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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 52

From जैनकोष



प्रमुच्यते च प्रतिपक्षदूषी

जिन: त्वदीयै: पटुसिंहनादै: ꠰

एकस्य नानात्मतया ज्ञवृत्ते

स्तौ बंधमोक्षौ स्वर्मतादबाह्यौ ꠰꠰52꠰꠰

(174) अनेकांतशासन के सिंहनाद से मोक्षमार्गविराधक एकांताग्रह का परिहार―यहाँ कोई जिज्ञासु पुन: प्रश्न करता है कि अनेकांतवादियों को अपने अनेकांतशासन में तो राग हो गया और सर्वथा एकांतशासन में द्वेष हो गया तो इन एकांतवादियों का मन समान कैसे रह सकता हे ? जब मन में समानता न रही तो मोक्ष कैसे रह सकेगा ? जब मोक्ष नहीं है तो बंध की क्या कल्पना करना ? वह भी स्वभाव कहलायेगा फिर, तो मन विषम हो गया अनेकांतवादियों का, क्योंकि उनको अपने शासन में तो राग है और एकांतवादियों के शासन में द्वेष हो गया ꠰ जिज्ञासु का यह प्रश्न यों असंगत है कि अनेकांतात्मक तत्त्व के दर्शन में द्वेष और राग की बात कुछ नहीं है, किंतु वस्तु का जैसा स्वरूप है वैसा ही वहाँ प्रतिपादित होता है ꠰ ज्ञानी पुरुष को किसी भी जीव से घृणा नहीं होती ꠰ चाहे वह एकांतवादी हो, चाहे वह पापी जीव हो, जीव का स्वरूप सबका समान है और तथ्य उसकी प्रतीति से नहीं निकलता ꠰ इस कारण किसी जीव में द्वेष बने ज्ञानियों के, यह संभव नहीं है, किंतु जिस विधि से संसार के संकटों से छुटकारा होता है उस विधि से जानना और अन्य जीवों के लाभ के लिए उस विधि का प्रकाशन करना, यह तो जीव के किसी वास्तविक वात्सल्य का फल है ꠰ अनेकांतवादी किसी भी एकांतवाद के द्वेषी नहीं होते, किंतु सभी एकांतवादों को अपेक्षा की दृष्टि से समर्थन ही मिलता है ꠰ प्रतिपक्ष के द्वेषी तो एकांतवादी नहीं होते, क्योंकि प्रतिपक्षभूत धर्म को स्वीकार करने के लिए उनकी गुंजाइश नहीं है, किंतु अनेकांत में स्वपक्ष परपक्ष अथवा कहो विवक्षित धर्म और अविवक्षित धर्म दोनों को स्वीकार करने की गुंजाइश है और वस्तु में भी यही बात है, क्योंकि पदार्थ द्रव्यपर्यायात्मक है, भेदाभेदात्मक है । एकांतवाद तो द्रव्य-एकांत से अथवा पर्याय-एकांत से निकला है, किंतु अनेकांतवाद ने जहाँ द्रव्यस्वरूप को माना यहाँ पर्यायस्वरूप को भी माना है । इसलिए अनेकांतवादी किसी भी शासन के बैरी नहीं हैं, किंतु वस्तु का प्रतिपादन करने वाले सभी शासनों का तालमेल बैठाने वाला है । हाँ, जो एकांतवादी हैं वे सब प्रतिपक्षों से द्वेष रखने वाले हैं । हे वीर जिनेंद्र ! आपके सिंहनादों से वे भी अपने आग्रह को तज देते हैं । वस्तुतत्त्व का विवेक सभी के लिए कराया जाने का आपके शासन में उपलभ्य है । सो निश्चयात्मक अबाधित जो आगम वाच्य हैं उनके प्रयोग द्वारा मुक्तिमार्ग का प्रकाशन होता ही है ।

(175) अनेकांतात्मक पदार्थ के सही निर्णय में मोक्षमार्ग की व्यवस्था―प्रत्येक वस्तु अनंत धर्मात्मक है । उसका नानात्मकरूप से निश्चय करना ही सर्वथा एकांत का हटना है । ऐसी स्थिति में अनेकांतवादी का किसी भी एकांतवादी के साथ द्वेष नहीं है, क्योंकि वह प्रतिपक्ष को भी स्वीकार करता है । जैसे द्रव्यदृष्टि से जीव को नित्य कहा गया तो इस नित्य की बात सुनकर सांख्यादिक खुश होंगे और क्षणिकवादी इसमें नाराज होंगे, पर क्षणिकवादियों के नाराज होने की यों जरूरत नहीं कि यह अनेकांतशासन पर्यायदृष्टि से जीवादिक तत्त्वों का नित्य भी घोषित करता है । तो अनेकांतवाद ने सभी प्रतिपक्षों का तालमेल बैठाया है । वह किसी भी प्रतिपक्ष का द्वेषी नहीं है । तत्त्व के निश्चय का नाम राग नहीं होता । वस्तु अनेकांतात्मक है और ऐसा ही निर्णय करना यह कोई दोष की बात नहीं है । अगर तत्त्व-निर्णय का नाम राग हो तो ऐसे समाधिष्ट मुनियों के, जिनका मोह क्षीण हो गया, ऐसे उत्तम अंतरात्माओं के भी राग का प्रसंग आ जायेगा । तो तत्त्व का निर्णय करना राग नहीं कहलाता । इसी प्रकार अतत्त्व का निराकरण करना द्वेष नहीं कहलाता, क्योंकि जगत् के जीव अतत्त्व में ही मुग्ध होकर अब तक संसार में रुलते चले आये हैं । उनको अतत्त्व का बोध कराकर छुटाया जाये तो वह जीवों का उपकार ही कहलायेगा, इसमें अपकार की जरा भी बात नहीं है । तो हे प्रभो ! आपके शासन को मानने वाले ज्ञानी पुरुषों के मन में समता रहती है । उनको समाधि प्राप्त हो सकती है और निर्वाण प्राप्त हो सकेगा । हां, ज्ञान होने पर भी किसी पदवी तक मन में समता रहा करती, तो वहाँ यह बात समझनी चाहिए कि जिन अंशों में चारित्रमोह का उदय है उन अंशों में बंध चलता रहता है और वह बंध भी प्राय: पुण्यबंध होता है, पर परमपारिणामिक भावमय चैतन्यस्वभाव की आराधना का ध्यान उनके सदा रहता है, और जब भी निजस्वरूप की ओर आराधना बनती है तो बंध रुक जाता है । तो बंध होना, मोक्ष होना, यह अनेकांतशासन में सिद्ध होता है । जो अनेकांत मत से बाह्य हैं उनके मोक्ष की व्यवस्था नहीं है ।


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