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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 5

From जैनकोष



काल: कलिर्वा कलुषाऽऽशयो वा

श्रोतुः प्रवक्तुर्वचनाऽनयो वा ।

त्वच्छासनैकाधिपतित्व-लक्ष्मी-

प्रभुत्व-शक्तेरपवाद-हेतुः ।।5।।

(10) प्रभु के शासन की महिमा का वर्णन―इससे पूर्व श्लोक में यह कहा गया था कि हे प्रभो ! आप शुद्धि और शक्ति की परमकाष्ठा को प्राप्त हैं । शुद्धि मायने निर्दोषता, पवित्रता । किसी भी कलंक का, दोष का न

रहना; यह बात आपमें सर्वोच्च है और शक्ति के मायने समस्त सत् को जानने की शक्ति और अनंत गुणों को अनुभवने की शक्ति । इन दोनों ही बातो में आप उत्कृष्ट काष्ठा को प्राप्त हैं और इसी कारण आपकी जो वाणी है, आपकी दिव्यध्वनि से चली आयी हुई जो जिनवाणी है, शासन है; वह शासन मोक्ष के मार्ग में लगाने वाला है और जब-तक लोक में रहेगा जीव, आपके शासन को मानने वाला तब तक उसके लौकिक अभ्युदय भी चलता रहेगा, क्योंकि आपकी इस पवित्र वाणी के हृदयंगम करने का फल है सम्यग्दर्शन की प्राप्ति । और फिर आगे बढ़ेगा तो सम्यग्ज्ञान का विकास और सम्यक्चारित्र का विकास । एक सम्यग्दर्शन ही प्राप्त हो गया जिसे वह पुरुष नरक और तिर्यंचगति में नहीं जाता और अगर कहीं जन्म लेना हो तो मनुष्यगति में भी जन्म नहीं लेता, देवगति में जन्म लेता है ।

(11) देवगति भी मनुष्यगति के समान है―देवगति; मनुष्यगति से कोई श्रेष्ठ नहीं है, क्योंकि देवगति से मुक्ति नहीं । देव भी इस मनुष्यभव को तरसते हैं, लेकिन सम्यग्दर्शन के होने पर जो क्रियायें चलती हैं वे ऐसे ही पुण्य का बंध करती हैं । सम्यग्दर्शन नहीं करता बंध, किंतु सम्यग्दर्शन के होनेपर जो मन, वचन, काय की प्रवृत्ति चलती है, भावनायें चलती हैं उनसे ऐसा विशिष्ट पुण्यबंध होता कि उसको फिर लौकिक दृष्टि का अच्छा सुख रहना चाहिए, वह देवों में संभव है । तो मनुष्य सम्यग्दृष्टि हो तो देव में ही पैदा होते हैं, देव सम्यग्दृष्टि हो तो मनुष्य में ही पैदा होते हैं । कुछ अपवाद है कि मनुष्य ने अगर पहले नरक या तिर्यंच आयु का बंध किया और पीछे हुआ क्षायिक सम्यक्त्व तो वह नरक और तिर्यंच में जायेगा और अगर नरक जायेगा तो पहले नरक तक और तिर्यंच होगा तो भोगभूमि का तिर्यंच ।

(12) महापुरुषों के गुणों की व्याख्या―देखो, बड़े पुरुषों की रीति होती है या तो कष्ट भोगा या बहुत उत्तम नो पद में रहे । नोचा-खोंची की बात महापुरुषों के नहीं चलती । तो यों ही समझिये कि जैसे तीर्थंकर, जितने भी सामान्य कल्याणक वाले तीर्थंकर हुए हैं वे या तो नरक से आकर तीर्थंकर हुए या देवगति से आकर तीर्थंकर हुए । सम्यग्दृष्टि जीव इतने पवित्र आशय के हैं कि वे एकेंद्रिय में नहीं पैदा होते; दोइंद्रिय, तीनइंद्रिय, चारइंद्रिय, असंज्ञी पंचेंद्रिय पशुओं में भी और नपुंसकों में भी, सर्व स्त्रियों में भी इन पर्यायों को धारण नहीं करते । सम्यग्दर्शन की एक महिमा है । हाँ; देवों में भी भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिषी इन देवों में उत्पन्न नहीं होते । ये सब सम्यग्दर्शन तो उत्पन्न कर सकते; स्त्री भी, नपुंसक भी, पुरुष भी, पक्षी भी और भवनत्रिक के खोटे देव भी सम्यक्त्व तो उत्पन्न कर लेते हे, पर सम्यक्त्वसहित मरण हो तो यहाँ उत्पत्ति नहीं होती । तो यह महिमा किसकी है? यह भगवान के स्याद्वादशासन के अवधारण की । स्त्री के भी सम्यग्दर्शन हो तो उसका स्त्रीलिंग छिद जाता है । यहीं जो कहते हैं कि सीता जी के जीव ने स्त्रीलिंग छेदा तो उसका अर्थ यह है कि जहाँ सम्यक्त्व है वहाँ ये सब दूर हो जाते हैं । तो सम्यग्दर्शन की इतनी बड़ी महिमा हे प्रभु ! किसने प्राप्त करा दी ? आपके शासन के अनुराग ने ।

