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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 7

From जैनकोष



अभेद-भेदात्मकमर्थतत्त्वं

तव स्वतंत्राऽंयतरख-पुष्पम् ।

अवृत्तिमत्त्वात्समवाय-वृत्ते:

संसर्गहाने: सकलाऽर्थ-हानि: ꠰꠰7꠰।

(23) अर्थतत्त्व की अभेदभेदात्मकता―हे प्रभु ! आपके द्वारा बताया गया यह अर्थतत्त्व अभेदभेदात्मक है ꠰ जब कोई सत् है तो वह सदा रहेगा, यह तथ्य तो पाया ही जाता है । और जब कोई सत् है तो उसकी प्रतिसमय में अवस्थायें बनेगी, यह भी तथ्य है । अवस्थायें, पर्याय बने बिना सत् नहीं रह सकता और सत्ता रहे बिना सत् नहीं रह सकता । तो इस स्वरूप से वह जानने में आता है कि अर्थतत्त्व भेदाभेदात्मक है । जब उस ही द्रव्य को देखें तो अभेद लगा । जब पर्यायों को देखा तो भेद किया गया । प्रतिसमय में भिन्न-भिन्न बात । तो आपका बताया हुआ अर्थतत्त्व अभेदभेदात्मक है और आपके इस सिद्धांत से बाह्य जो कुछ सिद्धांत हैं वे तो सब आकाश का पोल है अर्थात् सही नहीं हैं । एक बात और सोचना है कि पदार्थ है उसे कोई सर्वथा अभेदरूप मानता है तो ऐसा पदार्थ फिर किस काम का है? जहाँ अवस्थायें न बने, पर्यायें न बनें, लोक के किसी प्रकार उपयोग और व्यवहार में न आये वह सत् कैसा, पदार्थ कैसा? तो सर्वथा अभेद मानने की यह कोई व्यवस्था नहीं बनती । और भेद ही माना जाये सर्वथा; पर्याय तो बिल्कुल अलग है, द्रव्य उससे जुदा है तो जब जुदा मान लिया, पर्याय बिल्कुल भिन्न पदार्थ है और द्रव्य बिल्कुल भिन्न पदार्थ है तो अब यह बतलाओ कि यह कैसे समझ में आया कि यह पर्याय इसकी है? जो भिन्न है पर्याय वह तो किसी जगह भी लगा सकते ꠰ तो एक सिद्धांत में यह बाधा आती है कि पर्याय अगर सर्वथा भिन्न होती तो यह पर्याय इसकी है, यह कथन नहीं बन सकता । अगर कहो कि समवाय से बन जायेगा; एक समवाय संबंध है, जो एक घनिष्ट संबंध माना जाने तक बन जायेगा तो कहते हैं कि समवाय तो पदार्थों में जाता नहीं है, इस कारण अब पर्याय का द्रव्य से कोई नाम न रहेगा तो पदार्थ का स्वरूप ही न बनेगा । हे प्रभो ! ऐसा स्पष्ट कथन आपके मत में बताया गया है । इससे अपने को क्या शिक्षा मिलती है कि भाई ! जाने सब, पर जिस एक जगह रुकना है, अपना उपयोग जमाना है उस अखंड अर्थतत्त्व का यथार्थ लक्ष्य रखें । तो समवाय संबंध से मानेंगे कि यह पर्याय इसकी है, वह गुण इसका है तो एक समवाय का पहले संबंध बनावें कि यह समवाय इसमें काम करता है । जब वही सिद्ध नहीं है तो गुण पर्याय का इसमें संबंध नहीं बन सकता है । तो वस्तु के स्वरूप के बारे में बताया है कि वस्तु है और सदा रहती है, इसका ही विश्लेषण है ।

(24) अर्थतत्त्व को अभेदभेदात्मक न मानने पर आत्मसिद्धि की अशक्यता―अभेद, भेद, ध्रुव, अध्रुव; इनमें से कोई एक बात न माने तो काम न चलेगा । कोई कहे कि हम हैं और सदा हैं और एकरूप हैं, उसमें प्रश्न कुछ नहीं होता तो एक तो अपने मुख झूठी बात । घबरा रहे, व्यग्र हो रहे, इतने अटपट ओटोपाय कर रहे और कभी मुक्तिमार्ग के पौरुष का यत्न भी चाहते और कहते कि हम तो अपरिणामी, ध्रुव, ब्रह्मस्वरूप हैं, यह कैसे बनेगा? और मानो है ऐसा तो फिर मोक्ष काहे के लिए चाहते? जब हम अपरिणामी हैं, हम में कुछ परिणमन होता ही नहीं तो मोक्ष की खोज किसलिए की जा रही? और अगर ऐसा माने कि हमने तो प्रतिसमय में खुद परिणमन किया, हम खूब स्वयं जुदे-जुदे पदार्थ हैं, एक का दूसरे से कुछ संबंध नहीं । पर्याय क्या, वे तो पदार्थ ही जुदे-जुदे हैं । जब आत्मा जुदे-जुदे हैं, एक शरीर में जो 24 घंटे प्रति सेकेंड समय-समय में एक नया-नया आत्मा बनता है तो एक का दूसरे से कुछ संबंध तो न रहा, क्योंकि भिन्न-भिन्न आत्मा हो गए । तो फिर क्या जरूरत पड़ी कि हम तपश्चरण करें और मोक्ष कोई दूसरा पाये? तो जब यह माना जायेगा कि हम अभेदभेदात्मक हैं, सदा रहने वाले हैं और परिणमते रहते हैं तो उसको मोक्षमार्ग मिलेगा क्या? देखो, हम सदा रहते हैं, सदा रहने वाले हैं, कोई मात्र इस भव के लिए ही नहीं हे, आगे भी रहेंगे तो इस ही भव के आराम का, सुख का कुछ चिंतन मत करें । कोई पुरुष एक अपने इस जीवन में कोई बड़े सुख का साधन पाने के लिए बड़ा कष्ट सहता है और बड़ी प्रसन्नता से सहता है तो ऐसा भविष्य जो अनंतकाल पड़ा है उस अनंत भविष्य में वह शांत रह सके, ऐसा उपाय अगर बना सकें और उस उपाय के लिए अगर यह 10-5 वर्ष की जिंदगी कष्ट ही कष्ट में गुजारे तो कोई नुक्सान की बात नहीं । धीर होना चाहिए और अभिप्राय सही होना चाहिए ।

(25) अर्थतत्त्व को जानने पर उसकी सुख प्राप्ति―तो अब यह जाना कि हम सदा रहते हैं, रहेंगे तो उसका यह फायदा उठाना चाहिए कि एक जीवनभर के लिए ही हम सब आराम कर लें, इसके लिए कुछ नहीं है, और जब यह समझा कि हमारी पर्यायें होती हैं, अवस्थायें बनती हैं, बदलती हैं तो यह उत्साह जगेगा कि मैं अज्ञानी हूँ या अज्ञान में था । उस अज्ञान को दूर कर ज्ञान में आ सकता हूँ, क्योंकि परिणमन होता है तो उत्पादव्ययध्रौव्यात्मक पदार्थ का स्वरूप मानकर तथ्य को समझता है । हे प्रभु ! जो ऐसा विश्वास रखता है उसका मोह छूटता है, कषायें शिथिल होती हैं और थोड़े ही काल बाद वह मोक्षमार्ग पाता है और मुक्ति को भी पा लेता है । सो प्रभु ! आपका सिद्धांत बड़ा निर्दोष है, अबाध्य है । उसका सहारा ही आत्मकल्याण चाहने वालों के लिए श्रेयस्कर है ।


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