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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 42

From जैनकोष



अनुक्ततुल्यं यदनेवकारं व्यावृत्यभावान्नियमद्वयेऽपि ।

पर्यायभावेऽन्यतरप्रयोगस्तत्सर्वमन्यच्युतमात्महीनम् ।।42।।

(146) एवकाररहित पद की अनुक्ततुल्यता―जिस पद के साथ ‘ही’ न लगा हो वह पद तो कहा हुआ भी न कहने के समान है, क्योंकि उस पद से जिसमें कि ‘ही’ नहीं लगा, यद्यपि कर्ता और क्रिया विषयक दोनों नियम इष्ट हैं, फिर भी प्रतिपक्ष को व्यावृत्ति नहीं हो सकती याने निश्चयपूर्वक कोई बात न कहीं जाने पर

प्रतिपक्ष की निवृत्ति नहीं बनती । यहाँ यह बात और समझना कि कोई पद के साथ ‘ही’ न भी लगाये तो भी उसके मन में ‘ही’ का अर्थ लगा रहता है, क्योंकि जो जानकारी है और शब्द बोल रहा है तो उसके मन में यह भाव है कि इस शब्द का यह ही अर्थ है, अन्य कोई अर्थ नहीं है । सो जो कोई शब्द बोलता है और कदाचित् ‘ही’ न लगाये तो उसके मन में ‘ही’ का भाव रहता ही है । तो यहाँं यह बतला रहे हैं कि शब्दपद के साथ ‘ही’ का प्रयोग हुआ ही करता है । और तब ही स्याद्वाद के 7 भंगों में प्रत्येक भंंग में ‘ही’ का प्रयोग रहता है । ‘ही’ का प्रयोग करने पर भी वह एकांत क्यों नहीं कहलाता कि उस पद के साथ स्यात् शब्द का प्रयोग भी रहता है । जिसका अर्थ है कि इस अपेक्षा से यह पदार्थ ऐसा ही है, उसमें धर्म का निर्णय है और दृष्टि का भी निर्णय है । यदि पद के साथ ‘ही’ का प्रयोग न हो अथवा ‘ही’ का भाव न हो तो सभी पद परस्पर पर्यायवाची कहलाने लगेंगे, चाहे कई शब्द बोल दिये जाये वे सब पर्यायवाची होगे । जैसे कि सत्ताद्वैतवाद में कोई भी शब्द किसी भी शब्द का व्यवच्छेदक नहीं है । सभी शब्द सभी के पर्यायवाची माने गए हैं, क्योंकि सत्ताद्वैत है, शब्दों द्वारा कुछ दूसरी चीज नहीं बोली जाती, वही सत्ता का ही ज्ञान होता है । तो ऐसे ही पद के साथ अगर ‘ही’ शब्द न लगे तो वह पद शब्दों का पर्यायवाची कहलायेगा और जब पद सभी पदों का पर्यायवाची बन गया तो अटपट किसी भी शब्द का पद का प्रयोग कर लिया जाये तो उसमें विवेक करने की जरूरत भी नहीं, और पद द्वारा भी किसी का भी बोध कर ले वह प्रतिपक्ष से रहित तो हो न पायेगा । और यह भी प्रतियोगी से रहित नही है, वह अपना स्वरूप भी खो बैठता है ꠰

(147) एवकाररहित पद की अनुक्ततुल्यता की उदाहरण द्वारा स्पष्टता―जैसे “चौकी” कहा जायेगा तो इसका अर्थ यह निकला कि यह चौकी ही है, दरी, चटाई आदिक अन्य कुछ नहीं है । अगर वह चौकी प्रतियोगी से रहित न हो याने दरी, चटाई आदिक भी यह बन जाये तो फिर चौकी ही क्या रही । फिर तो उसका स्वरूप ही नहीं रह पाता, और ऐसी स्थिति में कोई शब्द पद सही अभिधेय को नहीं बता सकता है ।

(148) उदाहरणपूर्वक पदों की अस्वार्थव्यवच्छेदकता―पदों की अस्वार्थव्यवच्छेदकता के समर्थन में प्रसिद्ध उदाहरण ले लीजिए―जैसे कहा कि “स्यात् जीव: नित्य अस्ति” द्रव्यदृष्टि से जीव नित्य ही है, तो भले ही यहाँ एक जगह एव लगा, मगर एव की ध्वनि, प्रकाश सब पद के साथ है । द्रव्यदृष्टि से जीव नित्य है, तो जीव नित्य है द्रव्यदृष्टि से ही । द्रव्यदृष्टि से जीव नित्य ही है, द्रव्यदृष्टि से जीव नित्य है ही । कहीं भी ‘ही’ शब्द लगा लीजिए, पद का स्वरूप है यह कि वह अन्य का व्यवच्छेदक होता है । अब यहाँ मानो जीव के साथ एव लगा दें―जीव एव अस्ति, जीव ही है तब तो अर्थ सही बन गया कि यह जीव ही है अजीव नहीं है, चौकी है, अचौकी नहीं है, और यदि पद के साथ ‘ही’ शब्द न लगाया जाये तो उसका आधारण ही न बनेगा ꠰ जीव के साथ एव नहीं है तो वह अजीव का ही वाचक बन गया, फिर जीव रहा क्या? अस्ति के साथ एव नहीं है तो उसका अर्थ नास्ति बन गया । तो रहा ही क्या? सो यों जितने भी पद होते हैं सबके साथ एव का अभिप्राय है तो वह पद अपने अर्थ का वाचक है, अन्य अर्थ का नहीं । तो इस प्रकार अगर पद के साथ ‘ही’ न लगे या अभिप्राय में न हो तो उसका कहना न कहने के बराबर ही है, क्योंकि उसका कुछ अर्थ न निकल सका । तो ऐसे ही जितने भी शब्द बोले जाते हैं उन सभी शब्दों के साथ ‘ही’ का भाव रहता है । ‘ही’ का भाव न होने से वह अपने प्रतिपक्ष से रहित नहीं बन सकता और कोई भी अर्थ अगर सभी अर्थों स्वरूप हो गया तो उसका अस्तित्व ही नहीं ठहरता, क्योंकि पररूप का अगर त्याग नहीं है तो स्वरूप का ग्रहण नहीं बन सकता ।

(149) पदों को अस्वार्थ व्यवच्छेदकता का एक और उदाहरण―जैसे कोई घड़ा है तो घड़े का आकार तब ही तो है जब घड़े को छोड़कर अन्य सब पदार्थों का आकार वहाँ नहीं है । तो अघटरूप के त्याग बिना घट के स्वरूप की कोई प्रतिष्ठा नहीं बनती, ऐसे ही सभी शब्दों में ‘एव’ की ध्वनि समझनी चाहिए, क्योंकि वस्तु का वस्तुत्व तब ही है जब कि वह अपने स्वरूप को ग्रहण करे और पररूप को त्यागे रहे, तब ही तो वस्तु अपने स्वरूप से हैं, पररूप से नहीं है । जब पररूप से देखा तो वहीं अवस्तु बन गई । इससे कोई बिना केवल सामान्यवाला या केवल विशेषवाला नहीं है याने सभी पदार्थ सामान्यविशेषात्मक हैं तो जितने शब्द बोले जायें, जो भी पद बोला जाये वह सामान्यविशेषात्मक अर्थ को ही व्यवस्थावश, शब्द प्रयोगवश किसी धर्म को प्रधान रूप से प्रकाशित करता है ।


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