(13) श्रीवर्द्धमानशासन के प्रसार के अवरोध के कारण की जिज्ञासा―हे प्रभो ! आपका इतना महान उच्च शासन है कि मुक्ति का मार्ग बताया और लोक में अभ्युदय कराया, पर एक शंका हो जाती है कि जब इतना पवित्र मार्ग है, तत्काल भी सुख देता है, भविष्य में भी आनंद देता है; और की तो बात क्या, सदा के लिए जन्म-मरण के संकट भी छूट जाते हैं; छोटा भी पाले, बड़ा भी पाले और जहाँ पक्षपात नहीं । एक वस्तुस्वरूप के आधार पर ही है जैनशासन, फिर क्या वजह है कि लोक में जैनशासन के मानने वाले कितने और इसके खिलाफ रहने वाले कितने? खिलाफ रहने वालों की संख्या बहुत है । यों समझ लीजिए कि आज के जितने मनुष्य हैं उनमें जैनियों की संख्या मुश्किल से 1, 2 प्रतिशत बैठेगी । तो क्या वजह है कि आपका शासन फैला नहीं ? व्यापक नहीं । लोगों के हृदय में नहीं रहता, इसका क्या कारण है ? धर्म तो एक ऐसी निष्पक्ष चीज है कि सही मार्ग मिले तो कोई भी व्यक्ति इस सही मार्ग को ही धारण करेगा, फिर वजह क्या है कि आपके शासन का एकाधिपत्य इस दुनियां में नहीं है ? इस शंका का उत्तर इस छंद में दिया गया है ।

(14) वर्द्धमानशासन के प्रसार के अवरोध का कारण―हे प्रभु ! तुम्हारे शासन का जो एक आधिपत्य नहीं है, एक अधिपतिपनारूप लक्ष्मी की प्रभुताशक्ति के अपवाद का कारण क्या है? तो समंतभद्राचार्य कहते हैं कि भगवान का शासन जो सर्वत्र नहीं फैल रहा उसके कारण हैं तीन । तीनों कारण मिट जायें तो फैलने में देर न लगेगी, फिर यही पवित्र शासन ही सर्वत्र रहेगा । वे तीन कारण क्या हैं? पहला कारण तो है कलिकाल, पंचमकाल, गिरावट की ओर चलने वाले जीव । तो प्रथम दोष तो है कलिकाल । दूसरा दोष है, कारण है प्रभु से शासन के न फैल सकने का कि सुनने वालों का कलुषित हृदय, और तीसरा कारण है कि बोलने वालों को नयों का ज्ञान नहीं । इन तीन बातों के कारण हे प्रभु ! आपके शासन का एक छत्र साम्राज्य न हो सका ।

(15) श्रीवर्द्धमानशासनप्रसारावरोध का प्रथम कारण कलिकाल―कैसे हैं वे तीन दोष जो वर्द्धमानशासन के अवरोध के कारण हैं ? तो कलिकाल की बात तो प्राय: सभी लोग कहा ही करते हैं और उसकी घटना सामने दिख रही है । लोग पतन की ओर जा रहे हैं । कुछ थोड़ा समझ में नहीं आता है कि इस जगत् का वैभव समागम कुछ भी इस जीव का साथी नहीं है । लोग देखा भी करते हैं कि जो मर गया सो कुछ नहीं ले जाता । इतने पर भी जो इस बाह्य संग की ओर व्यामोह है और उसके कारण भ्रष्टाचार, हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह के पाप; ये जो सब फैल रहे हैं सो ये सब यह ही घोषणा मानो कर रहे हैं कि सब कलिकाल की देन है ।

