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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 9

From जैनकोष



अहेतुकत्वप्रथित: स्वभावस्त

स्मिन् क्रियाकारकविभ्रम: स्यात् ।

आवालसिद्धेर्विविधार्थसिद्धि

र्वादांतरं किं तदसूयतां ते ।।9।।

(34) अहेतुकत्वप्रथित स्वभाव से नित्य पदार्थ में विकार मानने पर दोषापत्ति―इससे पहिले वाले छंद में यह बात कही गई थी कि पदार्थों को सर्वथा नित्य मानने पर अब उसमें विकार अथवा परिणमन नहीं माना गया, फिर तब क्रिया, कारक आदिक नहीं बन सकते हैं, और क्रिया, कारक आदिक न बनने पर बंध, मोक्ष आदिक भी कुछ नहीं बन सकते हैं । उसके उत्तर में कुछ प्रश्न किए जा रहे हैं और उनका समाधान दिया जा रहा है । शंकाकार यहाँ यह कहता है कि पदार्थ नित्य रहा आये और उनमें विकार भी बना रहेगा और वह विकार पदार्थ के स्वभाव से ही बन जायेगा याने पदार्थ का स्वभाव ही ऐसा है कि उसमें विकार परिणमन होता ही रहता है । तो यों आत्मा आदिक नित्य द्रव्य में स्वभाव से ही विकार सिद्ध हैं, ऐसा मान लिया जायेगा । और जब विकार बन गया तब क्रिया कारक व्यापार आदिक भी बन जायेंगे, फिर तो बंध मोक्ष सभी ठहर जायेंगे । कोई दोष न आयेगा ? ऐसी आशंका पर उस पर विकल्प होता है कि यह तो बतलाओ कि विकार करने का जो स्वभाव बताया गया है वह क्या बिना हेतु के स्वभाव में विकार चलेगा या आवालसिद्धि से नाना कार्यसिद्धि रूप विकार चलेगा, यदि यह कहा जाये कि नित्य पदार्थ में विकारी होने का जो तुमने स्वभाव माना है वह बिना ही किसी हेतु के सिद्ध हो जायेगा तब ऐसी स्थिति में तो क्रिया और कारक का भ्रम ही सिद्ध होगा, क्योंकि विकार तो बिना हेतु के स्वभाव से ही बन बैठा । तो क्रिया नाम किसका? करने वाला नाम किसका? इन शब्दों का प्रयोग करना फिर तो कोरा भ्रम ही ठहरता है, क्योंकि जब स्वभाव से ही पदार्थ का ज्ञान बन गया, पदार्थ की उत्पत्ति बन गई, सभी क्रियायें जब बन गई तो फिर कारक क्या कि इसने किया, इस तरह हुआ, विधि-विधान बताना; ये सब भ्रम ठहर जायेंगे । अगर है विधि-विधान, तो है । वास्तव में कार्य-कारण भाव तब तो स्वभाव अहेतुक सिद्ध न होगा । तो पदार्थ में विकार स्वभाव से होता है और वे बिना हेतु के होते हैं, ऐसा मानने पर समस्त क्रिया कारकों का लोप हो जायेगा ।

(35) स्वभाववादैकांत में विभ्रमवाद की भी असिद्धि-―अब इसी विकल्प में दूसरी बात देखिये―यह शंकाकार बन गया स्वभाववादी याने पदार्थ में परिणमन स्वभाव से होता है तो यों हो गया स्वभाववादी । अब यह क्रियाकारक का भ्रम भी मान नहीं सकता, क्योंकि यह तो है स्वभाववादी और क्रियाकारक को मान लेवे भ्रम, तो कहलाने लगेगा भ्रमवादी । तो जब भ्रम मान लिया तो भ्रम की मान्यता पर अन्य वाद का प्रसंग आयेगा । अब स्वभाववाद तो स्थिर न रहा । अब इसकी मान्यता में विभ्रमवाद भी आ गया लेकिन हे वीर जिनेंद्र देव ! आपके शासन से जो द्वेष रखता है याने जो स्याद्वादशासन से बहिर्भूत है, क्या उनके यहाँ इस प्रकार का वादांतर बन सकता है? नहीं बनता । क्योंकि सब कुछ भ्रमरूप है, ऐसा एकांतरूप एक नया वाद स्वीकार करने पर यह प्रश्न होता है कि उस भ्रम में भ्रांति है या अभ्रांति ? याने ऐसा भ्रम भ्रमरूप है या निर्भ्रम है ? यदि कहा जाये कि भ्रम निर्भ्रम है तो अब भ्रम का एकांत तो न रहा, कहीं तो कहना ही पड़ा कि यह भ्रम झूठा है, क्योंकि यह कहा जाये कि भ्रम के एकांतवाद में भी भ्रम है तो भ्रम का एकांत रहा कहां? तो जो स्याद्वादशासन से बहिर्भूत हैं उन पुरुषों के यहाँ न स्वभाववाद बनता है न विभ्रमवाद या वादांतर बनता है, और इस प्रकार अब स्वभाव में निर्हेतुकता की सिद्धि नहीं हो सकती ।

(36) आवालसिद्धि से पदार्थों का विकारस्वभाव मानने पर दोषापत्ति―अब यदि यह कहा जाये कि पदार्थ में विकार तो स्वभाव से होता है, मगर वह स्वभाव चूंकि बच्चे-बच्चे के सिद्ध है, इस कारण से नाना प्रकार के कार्यों की सिद्धि हो जाया करती है और इस तरह आबालसिद्धि से स्वभाव की सिद्धि हो जाती है याने जब यहाँ के क्रियाकारक आदिक रूप नाना अर्थों को बालक तक भी स्वीकार कर लेते हैं इसलिए वे सिद्ध हैं तो उनका इस प्रकार से सिद्ध होना ही स्वभाव है । यह वादांतर हुआ तो यह आबाल सिद्धि से स्वभाव में विकार सिद्ध है, ऐसा यह वादांतर भी याने एक नया कथन भी जैनशासन का विद्वेष रखने वाले के यहाँ बन कैसे सकता है? क्योंकि इन विकल्पों में भी बताया है कि जो आबालसिद्धि को निर्णय बनाया वह निर्णय नित्य है सर्वथा, ऐसा एकांतवाद का आश्रय लेते, पर बन नहीं सकता, जिससे कि सब, पदार्थ सब कार्य और सब कारणों की सिद्धि बन जाये । इसका कारण यह है कि यह निर्णय अनित्य है और बिना क्रिया के यह निर्णय बनता नहीं, इस कारण सर्वथा नित्य एकांत के साथ आबाल सिद्धि से स्वभाव विकार का होता है, यह बात सिद्ध नहीं हो सकती । और ऐसा यदि स्वभाव ही स्वभाव माना जाये और उसमें कुछ प्रश्न न उठाया जा सके, मुक्ति न बनायी जा सके तो यों सर्वथा अनित्य भी स्वभाव माना जा सकता है । फिर स्वभाव एकांतवाद कैसे सिद्ध होगा? क्योंकि स्वभाव की तो स्वभाव से ही व्यवस्था है, उसमें युक्तियाँ तो नहीं चलती । इस प्रकार हे जिनेंद्र देव ! आपके अनेकांतशासन का जो विरोध रखता है ऐसा सर्वदा एकांतवादियों के यहां कोई भी बात बन नहीं सकती, अतएव आपका शासन निर्दोष है और इस शासन के अनुसार अपना प्रयोग आचरण बनाने वाले लोग इससे अपना कल्याण प्राप्त कर सकते हैं ।


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