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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 55

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नाना सदेकास्मसमाश्रयं चेद्-

ऽन्यत्वमद्विष्ठमनात्मनोः क्व ।

विकल्पशून्यत्वमवस्तुनश्चेत्

तस्मिन्नमेये क्व खलु प्रमाणम् ।।55।।

(186) पदार्थों के सत्स्वभाव के समाश्रयरूप में सामान्य की सिद्धि की आरेका―सर्वगत सामान्यवादी सामान्य का ऐसा स्वरूप कहते हैं कि वह सामान्य अनेक सत् पदार्थों का स्वभावरूप है । जैसे सदात्मा, द्रव्यात्मा, गुणात्मा, कर्मात्मा मायने वही-वही स्वरूप जिसका समाश्रय है ऐसा कोई सामान्य है अवश्य याने सत्ता सामान्य का आश्रय करके वस्तु को तका जाये तो वह सदात्मा कहलाता है और द्रव्यत्व सामान्य का आश्रय करके वस्तु को तका जाये तो वह द्रव्यात्मा कहलाता ꠰ गुणत्व सामान्य का आश्रय करके वस्तु को तका जाये तो वह गुणात्मा कहलाता है । इसी तरह कर्मत्वसामान्य का आश्रय करके वस्तु को निरखा जाये तो वह कर्मात्मा कहलाता है । सो वही सामान्य अपने-अपने एक-एक सद᳭व्यक्ति, द्रव्यव्यक्ति, गुणव्यक्ति, कर्मव्यक्ति के प्रतिभास के समय में ही प्रमाण से प्रतीत हो जाते हैं याने इन पदार्थों को जब जाना और जिस विशेषण से जाना उसकी सामान्य से ही तो व्याप्ति है, और जैसा उस जानने के समय में समझा, जिसको जानने के समझ में समझा उससे निराला किसी दूसरे व्यक्ति के जानने के समय में भी ऐसा ही समझा जाता है, जिससे एक सत् की या द्रव्यादिक स्वभाव की प्रतीति सिद्ध होती है और इस प्रतीति का कारण है सामान्य का ग्रहण । यदि सामान्य वास्तव में तत्त्व न हो तो इन पदार्थों का, हम नाना प्रकार के विशेषणों में सामान्य का ज्ञान कैसे हो जाता? इससे सामान्य तत्त्व है और वह प्रमाण सिद्ध है, अनुभव सिद्ध है ।

(187) सामान्य की व्यक्तियों से भिन्नता व अभिन्नता―इन दोनों विकल्पों में भी सामान्य पदार्थ की असिद्धि के प्रसंग में भिन्नता के विकल्प का निराकरण―अब उक्त शंका के समाधान में कहते हैं कि सामान्य को जुदा मानने वाले यह बतलायें कि वह सामान्य अपने व्यक्तियों से भिन्न है या अभिन्न ? जैसे द्रव्यत्व सामान्य से युक्त को द्रव्य माना तो वह सामान्य उस द्रव्य से भिन्न है या अभिन्न है? सामान्य को बताया कि एक स्वभाव के आश्रयरूप को सामान्य कहते हैं । जो भी सामान्य बताया वह अपने व्यक्तियों से यदि जुड़ा है तो लो सामान्य से वे व्यक्ति जुदे हो गए । अब उनमें कभी वे सामान्यरहित कहलाये, सामान्य कभी जुट नहीं पाया । कभी सामान्य जुट गया, कभी द्रव्यत्व नहीं जुटा, कभी जुटा, तो ऐसे उन व्यक्तियों की कोई स्वरूप-स्थिति ही न बन पायेगी । सत्त्व सामान्य भिन्न है तो वह तो असत् ही रहा, स्वयं तो सत् रहा नहीं । तो सत्त्व सामान्य जुटे तब व्यक्ति की स्थिति कहलाती है और सत् सामान्य है, पदार्थ से जुदा तो वह असत् ही कहलाया । द्रव्यत्व सामान्य जुटा तो द्रव्य कहलाये और द्रव्यत्व है द्रव्य से पृथक् । तो स्वयं द्रव्य अपना कुछ न रहा, गुण कर्म स्वयं कुछ भी नहीं रहते । तो ऐसा स्वयं व्यक्तित्व-विहीन हो जाता, । द्रव्य गुण कर्म आदिक स्वयं कुछ नहीं हैं, क्योंकि द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्व ये तो न्यारी चीजें हैं, तो सामान्य भी उनसे निराला फिर रहा क्या? द्रव्य गुण आदिक वे सब असत् हो जायेंगे, और इतना ही नही, जुदे रहने वाले सत्य द्रव्यत्व भी असत् हैं, और जिसमें सत्त्व द्रव्यत्व मानते हैं वह सत् भी अलग है । तो न सत्त्व वस्तु रहा, न सत् वस्तु रहा, न द्रव्यत्व कुछ है, न द्रव्य कुछ है । द्रव्यत्व के बिना द्रव्य क्या और द्रव्य के बिना द्रव्यत्व क्या? सबका असत्त्व हो जायेगा । सामान्य भी अस्तित्वहीन हो गया, द्रव्य गुण कर्म आदिक भी अस्तित्वहीन हो गए । तो फिर जो प्रथम विकल्प में पूछा गया कि वह सामान्य पदार्थों से भिन्न है तो वह भिन्नत्व गुण अथवा कहो अन्यत्व गुण किसमें रहेगा? जब दोनों ही नहीं हैं तो न अन्यत्व बन सकता है न सामान्य बन सकता है । तो अन्यत्व भी सिद्ध न हो सका । इस कारण प्रथम विकल्प तो युक्तिसंगत न बना कि सामान्य द्रव्य गुण आदिक से भिन्न रहता है ।

(188) भिन्नता की तरह सामान्य की व्यक्ति से अभिन्नता मानने पर भी सामान्य की असिद्धि―अब यदि दूसरा विकल्प कहा जाये कि वह सामान्य अपने व्यक्तियों से सर्वथा अभिन्न है तो यह अभिन्नता भी सिद्ध नहीं हो सकती । क्योंकि सामान्य यदि व्यक्ति में प्रवेश कर गया अभेद होने के कारण तो सामान्य कुछ न रहा, व्यक्ति ही रह गया । सामान्य तो हो गया व्यक्ति में लीन । अब उसका वजूद कुछ न बचा, व्यक्ति ही रह गया । सामान्य की कोई अलग से सत्ता ही नहीं और सत्ता न रही तो व्यक्ति की भी संभावना न बनी । तो इस तरह सभी अस्तित्वहीन गए और फिर अभिन्नत्व गुण की किसमें योजना बनायी जाये, क्योंकि दोनों हो नहीं हैं । न सामान्य रहा, न व्यक्ति रहा ꠰ तो जैसे भिन्नता की योजना किसी में न बन सकती थी, इसी तरह अभिन्नता की भी योजना अब किसी में भी नहीं बन सकती । तो ऐसा सामान्य वास्तविक नहीं, अवास्तविक है । सामान्य विकल्प से रहित है, ऐसा ही अगर कोई माने तो अवस्तुरूप सामान्य ज्ञान का विषय रहा ही नहीं । तो उसके बारे में फिर चर्चा ही कहां से उठे? तो ऐसा सामान्य जब ज्ञानका विषयभूत नहीं है तो उसकी कोई व्यवस्था ही न बन सकी । निष्कर्ष यह है कि सामान्य कोई अलग वस्तु नहीं, पदार्थ ही है । उसमें ही जानकारों के लिए हम व्यवहार से सामान्य और विशेष की प्रधानता से किसी वस्तु को समझा करते हैं ꠰


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