंदरूप से भी नाना प्रकार की पर्यायें हैं । वे सभी विशेष एक द्रव्य में रहने के कारण द्रव्यनिष्ठ कहलाती हैं याने यह सब ऊर्ध्व-विशेष ऊर्द्धता सामान्य के परिसमाप्त है और तीसरा विकल्प जो कहा गया था कि सामान्य और विशेष निरपेक्षरूप से परस्पर निष्ठ हैं क्या? तो यह मान्यता भी बाधित है । अपेक्षा से तो बात कही जा सकती, परंतु निरपेक्षरूप से विशेष सामान्य में लीन हो, सामान्य विशेष में लीन हो, ऐसी बात संभव नहीं है ।

(141) वर्णसमूहरूप पद की विशेषांतरपक्षपातिता होने से मुख्य गुणरूप से विशेषवाचकता―अब यहाँ शंकाकार कहता है कि विशेष यदि सामान्य में निष्ठ है तो यह बतलाओ कि जो वर्णसमूह बोले जाते हैं, जिनका नाम पद है, वह पद किसका वाचक होता है? वर्णसमूहरूप पद क्या विशेष का वाचक है या सामान्य का वाचक है या उभय का वाचक है या अनुभय का? किसका बोध कराता है? समाधान यह है कि जो वर्णसमूहरूप पद है वह विशेषांतर का पक्षपाती होता है याने विशेषो में से किसी एक विशेष का प्रधानरूप से वाचक होता है । विशेष हैं; तीन प्रकार के द्रव्य, गुण और कर्म । इन तीन प्रकार के विशेषों में से किसी एक विशेष का प्रधानरूप से वाचक है और साथ ही दूसरे विशेष को स्वीकार करता है । यदि वचन अपने किसी एक विशेष को ही स्वीकार करे, अन्य विशेषों को स्वीकार न करे तो उसकी किसी भी विशेष में प्रवृत्ति नहीं बन सकती । सो वर्णसमूहरूप पद विशेष का तो वाचक है, मगर उन विशेषो में से एक को प्रधानरूप से बताते हैं और दूसरे को गौणरूप से बताते हैं । इसके संबंध में आगे की कारिका में विशेष वर्णन किया जायेगा ।

(142) उपरोक्त विवरण का संक्षिप्त रूप में उपदेश―यहाँ इतना ही समझिये कि वर्णसमूहरूप पद मुख्यतया किसी विशेष का वाचक होता है और जब विशेष का वाचक हुआ तो साथ ही यह भी अर्थ समझना चाहिए कि विशेषांतरों के अंतर्गत उसकी वृत्ति है तो दूसरे विशेष को सामान्यरूप में प्राप्त कराते हैं याने इसे कहते हैं तिर्यक्सामान्य । इस प्रकार वर्णसमूहरूप पद सामान्य और विशेष दोनों को प्राप्त कराता है । एक को प्रधानरूप से प्रकाशित करता है पद तो दूसरे को गौणरूप से प्रकाशित करता है, क्योंकि सामान्यरहित विशेष कुछ वस्तु नहीं और विशेषरहित सामान्य भी कुछ वस्तु नहीं । जगत् में कोई सामान्य ऐसा नहीं है कि जिसका विशेष से संबंध नहीं । विशेषनिरपेक्ष सामान्य नहीं, इसी प्रकार सामान्य-निरपेक्ष विशेष भी नहीं होता । अनुभव में भी नहीं आता कि कोई सामान्य ही सामान्य ज्ञान में आया हो अथवा मात्र विशेष-विशेष ही ज्ञान में आया हो तो जब मात्र सामान्य अवस्तु है और इसी प्रकार मात्र विशेष अवस्तु है तो वर्णसमूहरूप पद अवस्तु का कैसे

वाचक हो सकेगा? तो वर्णसमूहरूप पद सामान्य मात्र का वाचक नहीं, विशेष मात्र का वाचक नहीं, इसी प्रकार परस्पर निरपेक्ष दोनों का वाचक नहीं और सामान्य विशेष से रहित शून्य अवस्तु का भी वाचक नहीं, किंतु इस सर्वथा वाले चारों से विलक्षण सामान्यविशेषात्मक वस्तु को ही यह वर्णसमूहरूप पद प्रधान और गौणरूप से प्रकाशित करता है तब ही यथार्थ विदित होता है । और इसी कारण से ज्ञाता के उस पद से वस्तु की प्रवृत्ति और प्राप्ति दोनों ही देखी जाती हैं ।


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