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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 45

From जैनकोष



विधिर्निषेधोऽनभिलाप्यता च

त्रिरेकशस्त्रिर्द्विश एक एव ।

त्रयो विकल्पास्तव सप्तधाऽमी

स्याच्छब्दनेया: सकलेऽर्थभेदे ।।45।।

(158) सप्त अंगों का दर्शन―इस छंद में सप्तभंगी की योजना बनायी है । स्वतंत्र धर्म तीन है―1 विधि, 2―निषेध और 3―अवाच्य । जैसे स्यात् अस्ति एव, यह प्रथम भंग है । स्यात् नास्ति एव, यह द्वितीय भंग है और स्यात् अवक्तव्य एव, यह तृतीय भंग है । ये तीन मूल विकल्प हैं । अब इनके विपक्षीभूत जो अन्य धर्म हैं उनकी संयोजना करके द्विसंयोगी विकल्प तीन बनते हैं याने इन विकल्पों सहित 6 भंग हो जाते हैं । चौथा भंग है स्यात् अस्ति नास्ति एव, 5वां भंग है स्यात् अस्ति अवक्तव्य एव, छठा भंग है स्यात् नास्ति अवक्तव्य एव । इसके आगे उन तीन मूल विकल्पों का संयोग करने पर एक भंग और बना है जो कि 7वां भंग है ꠰ वह है स्यात् अस्ति नास्ति अवक्तव्य एव । इस प्रकार हे वीर जिनेंद्र ! ये 7 विकल्प संपूर्ण अर्थभेद में घटित होते हैं जीव अजीवादिक सभी तत्त्वार्थों की पर्याय में ये 7 भंग आपके शासन में घटित होते हैं । एकांतवाद शासन में ये समस्त अपेक्षायें और धर्म घटित नहीं हो पाते । और इन 7 अंगों में जो भी धर्म बताया है वे स्यात् शब्द के द्वारा समझ लिए जाते हैं अर्थात् भले ही कोई एक ही विकल्प बोलता है, पर उसके साथ स्यात् शब्द का प्रयोग होने से बाकी 6 विकल्पों को विवेकी पुरुष समझ लेते हैं और फिर विवेकी और अभ्यस्त पुरुषों को 6 विकल्पों के प्रयोग की जरूरत नहीं रहती, क्योंकि स्यात् पद के साथ रहने से उनके अर्थ विषय में विवाद नहीं रहता । वहाँं कहीं विवाद हो वहाँ इनका क्रम से प्रयोग करने में भी दोष नहीं अर्थात् अनभ्यस्त पुरुषों के प्रति तो 7अंगों का प्रयोग किया जाता है, पर प्रतिपन्न व्यक्तियों को एक ही धर्म के प्रयोग से सभी अंगों का ज्ञान हो जाता है ꠰ तब ही तो बतलाया है कि परिणमन के वश से एक वस्तु में अविरुद्धरूप से विधि-निषेध की जो कल्पना है उस ही का नाम सप्तभंगी है । शिष्यजन अनेक प्रकार के होते हैं―कोई विशेष समझदार, कोई कम जानकार, इसलिए कहीं 7 अंगों का प्रयोग करना भी उचित है और कहीं एक भंग के प्रयोग से ही वे सर्व बातों को समझ लेते हैं ।


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