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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 57

From जैनकोष



अनात्मनाऽनात्मगतेरयुक्ति-

र्वस्तुन्ययुक्तेर्यदि पक्षसिद्धि: ।

अवस्त्वयुक्ते: प्रतिपक्षसिद्धि:,

न च स्वयं साधनरिक्तसिद्धि: ।।57।।

(196) संवेदनाद्वैतवाद में अनात्मसाधन व अनात्मसाध्य की दूरूह निष्फल कल्पना―यहाँ क्षणिकवादी अपना अभिप्राय करते हैं कि साधन तो अनात्मक होता है, अस्वरूप, उसकी कोई विधि नहीं है, वास्तविक नहीं है, और इसी तरह साध्य भी अनात्मक है, वह भी वास्तविक नहीं है । इसका कारण यह है कि साधन और साध्य कल्पिताकाररूप है । केवल कल्पना के द्वारा माना गया है । जब साध्य-साधन कल्पिताकार है तो पराभ्युपगत अर्थ के प्रसंग नहीं आते । उक्त शंका के समाधान में कहते हैं कि कितना ही तेज विचार कर सामान्यविशेषात्मक पदार्थ के विपरीत तत्त्व को कहा जाये, पर उसकी सिद्धि नहीं होती । जो अनात्मक साधन हो, जिसकी विधि सद्भावरूप नहीं है उसके द्वारा और उसी प्रकार के अनात्मसाध्य की जानकारी बनाना यह तो सर्वथा ही असंगत है, ऐसा होना संभव ही नहीं है ।

(197) संवेदनाद्वैतवाद में अनात्मसाधन व अनात्मसाधन से शंकाकार की स्वार्थसिद्धि―शंकाकार यदि संवेदनाद्वैतरूप से वस्तु में अनात्मतत्त्व के द्वारा अनात्मसाध्य की जानकारी न बनाये, इससे अपना पक्ष सिद्ध करना चाहे तो अद्वैत की ही सिद्धि ठहरती है अर्थात् संवेदनाद्वैतवादी यदि ऐसा कहें कि हमारा संवेदन मात्र तत्त्व साध्य-साधन से रहित है और वही हमारे तत्त्व की सिद्धि है तो कल्पनाकाररूप अवस्तु में साध्य-साधन जब न बना तो उससे द्वैत को सिद्धि हो जाती है । क्योंकि जब अवस्तुरूप साधन अद्वैत तत्त्वरूप साध्य को सिद्ध नहीं कर सकता, और यदि साधन के बिना स्वत: ही संवेदनाद्वैत की सिद्धि मान ली जाये तो इस तरह ब्रह्माद्वैत की अथवा अन्य-अन्य सिद्धांत की सिद्धि क्यों नहीं मान ली जाती, क्योंकि अब तो सिद्धि साधन बिना बनायी जाने लगी है ।


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