(16) कलिकाल का एक उदाहरण―अब इसके संबंध में एक घटना है जो गुरुजी सुनाते थे कि जैसे मानो कलिकाल एक दिन बाद लगेगा । उससे पहले सही समय था । तो पहले दिन एक पुरुष ने अपना टूटा-फूटा मकान बेचा । खरीदने वाले ने खरीद लिया और उसमें तुरंत ही निर्माण कार्य शुरु कराया । नींव खुदवाई तो उसमें एक अशर्फियों का हंडा मिला तो वह खरीदने वाला सोचता है कि इस हंडे की अशर्फियों में हमें हाथ भी न लगाना चाहिए, क्योंकि ये मेरी नहीं हैं । मैंने तो केवल जमीन खरीदी है, सो हंडा लेकर वह बेचने वाले के पास गया कि भाई ! यह तुम्हारी जमीन में हंडा निकला है इसे आप रख लो । तो उसने अपने पास रखने से इंकार कर दिया । बोला―मैं कैसे रख लूं ? मेरा होता तो मुझे पहले मिलता, यह तो तुम्हारे भाग्य का है । हमने जमीन बेची, उसके अंदर निकला है । तो दोनों में लड़ाई-सी होने लगी । मैं नहीं रखता, मैं न रखूँगा, तुम्हें रखना होगा । ऐसी लड़ाई सुनकर शायद किसी के मुख में पानी आ जाये कि अगर हम होते तो फैसला कर देते । खैर, उनकी लड़ाई न मिटी तो राजा के पास न्याय कराने दोनों पहुंचे । अपनी कथा सुनायी । बेचने वाला कहता है कि मैंने तो जमीन-जमीन बेची और हमारा होता तो हमें मिलता । हमने तो इसे धरा भी नहीं, और खरीदने वाला कहता कि हमने तो सिर्फ जमीन ही खरीदी, उसके ही हम मालिक हैं, पर जमीन में जो धन निकला वह मेरा नहीं । राजा उन्हें बहुत मनाये, पर माने नहीं, तो राजा ने कहा―अच्छा, कल पेशी होगी । अब कल के मायने कलिकाल लगना । अब तीनों ही अपने-अपने घर में सो रहे थे तो बेचने वाला सोचता है कि मैं कितना मूर्ख निकला कि मिला हुआ धन ही खुद अपने हाथों दूसरे को दे रहा था और बेचने वाला सोचता है कि मैं कितना मूर्ख निकला कि खुद लाया हमारे घर और हमने उसे लड़कर भगा दिया । और राजा के यह विचार आया कि वे दोनों बड़े मूर्ख हैं, सो ठीक है, वह धन न तो किसी का, जो जमीन में निकला सो राजा का । खैर आगे चलकर ऐसा ही फैसला होगा । सो बात यहाँ यह कही जा रही कि कलिकाल का ऐसा प्रभाव है कि आचार-विचार गिरावट की ओर प्रकृत्या लोगों के जाते हैं ꠰ बड़े-बड़े स्कूल खोले जाते हैं एक सच्ची शिक्षा और आचार-विचार बनाने के लिए, मगर पापों के करने के लिए कोई स्कूल नहीं खुले ꠰ कहां शिक्षा लेवे कि इस तरह झूठ बोलो, इस तरह चोरी करो ? लेकिन लोगों में पाप के भाव प्रकृत्या आ जाते हैं । तो एक तो यह कलिकाल है, जिसमें लोगों के भाव शिथिलता की ओर, असंयम की ओर चलते हैं, इस वजह से हे प्रभु ! आपके शासन का व्यापक संचार न हो सका । यह तो है पहला कारण ।

(17) श्रीवर्द्धमानशासनप्रसारावरोध का द्वितीय-तृतीय कारण श्रोताओं का कलुषाशय तथा प्रवक्ता का वचनानय―अब दूसरा कारण क्या कहा कि सुनने वालों के आशय मलिन हैं । कैसा मलिन आशय कि ये मोह और मिथ्यात्व से भरे हुए हैं और इस कारण चाहते यह हैं कि ऐसी ही बात सुनाई जाये या उस बात का ऐसा ही अर्थ लगाया जाये जैसा कि मुझे इष्ट है और हमारे स्वार्थ में कोई बाधा न आ सके । यह है कलुष आशय की बात । इसके अतिरिक्त सुनने वाले अनेक लोग कुछ इसलिए आते हैं कि लोग समझें कि ये खास हैं ꠰ कुछ इसलिए भी आते हैं कि देखें तो सही कि ठीक बोलते या कैसा बोलते हैं? कोई इसलिए भी आते हैं कि कुछ बात मिले और चर्चा छिड़े तो झट शंका कर दें ꠰ भिन्न–भिन्न प्रकार के आशय होते हैं, पर आशय सुनने वालों का सिर्फ यह होना चाहिए कि मेरा कैसे उद्धार हो ? कल्याण की भावना से सुनना है, और कुछ भावना न होनी चाहिए, पर नहीं है ऐसा तो यही एक कारण है कि श्रोताओं का हृदय कलुषित है, इसलिए प्रभु के शासन की महिमा न बढ़ सकी । तीसरा कारण है पढ़ने वालों को, उपदेश करने वालों को नयों का परिचय नहीं है, इस कारण से प्रभु के शासन का व्यापक प्रचार न हो सका । सो खेदपूर्वक आचार्यदेव कह रहे हैं और ऐसा कहने में भी महिमा प्रभु के शासन की ही बतायी जा रही


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